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‘हिंदी को भक्ति नहीं शक्ति चाहिए’
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-- साहित्यकार डा. देवेंद्र दीपक
- फोटो : SAHARANPUR
सहारनपुर। हिंदी को भक्ति नहीं, शक्ति चाहिए और शक्ति किसी भी भाषा को प्रयोग करने से आती है। लोग कहते हैं विश्व मेें हिंदी आए, लेकिन मैं कहता हूं हिंदी में विश्व आए। हिंदी में विश्व का ज्ञान होगा तो, उस दिन दुनियाभर का हर इंसान हिंदी को पूरी तरह अपनाएगा। यह कहना है मध्य प्रदेश के हिंदी साहित्य अकादमी, हिंदी ग्रंथ अकादमी और निराला सृजन पीठ के पूर्व निदेशक डाक्टर देवेंद्र दीपक का।
वह मूलरूप से सहारनपुर के ही रहने वाले हैं। लंबे समय से मध्य प्रदेश के भोपाल में रहते हैं। अमर उजाला संवाददाता से फोन पर बातचीत में वह कहते हैं कि मातृभाषा हिंदी का किसी भी स्तर पर अनादर नहीं होना चाहिए। अंग्रेजियत को छोड़कर युवाओं को हिंदी को ही अपनाना चाहिए। क्योंकि आज दुनियाभर में हिंदी और संस्कृत से प्रेम करने वाले हैं। उन्होंने मॉरीशस, सूरीनाम, लंदन और न्यूयार्क में विश्व हिंदी सम्मेलनों में भी हिस्सा लिया। तमाम देशों में हिंदी बोलने, लिखने और पढ़ने वालों की संख्या बढ़ी है। हमें गर्व होता है कि हिंदी हमारी मातृभाषा है, हर भारतीय को इस पर गर्व करना चाहिए और आने वाली पीढ़ी को भी हिंदी का आदर करने की प्रेरणा देनी चाहिए।
जिनसे शिक्षा ली, उनके साथ मिला सम्मान
डॉ. देवेंद्र दीपक समन्वय संस्था के आजीवन सदस्य हैं। समन्वय ने 1991 में साहित्यकार कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर, श्याम सुंदर मुकुट और देवेंद्र दीपक को सम्मानित किया। देवेंद्र दीपक ने बताया कि श्याम सुंदर मुकुट से उन्होंने पांचवीं कक्षा में शिक्षा ली थी, मंच पर उनके साथ सम्मान मिलना अलग ही अनुभव था। इसके अलावा मप्र शासन का शिखर साहित्य सम्मान, उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान साहित्य भूषण सम्मान, केंद्रीय हिंदी संस्थान का श्री गणेशशंकर विद्यार्थी सम्मान, मप्र साहित्य अकादमी का पं. बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ पुरस्कार, डॉ. आंबेडकर विशिष्ट सेवा सम्मान, हिंदी परिषद सम्मान, नाथ द्वारा शशि प्रभा पारिख सम्मान, सारस्वत सम्मान, पं. दीनदयाल उपाध्याय साहित्य सम्मान, साहित्य वागीश, संस्कार भारती सम्मान, दलित विशिष्ट सेवा सम्मान, अभिनव शिल्पी, डॉ. आंबेडकर फेलोशिप, डॉ. आंबेडकर आदित्य सम्मान आदि मिल चुके हैं।
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शिक्षा का सफर
31 जुलाई 1934 को जन्मे देवेंद्र दीपक ने प्राथमिक शिक्षा नगर पालिका स्कूल मंडी शिवपुरी से ली। आठवीं तक एचएवी हाईस्कूल में पढ़े और 10वीं कांशीराम हाईस्कूल से की। इसके बाद इंटर एसडी इंटर कॉलेज से और बीए एवं साहित्य रत्न की पढ़ाई मेरठ कॉलेज मेरठ से की। अंग्रेजी और हिंदी विषय में एमए, पीएचडी देहरादून स्थित डीएवी कॉलेज से की। इसके बाद 1959 में वह मध्य प्रदेश उच्च शिक्षा में चयनित हुए और फिर भोपाल में ही बस गए। वर्ष 1994 में वह सेवानिवृत्त हुए।
जब जेल में बिताया बंदी जीवन
वर्ष 1948 में जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध लगाया गया तो, उसके विरोध में सत्याग्रह करने पर देवेंद्र दीपक ने सहारनपुर और आगरा जेल में बंदी जीवन भी बिताया। उनके पिता मूलराज मेहता नगर पालिका सहारनपुर में सुपरिंटेंडेंट थे। उस समय परिवार शहर के लक्खी गेट मोहल्ले में रहता था। इनके भतीजे राजीव मेहता का परिवार शहर के न्यू माधोनगर में रहता है।
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वह मूलरूप से सहारनपुर के ही रहने वाले हैं। लंबे समय से मध्य प्रदेश के भोपाल में रहते हैं। अमर उजाला संवाददाता से फोन पर बातचीत में वह कहते हैं कि मातृभाषा हिंदी का किसी भी स्तर पर अनादर नहीं होना चाहिए। अंग्रेजियत को छोड़कर युवाओं को हिंदी को ही अपनाना चाहिए। क्योंकि आज दुनियाभर में हिंदी और संस्कृत से प्रेम करने वाले हैं। उन्होंने मॉरीशस, सूरीनाम, लंदन और न्यूयार्क में विश्व हिंदी सम्मेलनों में भी हिस्सा लिया। तमाम देशों में हिंदी बोलने, लिखने और पढ़ने वालों की संख्या बढ़ी है। हमें गर्व होता है कि हिंदी हमारी मातृभाषा है, हर भारतीय को इस पर गर्व करना चाहिए और आने वाली पीढ़ी को भी हिंदी का आदर करने की प्रेरणा देनी चाहिए।
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जिनसे शिक्षा ली, उनके साथ मिला सम्मान
डॉ. देवेंद्र दीपक समन्वय संस्था के आजीवन सदस्य हैं। समन्वय ने 1991 में साहित्यकार कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर, श्याम सुंदर मुकुट और देवेंद्र दीपक को सम्मानित किया। देवेंद्र दीपक ने बताया कि श्याम सुंदर मुकुट से उन्होंने पांचवीं कक्षा में शिक्षा ली थी, मंच पर उनके साथ सम्मान मिलना अलग ही अनुभव था। इसके अलावा मप्र शासन का शिखर साहित्य सम्मान, उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान साहित्य भूषण सम्मान, केंद्रीय हिंदी संस्थान का श्री गणेशशंकर विद्यार्थी सम्मान, मप्र साहित्य अकादमी का पं. बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ पुरस्कार, डॉ. आंबेडकर विशिष्ट सेवा सम्मान, हिंदी परिषद सम्मान, नाथ द्वारा शशि प्रभा पारिख सम्मान, सारस्वत सम्मान, पं. दीनदयाल उपाध्याय साहित्य सम्मान, साहित्य वागीश, संस्कार भारती सम्मान, दलित विशिष्ट सेवा सम्मान, अभिनव शिल्पी, डॉ. आंबेडकर फेलोशिप, डॉ. आंबेडकर आदित्य सम्मान आदि मिल चुके हैं।
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शिक्षा का सफर
31 जुलाई 1934 को जन्मे देवेंद्र दीपक ने प्राथमिक शिक्षा नगर पालिका स्कूल मंडी शिवपुरी से ली। आठवीं तक एचएवी हाईस्कूल में पढ़े और 10वीं कांशीराम हाईस्कूल से की। इसके बाद इंटर एसडी इंटर कॉलेज से और बीए एवं साहित्य रत्न की पढ़ाई मेरठ कॉलेज मेरठ से की। अंग्रेजी और हिंदी विषय में एमए, पीएचडी देहरादून स्थित डीएवी कॉलेज से की। इसके बाद 1959 में वह मध्य प्रदेश उच्च शिक्षा में चयनित हुए और फिर भोपाल में ही बस गए। वर्ष 1994 में वह सेवानिवृत्त हुए।
जब जेल में बिताया बंदी जीवन
वर्ष 1948 में जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध लगाया गया तो, उसके विरोध में सत्याग्रह करने पर देवेंद्र दीपक ने सहारनपुर और आगरा जेल में बंदी जीवन भी बिताया। उनके पिता मूलराज मेहता नगर पालिका सहारनपुर में सुपरिंटेंडेंट थे। उस समय परिवार शहर के लक्खी गेट मोहल्ले में रहता था। इनके भतीजे राजीव मेहता का परिवार शहर के न्यू माधोनगर में रहता है।