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विश्व स्तर पर प्रभावशाली भाषा बनकर उभरी हिंदी
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संवाद न्यूज एजेंसी
सहारनपुर। हिंदी हमारी मातृभाषा है। यह विचारों, भावनाओं और संवेदनाओं को व्यक्त करने का सबसे सशक्त माध्यम है। इसके माध्यम से हम अपनी बात को सहजता और सुगमता से दूसरों तक पहुंचा पाते हैं। वैश्वीकरण के दौर में हिंदी विश्व स्तर पर प्रभावशाली भाषा बनकर उभरी है। हिंदी एक ऐसी भाषा है जो सहज व सरल होने के साथ ही रोजगार की भी भाषा है। हिंदी को विज्ञान और प्रौद्योगिकी की भाषा मानने की जरूरत है। उच्च स्तरीय पाठ्यक्रम सामग्री और सरल शब्दावली अगर बनाई जाए तो हिंदी पढ़ने और लिखने के प्रति लोगों की रुचि बढ़ेगी। शिक्षिकाओं का मानना है कि हिंदी को हीन भाषा न समझा जाए। इसके जन जन की भाषा बनाने के लिए प्रयास करने होंगे।
महिला महाविद्यालय बेहट की प्राचार्य डॉ. नीतू यादव ने बताया कि महाविद्यालय में आयोजित किए जाने वाले विभिन्न कार्यक्रमों के माध्यम से छात्राओं को हिंदी के प्रति जागरूक किया जाता है। हिंदी विश्व में बोली जाने वाली प्रमुख एवं प्राचीन भाषाओं में से एक है। किसी भी देश की पहचान उस देश की भाषा व संस्कृति से की जाती है। हिंदी हमारे देश की सभ्यता, संस्कृति एवं संस्कारों का प्रतिबिंब है। वैसे तो भारतवर्ष में अनेकों भाषाएं बोली जाती हैं, लेकिन राष्ट्र भाषा होने के नाते हिंदी पूरे देश में एक विशिष्ट स्थान रखती है।
बच्चों को लगता है हिंदी की कोई आवश्यकता नहीं
छुटमलपुर इंटर कॉलेज में हिंदी की अध्यापक अर्चना शर्मा कहती हैं कि लोग हिंदी बोलते वक्त खुद को हीन समझते हैं। सोचते हैं कि हिंदी बोलने पर पूरा सम्मान नहीं मिलेगा। जबकि ऐसा नहीं है। बच्चों को लगता है हिंदी की कोई आवश्यकता नहीं है, लेकिन उन्हें यह समझना होगा कि मातृभाषा सिर्फ भाषा नहीं है, बल्कि उसके साथ अपनी संस्कृति भी जुड़ी हुई है, अगर अपनी भाषा छोड़ देंगे तो संस्कृति भी छूट जाएगी।
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बच्चों के साथ इच्छुक अभिभावकों को भी हिंदी सिखा
परिषदीय प्राथमिक विद्यालय की शिक्षक अंजलि आर्य बताती हैं कि पहले विद्यालय में आने वाली अधिकतर अभिभावक या तो अंगूठा लगाती थीं या उर्दू भाषा में हस्ताक्षर करती थीं। उन्होंने बच्चों के साथ ही इच्छुक अभिभावकों को भी हिंदी सिखाने का कार्य किया। इसका परिणाम है कि ये महिलाएं अब हिंदी को अच्छे से पढ़ पाती हैं और लिख पाती हैं। बैंक आदि के कार्य भी वे स्वयं कर लेती हैं।
हिंदी की उपेक्षा के लिए हिंदीभाषी लोग ही जिम्मेदार
चौधरी कलीराम डिग्री कॉलेज नागल की प्राचार्य डॉ. अमिता सिंह कहती हैं कि हिंदी की उपेक्षा के लिए हिंदीभाषी लोग ही जिम्मेदार हैं। हिंदी को बोलने और लिखने में शर्म महसूस करने की भावना से ऊपर उठकर काम करना होगा, तभी हिंदी को उसका खोया गौरव और सम्मान मिल सकेगा।
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सहारनपुर। हिंदी हमारी मातृभाषा है। यह विचारों, भावनाओं और संवेदनाओं को व्यक्त करने का सबसे सशक्त माध्यम है। इसके माध्यम से हम अपनी बात को सहजता और सुगमता से दूसरों तक पहुंचा पाते हैं। वैश्वीकरण के दौर में हिंदी विश्व स्तर पर प्रभावशाली भाषा बनकर उभरी है। हिंदी एक ऐसी भाषा है जो सहज व सरल होने के साथ ही रोजगार की भी भाषा है। हिंदी को विज्ञान और प्रौद्योगिकी की भाषा मानने की जरूरत है। उच्च स्तरीय पाठ्यक्रम सामग्री और सरल शब्दावली अगर बनाई जाए तो हिंदी पढ़ने और लिखने के प्रति लोगों की रुचि बढ़ेगी। शिक्षिकाओं का मानना है कि हिंदी को हीन भाषा न समझा जाए। इसके जन जन की भाषा बनाने के लिए प्रयास करने होंगे।
महिला महाविद्यालय बेहट की प्राचार्य डॉ. नीतू यादव ने बताया कि महाविद्यालय में आयोजित किए जाने वाले विभिन्न कार्यक्रमों के माध्यम से छात्राओं को हिंदी के प्रति जागरूक किया जाता है। हिंदी विश्व में बोली जाने वाली प्रमुख एवं प्राचीन भाषाओं में से एक है। किसी भी देश की पहचान उस देश की भाषा व संस्कृति से की जाती है। हिंदी हमारे देश की सभ्यता, संस्कृति एवं संस्कारों का प्रतिबिंब है। वैसे तो भारतवर्ष में अनेकों भाषाएं बोली जाती हैं, लेकिन राष्ट्र भाषा होने के नाते हिंदी पूरे देश में एक विशिष्ट स्थान रखती है।
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बच्चों को लगता है हिंदी की कोई आवश्यकता नहीं
छुटमलपुर इंटर कॉलेज में हिंदी की अध्यापक अर्चना शर्मा कहती हैं कि लोग हिंदी बोलते वक्त खुद को हीन समझते हैं। सोचते हैं कि हिंदी बोलने पर पूरा सम्मान नहीं मिलेगा। जबकि ऐसा नहीं है। बच्चों को लगता है हिंदी की कोई आवश्यकता नहीं है, लेकिन उन्हें यह समझना होगा कि मातृभाषा सिर्फ भाषा नहीं है, बल्कि उसके साथ अपनी संस्कृति भी जुड़ी हुई है, अगर अपनी भाषा छोड़ देंगे तो संस्कृति भी छूट जाएगी।
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बच्चों के साथ इच्छुक अभिभावकों को भी हिंदी सिखा
परिषदीय प्राथमिक विद्यालय की शिक्षक अंजलि आर्य बताती हैं कि पहले विद्यालय में आने वाली अधिकतर अभिभावक या तो अंगूठा लगाती थीं या उर्दू भाषा में हस्ताक्षर करती थीं। उन्होंने बच्चों के साथ ही इच्छुक अभिभावकों को भी हिंदी सिखाने का कार्य किया। इसका परिणाम है कि ये महिलाएं अब हिंदी को अच्छे से पढ़ पाती हैं और लिख पाती हैं। बैंक आदि के कार्य भी वे स्वयं कर लेती हैं।
हिंदी की उपेक्षा के लिए हिंदीभाषी लोग ही जिम्मेदार
चौधरी कलीराम डिग्री कॉलेज नागल की प्राचार्य डॉ. अमिता सिंह कहती हैं कि हिंदी की उपेक्षा के लिए हिंदीभाषी लोग ही जिम्मेदार हैं। हिंदी को बोलने और लिखने में शर्म महसूस करने की भावना से ऊपर उठकर काम करना होगा, तभी हिंदी को उसका खोया गौरव और सम्मान मिल सकेगा।