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घाड़ में नहीं चमका ‘विकास का सूरज’
ब्यूरो/अमर उजाला, सहारनपुर
Updated Fri, 06 Jan 2017 12:14 AM IST
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सहारनपुर के घाड इलाके में बदहाली की एक तस्वीर।
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो
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सहारनपुर के घाड़ क्षेत्र में आजादी के 70 सालों बाद भी पूरा विकास नहीं हो सका है। आज भी यहां के बासिंदे मूलभूत सुविधाओं को तरस रहे हैं। यहां बेरोजगारी है, लाचारी है।
कभी बाढ़ तो कभी सूखा यहां के खेतिहर किसानों के लिए अभिशाप रहे हैं। इस क्षेत्र से विधायक भी रहे पूर्व सांसद जगदीश राणा कैबिनेट में मंत्री रहे लेकिन बेहट की तकदीर नहीं बदली।
चुनाव में विकास की बातें और वादे तो खूब होते हैं लेकिन उनमें पूरे कितने होते हैं यह जनता बखूबी जानती है। इस क्षेत्र की जनता ने अपनी समस्याएं निपटाने के लिए हर दल को आजमाया।
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जनप्रतिनिधि तो बदले मगर, यहां की तकदीर जस की तस ही रही है। इस बार भी चुनावी दुदुंभी बजने के साथ ही भले ही नेता स्थानीय मुद्दों पर चुनावी बिसात बिछाने की तैयारी में हैं। उनकी निगाहें जातिगत आंकड़ों पर भी टिकी हैं।
संख्या के मामले में प्रदेश की नंबर-1 विधानसभा बेहट की सीमा तीन राज्यों से जुड़ी हैं। मां शाकंभरी का मंदिर होने के कारण यहां देश-विदेश से श्रद्धालु भी पहुंचते हैं। यह सीट राजनीतिक दलों के लिए इसलिए भी खास मानी जा रही है कि क्योंकि इस पर अब तक किसी एक पार्टी का कब्जा नहीं रहा है।
1993 से लेकर 2012 के बीच हुए पांच चुनावों में भाजपा, सपा और बसपा के अलावा निर्दलीय प्रत्याशी को भी इस सीट से जीत का सेहरा बंधा है।
ऐसे में सियासी दल हर हाल में अपने पुराने फार्मूले को नए समीकरणों के साथ इस सीट पर कब्जा जमाना चाहते हैं।
वर्ष 2012 मेें पहली बार इस सीट पर दलित मतों के साथ अगड़ी जातियों के सोशल इंजीनियरिंग फार्मूले के दम पर बसपा से महावीर राणा विजयी हुए थे। हालांकि वर्ष 1996 और 2002 के चुनाव में वर्तमान विधायक महावीर राणा के भाई पूर्व सांसद जगदीश राणा सपा के टिकट पर लगातार दो बार विधायक रहे थे।
वर्ष 2007 के चुुनाव में इमरान मसूद ने निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में इस सीट पर जीत हासिल की थी। पिछले पांच चुनावों के आंकड़ों को देखें तो सभी दलों के लिए यहां समान संभावनाएं नजर आ रही हैं।
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कभी बाढ़ तो कभी सूखा यहां के खेतिहर किसानों के लिए अभिशाप रहे हैं। इस क्षेत्र से विधायक भी रहे पूर्व सांसद जगदीश राणा कैबिनेट में मंत्री रहे लेकिन बेहट की तकदीर नहीं बदली।
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चुनाव में विकास की बातें और वादे तो खूब होते हैं लेकिन उनमें पूरे कितने होते हैं यह जनता बखूबी जानती है। इस क्षेत्र की जनता ने अपनी समस्याएं निपटाने के लिए हर दल को आजमाया।
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जनप्रतिनिधि तो बदले मगर, यहां की तकदीर जस की तस ही रही है। इस बार भी चुनावी दुदुंभी बजने के साथ ही भले ही नेता स्थानीय मुद्दों पर चुनावी बिसात बिछाने की तैयारी में हैं। उनकी निगाहें जातिगत आंकड़ों पर भी टिकी हैं।
संख्या के मामले में प्रदेश की नंबर-1 विधानसभा बेहट की सीमा तीन राज्यों से जुड़ी हैं। मां शाकंभरी का मंदिर होने के कारण यहां देश-विदेश से श्रद्धालु भी पहुंचते हैं। यह सीट राजनीतिक दलों के लिए इसलिए भी खास मानी जा रही है कि क्योंकि इस पर अब तक किसी एक पार्टी का कब्जा नहीं रहा है।
1993 से लेकर 2012 के बीच हुए पांच चुनावों में भाजपा, सपा और बसपा के अलावा निर्दलीय प्रत्याशी को भी इस सीट से जीत का सेहरा बंधा है।
ऐसे में सियासी दल हर हाल में अपने पुराने फार्मूले को नए समीकरणों के साथ इस सीट पर कब्जा जमाना चाहते हैं।
वर्ष 2012 मेें पहली बार इस सीट पर दलित मतों के साथ अगड़ी जातियों के सोशल इंजीनियरिंग फार्मूले के दम पर बसपा से महावीर राणा विजयी हुए थे। हालांकि वर्ष 1996 और 2002 के चुनाव में वर्तमान विधायक महावीर राणा के भाई पूर्व सांसद जगदीश राणा सपा के टिकट पर लगातार दो बार विधायक रहे थे।
वर्ष 2007 के चुुनाव में इमरान मसूद ने निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में इस सीट पर जीत हासिल की थी। पिछले पांच चुनावों के आंकड़ों को देखें तो सभी दलों के लिए यहां समान संभावनाएं नजर आ रही हैं।