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Saharanpur News: इमरजेंसी से लेकर दो परिवारों के हाथों में रही जड़ौदा पांडा की चौधराहट
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संवाद न्यूज एजेंसी
बड़गांव। त्यागी बहुल ग्राम पंचायत जड़ौदा पांडा ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व रखने वाली बड़ी पंचायतों में शुमार होती है। इस पंचायत में चार मजरे किशनपुरा, जयपुर, शेरपुर, घिसरपड़ी है, जिनमें बीस हजार की आबादी निवास करती है। इमरजेंसी से लेकर गांव में दो ही परिवारों की चौधराहट रही। इनमें भी सबसे ज्यादा ढाई दशक तक जनार्धन त्यागी परिवार का प्रभाव गांव की राजनीति पर रहा।
पुरुषोत्तम त्यागी 1972 में पहली बार जड़ौदा पांडा के प्रधान बने, जो वर्ष 1982 तक काबिज रहे। देश में इमरजेंसी लगी उसके बाद 1988 का चुनाव जनार्धन त्यागी जीते। वर्ष 1994 तक यही प्रधान रहे। अनारक्षित महिला सीट आने पर उन्होंने वर्ष 1994 में पत्नी कमलेश को चुनाव लड़वा प्रधानी जितवाई।
हालांकि वर्ष 2000 में हुए पंचायत चुनाव में दोनों परिवार को दरकिनार कर मतदाताओं ने सुधा त्यागी को निर्वाचित किया। वर्ष 2005 में सुधा त्यागी के पति राजपाल त्यागी चुनाव जीते, लेकिन बीमारी के चलते उनका निधन हो गया। वर्ष 2006 के उपचुनाव में जनार्धन त्यागी की पत्नी कमलेश फिर से उप चुनाव में जीत दर्ज की।
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वर्ष 2010 में सीट एससी आरक्षित हुई, जिस पर राकेश त्यागी ने अपनी अनुसूचित जाति की पत्नी विनिता को चुनाव लड़वाकर जीत दिलाई। वर्ष 2015 के चुनाव में जनार्धन त्यागी ने छोटे भाई राकेश त्यागी की पत्नी सुषमा प्रधान बनीं। गत पंचायत चुनाव में इन दोनों परिवारों से अलग सबसे कम उम्र के विशांत उर्फ शालू त्यागी ने प्रधानी का चुनाव जीता।
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बड़गांव। त्यागी बहुल ग्राम पंचायत जड़ौदा पांडा ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व रखने वाली बड़ी पंचायतों में शुमार होती है। इस पंचायत में चार मजरे किशनपुरा, जयपुर, शेरपुर, घिसरपड़ी है, जिनमें बीस हजार की आबादी निवास करती है। इमरजेंसी से लेकर गांव में दो ही परिवारों की चौधराहट रही। इनमें भी सबसे ज्यादा ढाई दशक तक जनार्धन त्यागी परिवार का प्रभाव गांव की राजनीति पर रहा।
पुरुषोत्तम त्यागी 1972 में पहली बार जड़ौदा पांडा के प्रधान बने, जो वर्ष 1982 तक काबिज रहे। देश में इमरजेंसी लगी उसके बाद 1988 का चुनाव जनार्धन त्यागी जीते। वर्ष 1994 तक यही प्रधान रहे। अनारक्षित महिला सीट आने पर उन्होंने वर्ष 1994 में पत्नी कमलेश को चुनाव लड़वा प्रधानी जितवाई।
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हालांकि वर्ष 2000 में हुए पंचायत चुनाव में दोनों परिवार को दरकिनार कर मतदाताओं ने सुधा त्यागी को निर्वाचित किया। वर्ष 2005 में सुधा त्यागी के पति राजपाल त्यागी चुनाव जीते, लेकिन बीमारी के चलते उनका निधन हो गया। वर्ष 2006 के उपचुनाव में जनार्धन त्यागी की पत्नी कमलेश फिर से उप चुनाव में जीत दर्ज की।
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वर्ष 2010 में सीट एससी आरक्षित हुई, जिस पर राकेश त्यागी ने अपनी अनुसूचित जाति की पत्नी विनिता को चुनाव लड़वाकर जीत दिलाई। वर्ष 2015 के चुनाव में जनार्धन त्यागी ने छोटे भाई राकेश त्यागी की पत्नी सुषमा प्रधान बनीं। गत पंचायत चुनाव में इन दोनों परिवारों से अलग सबसे कम उम्र के विशांत उर्फ शालू त्यागी ने प्रधानी का चुनाव जीता।