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Saharanpur News: खुशहाली के लिए जुड्डी गांव में नहीं चढ़ा तवा या कढ़ाई
Sun, 15 Sep 2024 02:14 AM IST
मेरठ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, सहारनपुर
संवाद न्यूज एजेंसी, सहारनपुर
Updated Sun, 15 Sep 2024 02:14 AM IST
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नकुड़(सहारनपुर)। सदियों से चली आ रही परंपरा का निर्वहन करते हुए शनिवार को जुड्डी गांव में किसी भी हिंदू परिवार के घर पर तवा या कढ़ाई नहीं चढ़ी। खेड़ा मंदिर पर हुए यज्ञ में ग्रामीणों ने आहूति दी। इसके बाद करीब पांच क्विंटल हलवे का प्रसाद बांटा गया। पुरुष हो या महिला सभी ने हलवे का प्रसाद लिया। मान्यता है कि पशुओं की सलामती और गांव की खुशहाली के लिए हर साल यह आयोजन होता है। इस आयोजन की खासियत यह है कि गांव के मुस्लिम परिवार भी अन्न दान और अन्य खाद्यय सामग्री भिजवाते हैं।
दरअसल, सदियों से चली आ रही इस परंपरा को गांव के लोग पूरी श्रद्धा से निभाते चले आ रहे हैं। मान्यता है कि खेड़ा महाराज गांव का बादशाह होता है और अगर खेड़ा महाराज प्रसन्न हो तो गांव में कोई बुरा साया या महामारी प्रवेश नहीं कर सकती है। खेड़ा महाराज को प्रसन्न करने के लिए ही हर वर्ष यज्ञ व भंडारे का आयोजन भाद्रपद शुक्लपक्ष के अंतिम शनिवार को किया जाता है। शनिवार की सुबह गांव के खेड़ा मंदिर पर खेड़ा महाराज को प्रसन्न करने के लिए पंडित सहदेव जी ने हवन-पूजन कराया। हवन में ग्रामीणों ने बारी-बारी से यज्ञ में आहूती देते हुए गांव में सुख शांति की कामना की। इसके पश्चात पूरे गांव की खेतों से होते हुए परिक्रमा कर दूध और गंगाजल मिलाकर जलधारा छोड़ी गई और बाद में प्रसाद का वितरण किया गया। गुर्जर बाहुल्य गांव जुड्डी की आबादी करीब साढ़े पांच हजार हैं। पूर्व प्रधान जबर सिंह व चौधरी चरण सिंह ने बताया कि गांव इसमें गुर्जर, अनुसूचित जाति, मुस्लिम और अन्य बिरादरी के लोग रहते हैं। मुस्लिम परिवार पूजा में शामिल नहीं होते हैं, लेकिन अन्नदान से लेकर अन्य खाद्यय सामग्री में उनका पूरा सहयोग रहता है।
1004 वर्ष पुराना है गांव का इतिहास
गांव जुड्डी का इतिहास करीब 1004 वर्ष पुराना बताया जाता है। चौधरी हुकुम सिंह, रामजीलाल, रामशरण, मांगेराम व प्रदीप ने बताया कि इससे पूर्व इस गांव के लोग करीब आधा किलोमीटर दूर नाहरपुर नामक गांव में रहते थे। लेकिन वहां बरसात में अत्याधिक जलभराव होने के कारण यहां आकर बस गए थे। अब नाहरपुर गांव की जमीन खेती होती है, लेकिन नाहरपुर का खेड़ा आज भी वहां विराजमान है और ग्रामीण गांव के खेड़े के साथ-साथ उक्त खेड़े की भी पूजा करते चले आ रहे हैं।
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चौराहों पर सुनाई जाती थी हीर-रांझा व रूप-बसंत की कहानियां
गांव जुड्डी में खेड़ा मंदिर पर होने वाले इस आयोजन की शुरुआत करीब पंद्रह दिन पहले हो जाती थी। पूर्व प्रधान चौधरी मोहर सिंह व नफे सिंह आदि ने बताया कि खेड़ा मंदिर पर यज्ञ से करीब पंद्रह दिन पहले रोजाना रात्रि को गांव के चौराहों पर जोगियों के द्वारा सारंगी व ढोलक के साथ हीर-रांझा, राजा हरिश्चंद्र, रूप-बसंत व पूरणमल आदि की कहानियां गाकर सुनायी जाती थी। यह कार्यक्रम अलग-अलग रात्रि को पूरे गांव लगभग सभी चौराहों किया जाता था। हालांकि गांव में टीवी व मनोरंजन के अन्य साधन आने के कारण यह सब लुप्त हो गया है।
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दरअसल, सदियों से चली आ रही इस परंपरा को गांव के लोग पूरी श्रद्धा से निभाते चले आ रहे हैं। मान्यता है कि खेड़ा महाराज गांव का बादशाह होता है और अगर खेड़ा महाराज प्रसन्न हो तो गांव में कोई बुरा साया या महामारी प्रवेश नहीं कर सकती है। खेड़ा महाराज को प्रसन्न करने के लिए ही हर वर्ष यज्ञ व भंडारे का आयोजन भाद्रपद शुक्लपक्ष के अंतिम शनिवार को किया जाता है। शनिवार की सुबह गांव के खेड़ा मंदिर पर खेड़ा महाराज को प्रसन्न करने के लिए पंडित सहदेव जी ने हवन-पूजन कराया। हवन में ग्रामीणों ने बारी-बारी से यज्ञ में आहूती देते हुए गांव में सुख शांति की कामना की। इसके पश्चात पूरे गांव की खेतों से होते हुए परिक्रमा कर दूध और गंगाजल मिलाकर जलधारा छोड़ी गई और बाद में प्रसाद का वितरण किया गया। गुर्जर बाहुल्य गांव जुड्डी की आबादी करीब साढ़े पांच हजार हैं। पूर्व प्रधान जबर सिंह व चौधरी चरण सिंह ने बताया कि गांव इसमें गुर्जर, अनुसूचित जाति, मुस्लिम और अन्य बिरादरी के लोग रहते हैं। मुस्लिम परिवार पूजा में शामिल नहीं होते हैं, लेकिन अन्नदान से लेकर अन्य खाद्यय सामग्री में उनका पूरा सहयोग रहता है।
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1004 वर्ष पुराना है गांव का इतिहास
गांव जुड्डी का इतिहास करीब 1004 वर्ष पुराना बताया जाता है। चौधरी हुकुम सिंह, रामजीलाल, रामशरण, मांगेराम व प्रदीप ने बताया कि इससे पूर्व इस गांव के लोग करीब आधा किलोमीटर दूर नाहरपुर नामक गांव में रहते थे। लेकिन वहां बरसात में अत्याधिक जलभराव होने के कारण यहां आकर बस गए थे। अब नाहरपुर गांव की जमीन खेती होती है, लेकिन नाहरपुर का खेड़ा आज भी वहां विराजमान है और ग्रामीण गांव के खेड़े के साथ-साथ उक्त खेड़े की भी पूजा करते चले आ रहे हैं।
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चौराहों पर सुनाई जाती थी हीर-रांझा व रूप-बसंत की कहानियां
गांव जुड्डी में खेड़ा मंदिर पर होने वाले इस आयोजन की शुरुआत करीब पंद्रह दिन पहले हो जाती थी। पूर्व प्रधान चौधरी मोहर सिंह व नफे सिंह आदि ने बताया कि खेड़ा मंदिर पर यज्ञ से करीब पंद्रह दिन पहले रोजाना रात्रि को गांव के चौराहों पर जोगियों के द्वारा सारंगी व ढोलक के साथ हीर-रांझा, राजा हरिश्चंद्र, रूप-बसंत व पूरणमल आदि की कहानियां गाकर सुनायी जाती थी। यह कार्यक्रम अलग-अलग रात्रि को पूरे गांव लगभग सभी चौराहों किया जाता था। हालांकि गांव में टीवी व मनोरंजन के अन्य साधन आने के कारण यह सब लुप्त हो गया है।