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सिंचाई की टपक एवं फव्वारा विधि को बढ़ावा देगा उद्यान विभाग

Thu, 04 Feb 2021 11:26 PM IST
Meerut Bureau मेरठ ब्यूरो
Updated Thu, 04 Feb 2021 11:26 PM IST
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Drip and sprinkler method of irrigation will promote horticulture department
सहारनपुर। जनपद में लगातार गिर रहे जलस्तर को रोकने में सिंचाई की टपक एवं फव्वारा विधि वरदान साबित होगी। इससे पानी के साथ ही समय की भी बचत होगी। उद्यान विभाग इसके लिए किसानों को 80 से 90 प्रतिशत तक अनुदान देगा। जिले में 2182 हेक्टेयर क्षेत्रफल में इसे लगाने का लक्ष्य दिया गया है।
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कम पानी से अधिक सिंचाई करने के उद्देश्य से सरकार खेत में ड्रिप एवं स्प्रिंकलर लगवाने को बढ़ावा दे रही है। ड्रिप विधि में खेत में प्लास्टिक के पाइप दबा दिए जाते हैं और उन पाइपों से छोटे छोटे रबर के पाइप जुडे़ रहते हैं। जिनसे पानी पौधों की जड़ों में रिसता है। इन पाइपों का सीधा कनेक्शन ट्यूबवेल से होता है। बागवानी में पेड़ों की जड़ों में टपक विधि से पानी जाता है। जिससे कम पानी में अधिक सिंचाई संभव होती है। इस विधि में किसान ट्यूबवेल के हौज में जल विलेय उर्वरक को घोल सकते हैं। जिससे उर्वरक पानी के साथ मिलकर पौधों की जड़ों में चला जाता है। स्प्रिंकलर (फव्वारा) खेत में बिछे पाईपों से जुडे़ रहते हैं। जिससे फव्वारा छिड़काव विधि से खेत की सिंचाई करता है।
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इन फसलों में लगेगा ड्रिप एवं स्प्रिंकलर
बागवानी में आम, अमरूद, नींबू, बेर, अनार, आडू, लोकाट, आलू बुखारा, नाशपाती, पपीता, केला आदि शामिल हैं। इन बागों में ड्रिप लगाने की योजना है। सब्जियों में टमाटर, बैंगन, मिर्च, शिमला मिर्च, गोभी वर्गीय, कद्दू वर्गीय सहित अन्य फसलें में ड्रिप एवं स्प्रिंकलर लगाए जा सकते हैं। इसके अलावा धान को छोड़कर अन्य फसलों जैसे गन्ना, गेहूं, तिलहन और दलहन आदि फसल वाले खेत में इसे स्थापित किया जा सकता है।
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जनपद को 2182 हेक्टेयर क्षेत्रफल में ड्रिप एवं स्प्रिंकलर विधि लगाने का लक्ष्य मिला है। इसमें लघु एवं सीमांत किसानों को लागत का 90 प्रतिशत और दो हेक्टेयर से अधिक जोत वाले किसानों को 80 फीसदी अनुदान दिया जाएगा। अनुदान सीधे किसानों के खाते में डीबीटी (डायरेक्ट बेनीफिट ट्रांसफर) कर दिया जाएगा।
अरुण कुमार, जिला उद्यान अधिकारी।
ड्रिप एवं स्प्रिंकलर सिंचाई पद्घति के लाभ
- कम पानी से अधिक क्षेत्रफल में सिंचाई
- पौधों की जड़ों में पानी देने से पानी की बचत
- पानी देने के लिए खेत में मेढ़ की आवश्यकता नहीं
- पानी के साथ जल विलेय उर्वरक सीधे पौधों की जड़ों में जाने से उत्पादकता में वृद्धि
- उबड़ खाबड़ भूमि में पौधों की सिंचाई संभव
- सिंचाई व्यय के साथ समय की भी बचत
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