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आचार्य विश्वंभर देव पंचतत्व में विलीन
ब्यूरो/अमर उजाला, देवबंद
Updated Sun, 11 Dec 2016 12:05 AM IST
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स्वतंत्रता सेनानी आचार्य विश्वंभर देव शास्त्री (फाइल फोटो)
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो
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स्वतंत्रता सेनानी आचार्य विश्वंभर देव शास्त्री नहीं रहे। वह 91 वर्ष के थे। शास्त्री जी लंबे समय से अस्वस्थ चल रहे थे। शुक्रवार की देर रात्रि में उन्होंने अपने शिक्षक नगर आवास पर ही अंतिम सांस ली। परिजनों ने शनिवार को उनके शव का देवी कुंड स्थित श्मशान घाट में अंतिम संस्कार किया।
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को अपना आदर्श मानने वाले 91 वर्षीय स्वतंत्रता सेनानी आचार्य विश्वंभर देव शास्त्री का जन्म 15 अक्तूबर 1925 को हुआ था। हिंदी एवं संस्कृत प्रेमी शास्त्री जी ने लंबे समय तक एचएवी इंटर कॉलेज देवबंद में संस्कृत शिक्षक के रूप में अमूल्य सेवाएं दी। उन्होंने 1968 में हिंदी में पत्रकारिता आरंभ की।
एचएवी इंटर कॉलेज की वार्षिक पत्रिका के प्रकाशन में भी उनका योगदान रहा है। उन्होंने वैदिक सूक्त व्याख्या, अग्निपथ के पथिक नामक पुस्तकें भी लिखी। कई बार उन्हें सम्मानित भी किया।
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शनिवार को उनकी अंतिम शवयात्रा में नगर के गणमान्य लोग उपस्थित रहे। उनके पुत्र नरेंद्र पाल शर्मा ने शव को मुखाग्नि दी। उन्होंने कभी पेंशन नहीं ली। भाजपा नेता दीपक राज सिंघल, राज किशोर गुप्ता, अधिवक्ता भूदत्त शर्मा, सत्यप्रकाश शर्मा, कवि और लेखक डॉ. शमीम देवबंदी, कमल देवबंदी, पूरण चंद शास्त्री, लोकेश वत्स, महताब आजाद, रणधीर सिंह, मीरा चौरसिया, ममता वर्मा, संदीप शर्मा, आदि ने शोक व्यक्त किया।
देवबंद। आचार्य विश्वंभर देव शास्त्री भले ही स्वतंत्रता सेनानी रहे हैं, लेकिन उनका अंतिम संस्कार राजकीय सम्मान के साथ नहीं किया। एसडीएम देवेंद्र प्रताप सिंह ने बताया रिकार्ड में उनका नाम स्वतंत्रता सेनानियों की सूची में नहीं मिला है।
साथ ही न ही उनके पास स्वतंत्रता सेनानी का कोई सरकारी प्रमाण मिला है। इस कारण उनका राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार नहीं किया।
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राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को अपना आदर्श मानने वाले 91 वर्षीय स्वतंत्रता सेनानी आचार्य विश्वंभर देव शास्त्री का जन्म 15 अक्तूबर 1925 को हुआ था। हिंदी एवं संस्कृत प्रेमी शास्त्री जी ने लंबे समय तक एचएवी इंटर कॉलेज देवबंद में संस्कृत शिक्षक के रूप में अमूल्य सेवाएं दी। उन्होंने 1968 में हिंदी में पत्रकारिता आरंभ की।
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एचएवी इंटर कॉलेज की वार्षिक पत्रिका के प्रकाशन में भी उनका योगदान रहा है। उन्होंने वैदिक सूक्त व्याख्या, अग्निपथ के पथिक नामक पुस्तकें भी लिखी। कई बार उन्हें सम्मानित भी किया।
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शनिवार को उनकी अंतिम शवयात्रा में नगर के गणमान्य लोग उपस्थित रहे। उनके पुत्र नरेंद्र पाल शर्मा ने शव को मुखाग्नि दी। उन्होंने कभी पेंशन नहीं ली। भाजपा नेता दीपक राज सिंघल, राज किशोर गुप्ता, अधिवक्ता भूदत्त शर्मा, सत्यप्रकाश शर्मा, कवि और लेखक डॉ. शमीम देवबंदी, कमल देवबंदी, पूरण चंद शास्त्री, लोकेश वत्स, महताब आजाद, रणधीर सिंह, मीरा चौरसिया, ममता वर्मा, संदीप शर्मा, आदि ने शोक व्यक्त किया।
देवबंद। आचार्य विश्वंभर देव शास्त्री भले ही स्वतंत्रता सेनानी रहे हैं, लेकिन उनका अंतिम संस्कार राजकीय सम्मान के साथ नहीं किया। एसडीएम देवेंद्र प्रताप सिंह ने बताया रिकार्ड में उनका नाम स्वतंत्रता सेनानियों की सूची में नहीं मिला है।
साथ ही न ही उनके पास स्वतंत्रता सेनानी का कोई सरकारी प्रमाण मिला है। इस कारण उनका राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार नहीं किया।