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देवबंद में ठेके पर बनवाए जाते हैं पासपोर्ट
Updated Fri, 11 Aug 2017 12:36 AM IST
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देवबंद (सहारनपुर)। जिस जगह आईबी और रॉ से लेकर तमाम खुफिया एजेंसियों की नजरें गड़ी रहती हैं। वहां चार से पांच हजार रुपये में ठेका देकर आसानी से पासपोर्ट बनवाया जा सकता है, और इसमें किसी प्रकार का कोई झमेले भी नहीं होता। बांग्लादेशी आतंकी अब्दुल्ला का पासपोर्ट भी इसी प्रकार ठेके के तहत बना हुआ है।
देवबंद में पासपोर्ट बनवाने के लिए कड़ी प्रक्रिया से गुजरना मानो बीते समय की बात हो गई। यहां अगर किसी को पासपोर्ट बनवाना है तो बस एजेंट के पास जाओ और चार से पांच हजार रुपये में ठेका देकर बेफिक्र हो जाओ। एप्लीकेशन फार्म भरने से लेकर स्थानीय जांच कराने और साहिबाबाद कार्यालय तक की जिम्मेदार यह एजेंट निभाते हैं। इतना ही नहीं पैसे कमाने के लालच में जांचकर्ता पासपोर्ट बनवाने वाले का भौतिक सत्यापन भी नहीं करते। जिसके चलते यहां कोई भी फर्जी आईडी के आधार पर आसानी से पासपोर्ट बनवा सकता है। कुटेसरा से पकड़े गए बांग्लादेशी आतंकी अब्दुल्ला का पासपोर्ट भी इसी ठेका प्रथा के तहत बनवाया गया था। एक अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि नगर और आसपास के देहात इलाकों में पासपोर्ट बनवाने के लिए करीब दो दर्जन से अधिक एजेंट बैठे हुए हैं जो ठेका प्रथा के तहत पासपोर्ट के सभी काम करा रहे हैं। इनमें किसी के पास भी लाइसेंस नहीं है।
पासपोर्ट की इंक्वायरी पर एक नजर
देवबंद। पहले पासापोर्ट बनवाने वाले को पुलिस और स्थानीय अभिसूचना इकाई (एलआईयू) की जांच से गुजरना पड़ता था। पुलिस रिकॉर्ड में उस व्यक्ति की जांच कर रिपोर्ट लगती थी कि आवेदक पर किसी प्रकार का कोई आपराधिक मामला तो नहीं दर्ज है। जबकि एलआईयू अधिकारी उसके घर जाकर भौतिक सत्यापन करते थे। लेकिन पिछले करीब डेढ़ वर्ष से एलआईयू का रोल पासपोर्ट की इंक्वायरी में बेहद कम हो गया। वह केवल आवेदक के किसी प्रकार की गलत गतिविधियों में शामिल न होने की रिपोर्ट लगा देते हैं। जबकि घर जाकर और उसके आस पड़ोस में आवेदक के बारे में पूछताछ करने के लिए उन्हें मना कर दिया गया है। वहीं कोतवाली में पासपोर्ट की इंक्वायरी होमगार्ड के हाथों से होकर गुजरती है।
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देवबंद में पासपोर्ट बनवाने के लिए कड़ी प्रक्रिया से गुजरना मानो बीते समय की बात हो गई। यहां अगर किसी को पासपोर्ट बनवाना है तो बस एजेंट के पास जाओ और चार से पांच हजार रुपये में ठेका देकर बेफिक्र हो जाओ। एप्लीकेशन फार्म भरने से लेकर स्थानीय जांच कराने और साहिबाबाद कार्यालय तक की जिम्मेदार यह एजेंट निभाते हैं। इतना ही नहीं पैसे कमाने के लालच में जांचकर्ता पासपोर्ट बनवाने वाले का भौतिक सत्यापन भी नहीं करते। जिसके चलते यहां कोई भी फर्जी आईडी के आधार पर आसानी से पासपोर्ट बनवा सकता है। कुटेसरा से पकड़े गए बांग्लादेशी आतंकी अब्दुल्ला का पासपोर्ट भी इसी ठेका प्रथा के तहत बनवाया गया था। एक अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि नगर और आसपास के देहात इलाकों में पासपोर्ट बनवाने के लिए करीब दो दर्जन से अधिक एजेंट बैठे हुए हैं जो ठेका प्रथा के तहत पासपोर्ट के सभी काम करा रहे हैं। इनमें किसी के पास भी लाइसेंस नहीं है।
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पासपोर्ट की इंक्वायरी पर एक नजर
देवबंद। पहले पासापोर्ट बनवाने वाले को पुलिस और स्थानीय अभिसूचना इकाई (एलआईयू) की जांच से गुजरना पड़ता था। पुलिस रिकॉर्ड में उस व्यक्ति की जांच कर रिपोर्ट लगती थी कि आवेदक पर किसी प्रकार का कोई आपराधिक मामला तो नहीं दर्ज है। जबकि एलआईयू अधिकारी उसके घर जाकर भौतिक सत्यापन करते थे। लेकिन पिछले करीब डेढ़ वर्ष से एलआईयू का रोल पासपोर्ट की इंक्वायरी में बेहद कम हो गया। वह केवल आवेदक के किसी प्रकार की गलत गतिविधियों में शामिल न होने की रिपोर्ट लगा देते हैं। जबकि घर जाकर और उसके आस पड़ोस में आवेदक के बारे में पूछताछ करने के लिए उन्हें मना कर दिया गया है। वहीं कोतवाली में पासपोर्ट की इंक्वायरी होमगार्ड के हाथों से होकर गुजरती है।
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