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बदहाली का शिकार कंपनी बाग, झील वर्षों से पड़ी है सूखी
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कम्पनी बाग मे टूटी पडी बेंच
- फोटो : SAHARANPUR
सहारनपुर। ऐतिहासिक कंपनी बाग, चारों तरफ हरियाली और स्वच्छ वातावरण। सुबह और शाम प्रतिदिन हजारों लोग यहां आते हैं। मगर अनदेखी का शिकार हो रहा कंपनी बाग जंगल का रूप ले चुका है। विशाल झील की कोख भी वर्षों से सूखी पड़ी है। जरूरत है इस तरफ ध्यान देने की क्योंकि जो कंपनी बाग इंसानों की सेहत का ख्याल रखने को उपयुक्त माहौल दे रहा है, उसकी भी सेहत में सुधार किया जाना चाहिए।
कंपनी बाग के तीन गेट हैं, जिनमें पहला नवाबगंज चौक, दूसरा बेरीबाग तथा तीसरा माधवनगर की ओर लगा है। बाग की सबसे बड़ी पहचान इनमें खड़े विभिन्न प्रजातियों के पेड़ और पौधे हैं। कई पेड़ 100 वर्ष से अधिक पुराने बताए जाते हैं, जिन्हें कभी अंग्रेजों ने लगाया था। इन पेड़ों की ऊंचाई 80 से 100 फुट तक है। सुंदर सड़कों पर पेड़ों की घनी छाया तन और मन को शीतलता प्रदान करती है। मगर इसके बावजूद कंपनी बाग अधूरा नजर आता है। कंपनी बाग में अंग्रेजों के जमाने की झील है, जिसके ऊपर दो छोटे पुल भी बनाए गए हैं। मगर इस झील में लोगों ने कभी पानी नहीं देखा है। माना जाता है कि अंग्रेजों के समय में झील में ना केवल पानी रहता था, बल्कि अंग्रेज इसमें नौका विहार भी करते थे। मगर प्रशासन की अनदेखी के कारण झील सूखी पड़ी है, जिसमें जंगली पौधे और घास उगी है। पुल के ऊपर लगी ग्रिल भी गायब है। बाग के ही भीतर जापानी गार्डन है, जिसमें विभिन्न प्रजाति के फूलों और सजावट के पौधे हुआ करते थे, मगर वर्तमान में जापानी गार्डन जंगल बना हुआ है। गार्डन के बीच में भी एक झील बनाई गई है, जो सूखी पड़ी है। बाग में रास्तों के दोनों ओर लोगों के बैठने के लिए बेंच भी रखी गई हैं, मगर अनेक बेंच जर्जर हो चुकी हैं। कई जगह से बाउंड्रीवाल भी टूटी पड़ी है, जिसके ऊपर से लोग बाग में एंट्री करते हैं। इतना ही नहीं, अब कुछ अवांछनीय लोग भी कंपनी बाग में पहुंचने लगे हैं, जो यहां मदिरापान कर गिलास और शराब की बोतल तक फेंक जाते हैं।
- यह भी है बाग की खासियत
कंपनी बाग केवल लोगों के सैरसपाटे के लिए नहीं बना है, बल्कि यह एक औद्यानिक प्रयोग और प्रशिक्षण केंद्र भी है। यहां फ्रूट्स प्लांट है। आम, लोकाट, नींबू, कटहल, अनार, चीकू, अमरूद, और लीची का संकलन होता है। लगभग सभी फलों की नई प्रजातियां तैयार की जाती हैं। गुलाब के अलावा लगभग सभी प्रकार के फूल और सजावट के पौधों की नर्सरी भी है। विभिन्न प्रकार के प्रशिक्षण भी दिए जाते हैं, जिनमें मशरूम उगाना समेत कई तरह के प्रशिक्षण शामिल हैं। कंपनी बाग में प्रतिदिन सुबह और शाम को ढाई से तीन हजार लोग टहलने पहुंचते हैं।
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- मुगलों ने फरहत बख्श, अंग्रेजों ने नाम रखा कंपनी बाग
समय-समय पर कंपनी बाग का नाम बदलता रहा है। इतिहास के जानकार एवं शोधार्थी राजीव उपाध्याय यायावर की पुस्तक सहारनपुर दर्शन के अनुसार मुगल काल में कंपनी बाग का नाम फरहत बख्श था। पर्यावरणविद् डॉक्टर एसके उपाध्याय की पुस्तक हमारा गौरव राजकीय उद्यान में भी कंपनी बाग की विशेषताओं पर विस्तार से लिखा गया है।
कंपनी बाग की स्थापना 17 वीं शताब्दी में हुई थी। यहां से पौधे और बीज विदेशों में भेजे जाते थे। कंपनी बाग की महत्ता को समझते हुए नवाब नजीबुद्दौला के जागीरदार इंतिजामुद्दौला ने 1750 ईसवी में इसे नया रूप दिया और इसका नाम फरहत बख्श रखा। फरहत बख्श का मतलब होता है आनंद देने वाला। 1789 से 1803 तक मराठों ने सहारनपुर पर शासन किया। कंपनी बाग उनकी देखरेख में रहा। मराठों ने यहां बागेश्वर महादेव मंदिर की स्थापना की। माना जाता है कि भगवान शिव की पूजा के लिए बेल के अनेक पौधे उन्होंने बाग में लगवाए। अंग्रेजी काल में 1806 में हार्टलैस कंपनी बाग के निदेशक रहे। उन्होंने अनेक कार्य यहां कराए। 1819 में स्कॉटिस सर्जन गोवर बाग के निदेशक बने। उनके समय में विदेशों से पौधे मंगवाकर बाग में लगवाए गए। जोहर फोर्ब्स रॉयली 1823 से 1837 तक बाग के निदेशक रहे। उनकी देखरेख में उद्यान के विषय पर आधारित चार पुस्तकें भी लिखी गईं।
कंपनी बाग की सभी सड़कें नई बनवाई गई हैं। तमाम व्यवस्थाएं दुरुस्त हैं। रही बात झील की तो उसमें पानी भरना संभव नहीं है। इसके अलावा बाग के सुंदरीकरण और अन्य कार्य स्मार्ट सिटी योजना के तहत कराए जाने हैं। कमिश्नर भी कंपनी बाग का दौरा कर चुके हैं। उम्मीद है कि स्मार्ट सिटी योजना के तहत कंपनी बाग की सूरत में और सुधार होगा। - राजेश प्रसाद, संयुक्त निदेशक।
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कंपनी बाग के तीन गेट हैं, जिनमें पहला नवाबगंज चौक, दूसरा बेरीबाग तथा तीसरा माधवनगर की ओर लगा है। बाग की सबसे बड़ी पहचान इनमें खड़े विभिन्न प्रजातियों के पेड़ और पौधे हैं। कई पेड़ 100 वर्ष से अधिक पुराने बताए जाते हैं, जिन्हें कभी अंग्रेजों ने लगाया था। इन पेड़ों की ऊंचाई 80 से 100 फुट तक है। सुंदर सड़कों पर पेड़ों की घनी छाया तन और मन को शीतलता प्रदान करती है। मगर इसके बावजूद कंपनी बाग अधूरा नजर आता है। कंपनी बाग में अंग्रेजों के जमाने की झील है, जिसके ऊपर दो छोटे पुल भी बनाए गए हैं। मगर इस झील में लोगों ने कभी पानी नहीं देखा है। माना जाता है कि अंग्रेजों के समय में झील में ना केवल पानी रहता था, बल्कि अंग्रेज इसमें नौका विहार भी करते थे। मगर प्रशासन की अनदेखी के कारण झील सूखी पड़ी है, जिसमें जंगली पौधे और घास उगी है। पुल के ऊपर लगी ग्रिल भी गायब है। बाग के ही भीतर जापानी गार्डन है, जिसमें विभिन्न प्रजाति के फूलों और सजावट के पौधे हुआ करते थे, मगर वर्तमान में जापानी गार्डन जंगल बना हुआ है। गार्डन के बीच में भी एक झील बनाई गई है, जो सूखी पड़ी है। बाग में रास्तों के दोनों ओर लोगों के बैठने के लिए बेंच भी रखी गई हैं, मगर अनेक बेंच जर्जर हो चुकी हैं। कई जगह से बाउंड्रीवाल भी टूटी पड़ी है, जिसके ऊपर से लोग बाग में एंट्री करते हैं। इतना ही नहीं, अब कुछ अवांछनीय लोग भी कंपनी बाग में पहुंचने लगे हैं, जो यहां मदिरापान कर गिलास और शराब की बोतल तक फेंक जाते हैं।
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- यह भी है बाग की खासियत
कंपनी बाग केवल लोगों के सैरसपाटे के लिए नहीं बना है, बल्कि यह एक औद्यानिक प्रयोग और प्रशिक्षण केंद्र भी है। यहां फ्रूट्स प्लांट है। आम, लोकाट, नींबू, कटहल, अनार, चीकू, अमरूद, और लीची का संकलन होता है। लगभग सभी फलों की नई प्रजातियां तैयार की जाती हैं। गुलाब के अलावा लगभग सभी प्रकार के फूल और सजावट के पौधों की नर्सरी भी है। विभिन्न प्रकार के प्रशिक्षण भी दिए जाते हैं, जिनमें मशरूम उगाना समेत कई तरह के प्रशिक्षण शामिल हैं। कंपनी बाग में प्रतिदिन सुबह और शाम को ढाई से तीन हजार लोग टहलने पहुंचते हैं।
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- मुगलों ने फरहत बख्श, अंग्रेजों ने नाम रखा कंपनी बाग
समय-समय पर कंपनी बाग का नाम बदलता रहा है। इतिहास के जानकार एवं शोधार्थी राजीव उपाध्याय यायावर की पुस्तक सहारनपुर दर्शन के अनुसार मुगल काल में कंपनी बाग का नाम फरहत बख्श था। पर्यावरणविद् डॉक्टर एसके उपाध्याय की पुस्तक हमारा गौरव राजकीय उद्यान में भी कंपनी बाग की विशेषताओं पर विस्तार से लिखा गया है।
कंपनी बाग की स्थापना 17 वीं शताब्दी में हुई थी। यहां से पौधे और बीज विदेशों में भेजे जाते थे। कंपनी बाग की महत्ता को समझते हुए नवाब नजीबुद्दौला के जागीरदार इंतिजामुद्दौला ने 1750 ईसवी में इसे नया रूप दिया और इसका नाम फरहत बख्श रखा। फरहत बख्श का मतलब होता है आनंद देने वाला। 1789 से 1803 तक मराठों ने सहारनपुर पर शासन किया। कंपनी बाग उनकी देखरेख में रहा। मराठों ने यहां बागेश्वर महादेव मंदिर की स्थापना की। माना जाता है कि भगवान शिव की पूजा के लिए बेल के अनेक पौधे उन्होंने बाग में लगवाए। अंग्रेजी काल में 1806 में हार्टलैस कंपनी बाग के निदेशक रहे। उन्होंने अनेक कार्य यहां कराए। 1819 में स्कॉटिस सर्जन गोवर बाग के निदेशक बने। उनके समय में विदेशों से पौधे मंगवाकर बाग में लगवाए गए। जोहर फोर्ब्स रॉयली 1823 से 1837 तक बाग के निदेशक रहे। उनकी देखरेख में उद्यान के विषय पर आधारित चार पुस्तकें भी लिखी गईं।
कंपनी बाग की सभी सड़कें नई बनवाई गई हैं। तमाम व्यवस्थाएं दुरुस्त हैं। रही बात झील की तो उसमें पानी भरना संभव नहीं है। इसके अलावा बाग के सुंदरीकरण और अन्य कार्य स्मार्ट सिटी योजना के तहत कराए जाने हैं। कमिश्नर भी कंपनी बाग का दौरा कर चुके हैं। उम्मीद है कि स्मार्ट सिटी योजना के तहत कंपनी बाग की सूरत में और सुधार होगा। - राजेश प्रसाद, संयुक्त निदेशक।

कम्पनी बाग में सूखी पडी झील- फोटो : SAHARANPUR

कम्पनी बाग स्थित गन्दगी में तब्दील शौचालय- फोटो : SAHARANPUR

कम्पनी बाग मे लगा कूडे का ढेर- फोटो : SAHARANPUR

कम्पनी बाग में टूटे पडे झूले- फोटो : SAHARANPUR

कम्पनी बाग मे टूटी पडी प्रतिमा- फोटो : SAHARANPUR