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तमाम योजनाएं, फिर भी कुपोषण का दंश झेल रहे बच्चे
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सहारनपुर। जिले में विभिन्न योजनाओं के तहत हर माह पुष्टाहार बंटने के बावजूद बच्चों को कुपोषण से बचाने के इंतजाम नाकाफी साबित हो रहे हैं। जिले में वर्तमान में 14532 कुपोषित और 3876 अत्यंत कुपोषित बच्चे हैं। इनमें अत्यंत कुपोषित बच्चों को तत्काल प्रभाव से इलाज की जरूरत है। अस्पतालों में इनके लिए बेड भी आरक्षित हैं, लेकिन पूरी तरह इनको उपचार नहीं मिल पा रहा है।
बृहस्पतिवार से सुपोषण माह की शुरुआत हो गई है। बच्चों में कुपोषण दूर करने के लिए सरकार द्वारा विभिन्न योजनाएं संचालित हैं, जिसके तहत गांव-गांव और आंगनबाड़ी केंद्रों पर बच्चों को कुपोषण से बचाने को लेकर जागरुकता कार्यक्रम शुरू हुए हैं। इसके साथ ही पौष्टिक आहार देने की सलाह बच्चों के परिजनों को दी जा रही है। इसके साथ बाल विकास विभाग नेतृत्व में संचालित योजनाओं का लाभ बच्चों और उनके परिवार को दिलवाया जा रहा है। स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से गेहूं, चावल, दाल और तेल भी वितरित किया जा रहा है। हालांकि, तेल हर माह नहीं मिल पाता है, लेकिन बाकी अनुपूरक आहार वितरित किया जाता है। हर माह लाखों रुपये खर्च होने के बावजूद बच्चों पर कुपोषण का दंश हावी है। पिछले पांच सालों में कुपोषित बच्चों की संख्या में कमी आई, लेकिन पैदा होने के साथ ही बच्चे कुपोषित हो रहे हैं। इसके लिए गर्भवती महिलाओं को भी पोषाहार दिया जाता है, लेकिन उसके बावजूद कुपोषण दंश झेलने को बच्चे मजबूर हैं। गांव चंदेना कोली निवासी आरती शर्मा और कलसिया निवासी रानी ने बताया कि उनके बच्चों को समय पर पोषाहार मिल रहा है।
वर्ष----कुपोषित ----------अति कुपोषित बच्चों की संख्या
2018------41869----------12547
2019------33825-----------6910
2020------21424 ----------5828
2021------21254-----------1722
2022------14532-----------3876
कुपोषण के लक्षण
-- बच्चे का वजन नहीं बढ़ता है। जन्म के समय दो किलो से कम बचन वाला बच्चा कुपोषण की श्रेणी में आता है।
-- उम्र बढ़ने के साथ ही बच्चे की लंबाई न बढ़ना।
-- बच्चे में सुस्ती और चिड़चिड़ापन रहना।
-- अति कुपोषित बच्चे बैठ नहीं पाते हैं। खेलकूद में भी उनकी रुचि नहीं होती है।
-- बार-बार कई प्रकार की बीमारियों से बच्चे का ग्रसित होना।
ऐसे करें बचाव
-- जन्म से लेकर दो साल तक बच्चे को रोज तीन कप दूध पिलाएं।
-- छह माह की आयु तक बच्चे को मां अपना दूध पिलाए।
-- रोजाना डेढ़ से दो कटोरी दाल व दलिया दिया जाए।
-- मिलाजुला अनाज की रोटी बनाकर खिलानी चाहिए।
-- बच्चे को उबला हुआ पानी देना चाहिए। ताकि किसी तरह संक्रमण न फैले।
-- बच्चे को मौसमी फल का सेवन जरूर कराना चाहिए।
कुपोषित बच्चों की संख्या में कमी आई है, लेकिन वर्तमान में भी काफी बच्चे कुपोषित और अति कुपोषित हैं, जिनको कुपोषण से बाहर लाने के लिए तमाम प्रयास किए जा रहे हैं।
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- आशा त्रिपाठी, जिला कार्यक्रम अधिकारी
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बृहस्पतिवार से सुपोषण माह की शुरुआत हो गई है। बच्चों में कुपोषण दूर करने के लिए सरकार द्वारा विभिन्न योजनाएं संचालित हैं, जिसके तहत गांव-गांव और आंगनबाड़ी केंद्रों पर बच्चों को कुपोषण से बचाने को लेकर जागरुकता कार्यक्रम शुरू हुए हैं। इसके साथ ही पौष्टिक आहार देने की सलाह बच्चों के परिजनों को दी जा रही है। इसके साथ बाल विकास विभाग नेतृत्व में संचालित योजनाओं का लाभ बच्चों और उनके परिवार को दिलवाया जा रहा है। स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से गेहूं, चावल, दाल और तेल भी वितरित किया जा रहा है। हालांकि, तेल हर माह नहीं मिल पाता है, लेकिन बाकी अनुपूरक आहार वितरित किया जाता है। हर माह लाखों रुपये खर्च होने के बावजूद बच्चों पर कुपोषण का दंश हावी है। पिछले पांच सालों में कुपोषित बच्चों की संख्या में कमी आई, लेकिन पैदा होने के साथ ही बच्चे कुपोषित हो रहे हैं। इसके लिए गर्भवती महिलाओं को भी पोषाहार दिया जाता है, लेकिन उसके बावजूद कुपोषण दंश झेलने को बच्चे मजबूर हैं। गांव चंदेना कोली निवासी आरती शर्मा और कलसिया निवासी रानी ने बताया कि उनके बच्चों को समय पर पोषाहार मिल रहा है।
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वर्ष----कुपोषित ----------अति कुपोषित बच्चों की संख्या
2018------41869----------12547
2019------33825-----------6910
2020------21424 ----------5828
2021------21254-----------1722
2022------14532-----------3876
कुपोषण के लक्षण
-- बच्चे का वजन नहीं बढ़ता है। जन्म के समय दो किलो से कम बचन वाला बच्चा कुपोषण की श्रेणी में आता है।
-- उम्र बढ़ने के साथ ही बच्चे की लंबाई न बढ़ना।
-- बच्चे में सुस्ती और चिड़चिड़ापन रहना।
-- अति कुपोषित बच्चे बैठ नहीं पाते हैं। खेलकूद में भी उनकी रुचि नहीं होती है।
-- बार-बार कई प्रकार की बीमारियों से बच्चे का ग्रसित होना।
ऐसे करें बचाव
-- जन्म से लेकर दो साल तक बच्चे को रोज तीन कप दूध पिलाएं।
-- छह माह की आयु तक बच्चे को मां अपना दूध पिलाए।
-- रोजाना डेढ़ से दो कटोरी दाल व दलिया दिया जाए।
-- मिलाजुला अनाज की रोटी बनाकर खिलानी चाहिए।
-- बच्चे को उबला हुआ पानी देना चाहिए। ताकि किसी तरह संक्रमण न फैले।
-- बच्चे को मौसमी फल का सेवन जरूर कराना चाहिए।
कुपोषित बच्चों की संख्या में कमी आई है, लेकिन वर्तमान में भी काफी बच्चे कुपोषित और अति कुपोषित हैं, जिनको कुपोषण से बाहर लाने के लिए तमाम प्रयास किए जा रहे हैं।
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- आशा त्रिपाठी, जिला कार्यक्रम अधिकारी