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पेट की आग बुझाने की खातिर दम तोड़ती जिंदगी
Saharanpur
Updated Fri, 06 Sep 2013 05:36 AM IST
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बेहट। कैसी विडंबना है कि इंसान को पेट की आग बुझाने के लिए बारूद के गोलों में भी रोटी के टुकड़े नजर आते हैं। यह गरीबी की मजबूरी ही है जो घाड़ क्षेत्र के वाशिंदे जिंदगी को दांव पर लगाकर मौत के इस सामान को पीतल के कुछ टुकड़े निकालने के लिए सैन्य अभ्यास क्षेत्र से उठाकर घर तक ले आते हैं। तहसील बेहट के शिवालिक जंगल से सटे क्षेत्र में कोई साल ऐसा नहीं गुजरता, जब सेना के इन मिस हो चुके गोलों से किसी गरीब की जिंदगी दम न तोड़ती हो।
गांव शेरपुर पेलो में गुरुवार को हुआ दर्दनाक हादसा पहला नहीं है। गांव में इससे पहले भी कई बार इन गोलों से धमाके हो चुके हैं, जिनसे बड़ी संख्या में मासूम बच्चों के साथ ही महिलाएं और परिवार के मुखियाओं की मौत हो चुकी है। गांव वालों को मालूम है कि मिस हुए गोलों से धातु के चंद टुकड़े निकालने में जान का खतरा है, लेकिन गरीबी इतनी है कि उन्हें बारूद के गोलों में लगे पीतल के टुकड़े से दो जून की रोटी जुटाने की उम्मीद की खातिर जान जोखिम में डालने से हिचक नहीं होती। आंकड़ों के अनुसार, अकेले शेरपुर पेलो गांव में वर्ष 2001 से अब तक 17 लोग इन गोलों में हुए धमाकों से अकाल मौत का शिकार हो चुके हैं, जिनमें कई मासूम भी शामिल हैं। पूरे क्षेत्र में इस तरह के हादसों पर नजर डाली जाए तो तस्वीर भयावह नजर आती है।
हादसे : आंकड़ों की जुबानी
जनवरी 2001 : थाना मिर्जापुर के नौगांवा में बम फटने से तीन की मौत, एक घायल।
फरवरी 2002 : मिर्जापुर में गोला फटने से आठ की मौत, तीन घायल।
दिसंबर 2002 : गांव शेरपुर पेलो में पिता-पुत्र की मौत, दो अन्य घायल।
2004 : कोठड़ी बहलोलपुर में युवक की मौत, मिर्जापुर में तीन घायल।
अक्तूबर 2005 : गांव शेरपुर पेलो में तीन लोगों की मौत।
दिसंबर 2005 : गांव शेरपुर पेलो में युवक की मौत।
नवंबर 2007 : गांव शेरपुर पेलो में युवक की मौत।
मई 2008 : गांव शेरपुर पेलो में मां के साथ ही बेटे और बेटी की भी मौत, सात अन्य घायल।
दिसंबर 2012 : थाना रजापुर नौगांवा में युवक की मौत।
जनवरी 2013 : गांव शेरपुर पेलो के आरिफ की सेना के फायरिंग अभ्यास के दौरान मौत।
मार्च 2013 : गांव शेरपुर पेलो निवासी सलीम की अभ्यास के दौरान गोले की चपेट में आने से मौत।
बड़े सवाल ?
क्या पुलिस प्रशासन की जिम्मेदारी ऐसे इंतजाम करने की नहीं है, जिनसे बारूद के यह गोले गांवों तक पहुंच ही न पाए?
क्या फायरिंग रेंज को इस तरह से कवर नहीं किया जा सकता, कि वहां तक गांव वाले पहुंच ही न सके?
क्या सेना को अभ्यास के दौरान दागे जाने पर मिस होने वाले गोलों को अभ्यास के बाद समेट कर अपने पास नहीं रखना चाहिए?
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गांव शेरपुर पेलो में गुरुवार को हुआ दर्दनाक हादसा पहला नहीं है। गांव में इससे पहले भी कई बार इन गोलों से धमाके हो चुके हैं, जिनसे बड़ी संख्या में मासूम बच्चों के साथ ही महिलाएं और परिवार के मुखियाओं की मौत हो चुकी है। गांव वालों को मालूम है कि मिस हुए गोलों से धातु के चंद टुकड़े निकालने में जान का खतरा है, लेकिन गरीबी इतनी है कि उन्हें बारूद के गोलों में लगे पीतल के टुकड़े से दो जून की रोटी जुटाने की उम्मीद की खातिर जान जोखिम में डालने से हिचक नहीं होती। आंकड़ों के अनुसार, अकेले शेरपुर पेलो गांव में वर्ष 2001 से अब तक 17 लोग इन गोलों में हुए धमाकों से अकाल मौत का शिकार हो चुके हैं, जिनमें कई मासूम भी शामिल हैं। पूरे क्षेत्र में इस तरह के हादसों पर नजर डाली जाए तो तस्वीर भयावह नजर आती है।
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हादसे : आंकड़ों की जुबानी
जनवरी 2001 : थाना मिर्जापुर के नौगांवा में बम फटने से तीन की मौत, एक घायल।
फरवरी 2002 : मिर्जापुर में गोला फटने से आठ की मौत, तीन घायल।
दिसंबर 2002 : गांव शेरपुर पेलो में पिता-पुत्र की मौत, दो अन्य घायल।
2004 : कोठड़ी बहलोलपुर में युवक की मौत, मिर्जापुर में तीन घायल।
अक्तूबर 2005 : गांव शेरपुर पेलो में तीन लोगों की मौत।
दिसंबर 2005 : गांव शेरपुर पेलो में युवक की मौत।
नवंबर 2007 : गांव शेरपुर पेलो में युवक की मौत।
मई 2008 : गांव शेरपुर पेलो में मां के साथ ही बेटे और बेटी की भी मौत, सात अन्य घायल।
दिसंबर 2012 : थाना रजापुर नौगांवा में युवक की मौत।
जनवरी 2013 : गांव शेरपुर पेलो के आरिफ की सेना के फायरिंग अभ्यास के दौरान मौत।
मार्च 2013 : गांव शेरपुर पेलो निवासी सलीम की अभ्यास के दौरान गोले की चपेट में आने से मौत।
बड़े सवाल ?
क्या पुलिस प्रशासन की जिम्मेदारी ऐसे इंतजाम करने की नहीं है, जिनसे बारूद के यह गोले गांवों तक पहुंच ही न पाए?
क्या फायरिंग रेंज को इस तरह से कवर नहीं किया जा सकता, कि वहां तक गांव वाले पहुंच ही न सके?
क्या सेना को अभ्यास के दौरान दागे जाने पर मिस होने वाले गोलों को अभ्यास के बाद समेट कर अपने पास नहीं रखना चाहिए?