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संरक्षित होगा सरसावा का सिंधुकालीन टीला
Updated Sun, 01 Jul 2018 12:20 AM IST
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संरक्षित होगा सरसावा का सिंधुकालीन टीला
सहारनपुर। ऐतिहासिक दृष्टि से सरसावा का सिंधुकालीन टीला सहारनपुर ही नहीं, बल्कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश की महत्वपूर्ण साइट में से एक है। वर्षों से हो रहे खनन की वजह से टीले को तीन ओर से नुकसान पहुंचाया जा रहा है। मगर अब ऐसा नहीं होगा। उत्तर प्रदेश राज्य पुरातत्व विभाग ने सहारनपुर के जिलाधिकारी को पत्र लिखकर टीले को संरक्षित करने के निर्देश दिए हैं।
वर्ष 2013 में शोधार्थी राजीव उपाध्याय यायावर ने राज्य पुरातत्व विभाग को पत्र लिखकर टीले के काटे जाने की सूचना दी थी। उसके बाद पुरातत्व विभाग की टीम ने टीले का निरीक्षण कर रिपोर्ट तैयार की थी। टीम ने टीले को कब्जामुक्त कराने के साथ ही इसकी बाउंड्रीवाल कराने बात कही थी। टीम में सहायक पुरातत्व अधिकारी राजीव कुमार त्रिवेदी और संरक्षक सहायक प्रदीप सिंह शामिल रहे थे। राज्य पुरातत्व विभाग ने टीले को संरक्षित घोषित किया था। राजीव ने बताया कि करीब दो दशक पहले वाराणसी आर्कियोलॉजिकल यूनिट के रीजनल अधिकारी डॉ. सुभाष चंद्र यादव की देखरेख में टीले की फेंसिंग कराकर गेट लगाया गया था। मगर आज न तो गेट है और न ही फेसिंग है। तीन ओर से टीले पर अतिक्रमण हो रहा है। टीले से सटे कुछ किसानों ने टीले की जमीन को काटने के बाद समतल कर अपनी खेतों में मिला लिया है। 25 जून 2018 को राज्य पुरातत्व विभाग ने डीएम सहारनपुर को पत्र लिखकर टीले को संरक्षित करने के निर्देश दिए हैं।
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टीले के बारे में विशेष
- सरसावा के टीले को कोट के नाम से जाना जाता है। कोट संस्कृत भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ किला होता है। इससे स्पष्ट होता है कि आज जहां सरसावा का टीला है, वहां कभी किला हुआ करता था।
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- सरसावा के टीले से धूसर चित्रित मृदभांड के टुकड़े मिलते रहे हैं। इनका प्रयोग आज से करीब 3500 वर्ष पहले किया जाता था। इसके अलावा टीले से कई संस्कृतियों के अवशेष प्राप्त होते रहे हैं।
- टीले के ऊपरी हिस्से पर विशाल दीवारों को स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। टीले की विशालता क्रिकेट के मैदान जितनी है।
- टीले से प्राप्त सभी अवशेषों का अध्ययन कर पाया गया है कि 3500 वर्ष पुराने मृदभांड के बर्तन सिंधुकाल से संदर्भित हैं। यह साइट सिंधुकाल की सभ्यता के समकालीन है।
- पुरातत्वविदों का मानना है कि जब भी सरसावा के टीले का उत्खनन होगा तो उसमें से अनेक महत्वपूर्ण तथ्य सामने आएंगे।
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सहारनपुर। ऐतिहासिक दृष्टि से सरसावा का सिंधुकालीन टीला सहारनपुर ही नहीं, बल्कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश की महत्वपूर्ण साइट में से एक है। वर्षों से हो रहे खनन की वजह से टीले को तीन ओर से नुकसान पहुंचाया जा रहा है। मगर अब ऐसा नहीं होगा। उत्तर प्रदेश राज्य पुरातत्व विभाग ने सहारनपुर के जिलाधिकारी को पत्र लिखकर टीले को संरक्षित करने के निर्देश दिए हैं।
वर्ष 2013 में शोधार्थी राजीव उपाध्याय यायावर ने राज्य पुरातत्व विभाग को पत्र लिखकर टीले के काटे जाने की सूचना दी थी। उसके बाद पुरातत्व विभाग की टीम ने टीले का निरीक्षण कर रिपोर्ट तैयार की थी। टीम ने टीले को कब्जामुक्त कराने के साथ ही इसकी बाउंड्रीवाल कराने बात कही थी। टीम में सहायक पुरातत्व अधिकारी राजीव कुमार त्रिवेदी और संरक्षक सहायक प्रदीप सिंह शामिल रहे थे। राज्य पुरातत्व विभाग ने टीले को संरक्षित घोषित किया था। राजीव ने बताया कि करीब दो दशक पहले वाराणसी आर्कियोलॉजिकल यूनिट के रीजनल अधिकारी डॉ. सुभाष चंद्र यादव की देखरेख में टीले की फेंसिंग कराकर गेट लगाया गया था। मगर आज न तो गेट है और न ही फेसिंग है। तीन ओर से टीले पर अतिक्रमण हो रहा है। टीले से सटे कुछ किसानों ने टीले की जमीन को काटने के बाद समतल कर अपनी खेतों में मिला लिया है। 25 जून 2018 को राज्य पुरातत्व विभाग ने डीएम सहारनपुर को पत्र लिखकर टीले को संरक्षित करने के निर्देश दिए हैं।
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टीले के बारे में विशेष
- सरसावा के टीले को कोट के नाम से जाना जाता है। कोट संस्कृत भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ किला होता है। इससे स्पष्ट होता है कि आज जहां सरसावा का टीला है, वहां कभी किला हुआ करता था।
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- सरसावा के टीले से धूसर चित्रित मृदभांड के टुकड़े मिलते रहे हैं। इनका प्रयोग आज से करीब 3500 वर्ष पहले किया जाता था। इसके अलावा टीले से कई संस्कृतियों के अवशेष प्राप्त होते रहे हैं।
- टीले के ऊपरी हिस्से पर विशाल दीवारों को स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। टीले की विशालता क्रिकेट के मैदान जितनी है।
- टीले से प्राप्त सभी अवशेषों का अध्ययन कर पाया गया है कि 3500 वर्ष पुराने मृदभांड के बर्तन सिंधुकाल से संदर्भित हैं। यह साइट सिंधुकाल की सभ्यता के समकालीन है।
- पुरातत्वविदों का मानना है कि जब भी सरसावा के टीले का उत्खनन होगा तो उसमें से अनेक महत्वपूर्ण तथ्य सामने आएंगे।