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कार्यवाहक अधिकारियों के भरोसे विकास प्राधिकरण
Updated Sat, 02 Jun 2018 12:25 AM IST
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कार्यवाहक अधिकारियों के भरोसे विकास प्राधिकरण
सहारनपुर। सहारनपुर विकास प्राधिकरण के अधिकारियों और कर्मचारियों की कार्यप्रणाली किसी से छिपी नहीं है। इसके बावजूद प्राधिकरण कार्यवाहक अधिकारियों के भरोसे है। स्थाई अधिकारी न होने के कारण एक ओर जहां कई महत्वपूर्ण योजनाएं लटकी हैं, वहीं दूसरी ओर नीचे के कई अधिकारी भी बेलगाम हैं।
विकास प्राधिकरण में सत्यप्रकाश शर्मा सचिव के पद पर कार्यरत थे, जो 31 जनवरी 2018 को सेवानिवृत्त हुए थे। उनके बाद एफओ वी शुक्ला पर कार्यवाहक सचिव की जिम्मेदारी आई। उम्मीद थी कि प्राधिकरण को जल्द ही स्थाई सचिव मिलेगा, मगर 28 मार्च 2018 को शुक्ला से चार्ज लेते हुए डिप्टी कलेक्टर डीपी सिंह को कार्यवाहक सचिव का चार्ज थमा दिया गया। तब से डीपी सिंह अपनी मुख्य जॉब के साथ ही इस अतिरिक्त कार्यभार को भी संभाल रहे हैं।
प्राधिकरण के उपाध्यक्ष रहे मनोज कुमार का भी 23 मई 2018 को यहां से ट्रांसफर हो गया है। उनके बाद शासन ने स्थाई उपाध्यक्ष नहीं भेजा है। शासन ने नगरायुक्त ज्ञानेंद्र सिंह को प्राधिकरण के उपाध्यक्ष का अतिरिक्त कार्यभार दिया है। यानी ज्ञानेंद्र सिंह नगरायुक्त की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी के साथ-साथ प्राधिकरण के उपाध्यक्ष की अहम पद को भी निभाने का प्रयास कर रहे हैं। विभागीय सूत्रों ने बताया कि डिप्टी कलेक्टर डीपी सिंह विकास प्राधिकरण को अपना ज्यादातर समय देते हैं, मगर कैराना उप चुनाव में ड्यूटी की वजह से वह पिछले कई दिन से वह चुनावी कार्यों में व्यस्त रहे हैं, जिसकी वजह से अपना पूरा टाइम प्राधिकरण में नहीं दे सके हैं। बताया कि कार्यवाहक उपाध्यक्ष ज्ञानेंद्र सिंह प्राधिकरण कार्यालय में प्रतिदिन आते हैं, मगर मुश्किल से सुबह के दो घंटे ही बैठ पाते हैं। उनके जाने के बाद नीचे के तमाम अधिकारी और कर्मचारी बेलगाम रहते हैं।
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अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर उठते रहे हैं सवाल
विकास प्राधिकरण के अधिकारियों और कर्मचारियों की कार्यप्रणाली शुरू से ही शक के घेरे में रही है। कुछ महीने पहले तत्कालीन कमिश्नर ने प्राधिकरण में छापा मारकर इंजीनियर्स की अलमारी के ताले तुड़वाकर फाइलें अपने कब्जे में ली थीं। उनके बाद उपाध्यक्ष ने भी कड़ा रुख अपनाते हुए अनेक इंजीनियर्स से फाइलें तलब की थीं। मामले को लेकर कर्मचारी और उपाध्यक्ष के बीच टकराव की स्थिति भी पैदा हो गई थी। फिलहाल भी निर्माण से जुड़े अनेक विवादित मामलों की फाइलें उच्चाधिकारियों के पास पड़ी हैं। इनकी जांच चल रही है। अधिकारी ही नहीं, प्राधिकरण के कुछ मैट की कार्यप्रणाली भी संदिग्ध रही है। दो मैट पर कुछ ही दिन पहले निलंबन की कार्रवाई भी की जा चुकी है। इन सबके बावजूद प्राधिकरण में स्थाई अधिकारियों की तैनाती न होना कहीं न कहीं अव्यवस्था को बढ़ावा देने वाली स्थिति है।
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सहारनपुर। सहारनपुर विकास प्राधिकरण के अधिकारियों और कर्मचारियों की कार्यप्रणाली किसी से छिपी नहीं है। इसके बावजूद प्राधिकरण कार्यवाहक अधिकारियों के भरोसे है। स्थाई अधिकारी न होने के कारण एक ओर जहां कई महत्वपूर्ण योजनाएं लटकी हैं, वहीं दूसरी ओर नीचे के कई अधिकारी भी बेलगाम हैं।
विकास प्राधिकरण में सत्यप्रकाश शर्मा सचिव के पद पर कार्यरत थे, जो 31 जनवरी 2018 को सेवानिवृत्त हुए थे। उनके बाद एफओ वी शुक्ला पर कार्यवाहक सचिव की जिम्मेदारी आई। उम्मीद थी कि प्राधिकरण को जल्द ही स्थाई सचिव मिलेगा, मगर 28 मार्च 2018 को शुक्ला से चार्ज लेते हुए डिप्टी कलेक्टर डीपी सिंह को कार्यवाहक सचिव का चार्ज थमा दिया गया। तब से डीपी सिंह अपनी मुख्य जॉब के साथ ही इस अतिरिक्त कार्यभार को भी संभाल रहे हैं।
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प्राधिकरण के उपाध्यक्ष रहे मनोज कुमार का भी 23 मई 2018 को यहां से ट्रांसफर हो गया है। उनके बाद शासन ने स्थाई उपाध्यक्ष नहीं भेजा है। शासन ने नगरायुक्त ज्ञानेंद्र सिंह को प्राधिकरण के उपाध्यक्ष का अतिरिक्त कार्यभार दिया है। यानी ज्ञानेंद्र सिंह नगरायुक्त की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी के साथ-साथ प्राधिकरण के उपाध्यक्ष की अहम पद को भी निभाने का प्रयास कर रहे हैं। विभागीय सूत्रों ने बताया कि डिप्टी कलेक्टर डीपी सिंह विकास प्राधिकरण को अपना ज्यादातर समय देते हैं, मगर कैराना उप चुनाव में ड्यूटी की वजह से वह पिछले कई दिन से वह चुनावी कार्यों में व्यस्त रहे हैं, जिसकी वजह से अपना पूरा टाइम प्राधिकरण में नहीं दे सके हैं। बताया कि कार्यवाहक उपाध्यक्ष ज्ञानेंद्र सिंह प्राधिकरण कार्यालय में प्रतिदिन आते हैं, मगर मुश्किल से सुबह के दो घंटे ही बैठ पाते हैं। उनके जाने के बाद नीचे के तमाम अधिकारी और कर्मचारी बेलगाम रहते हैं।
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अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर उठते रहे हैं सवाल
विकास प्राधिकरण के अधिकारियों और कर्मचारियों की कार्यप्रणाली शुरू से ही शक के घेरे में रही है। कुछ महीने पहले तत्कालीन कमिश्नर ने प्राधिकरण में छापा मारकर इंजीनियर्स की अलमारी के ताले तुड़वाकर फाइलें अपने कब्जे में ली थीं। उनके बाद उपाध्यक्ष ने भी कड़ा रुख अपनाते हुए अनेक इंजीनियर्स से फाइलें तलब की थीं। मामले को लेकर कर्मचारी और उपाध्यक्ष के बीच टकराव की स्थिति भी पैदा हो गई थी। फिलहाल भी निर्माण से जुड़े अनेक विवादित मामलों की फाइलें उच्चाधिकारियों के पास पड़ी हैं। इनकी जांच चल रही है। अधिकारी ही नहीं, प्राधिकरण के कुछ मैट की कार्यप्रणाली भी संदिग्ध रही है। दो मैट पर कुछ ही दिन पहले निलंबन की कार्रवाई भी की जा चुकी है। इन सबके बावजूद प्राधिकरण में स्थाई अधिकारियों की तैनाती न होना कहीं न कहीं अव्यवस्था को बढ़ावा देने वाली स्थिति है।