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तीन तलाक एक कुरीति है, इसे खत्म किया जाना सराहनीय - शगुफ्ता खान
Updated Sun, 17 Dec 2017 11:34 PM IST
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सहारनपुर। सरोकार संस्था की सचिव शगुफ्ता खान ने कहा है तीन तलाक एक सामाजिक कुुरीति है। कुछ हनमी मसलके के लोग हैं जो इस कुरीति को सही बताकर मुस्लिम महिलाओं का उत्पीड़न कर रहे हैं। कुुरान और हदीस में कहीं भी तीन तलाक का जिक्र नहीं है। पूरी दुनियां में कहीं भी तीन तलाक ए बिदत का इस्तेमाल नहीं किया जाता।
सपा नेता एवं सरोकार संस्था की सचिव शगुफ्ता खान ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम महिलाओं के हक में जो फैसला दिया है वह सराहनीय है। सजा का प्रावधान भी बिल्कुल सही है। इसके लिए पुरुषों में खौफ भी होना चाहिए। लोगों को कुरान की आयतों के अनुसार जिंदगी गुजारनी चाहिए। कुरान एवं हदीस की रोशनी में मुसलमानों को शरीयत के कानून का पालन करना चाहिए और तीन तलाक जैसी कुरीतियों को समाज से खत्म किया जाना चाहिए। गैर मुनासिब नीतियों से समाज पिछड़ता है और नुकसान होता है। तीन तलाक देता तो पुरुष है, लेकिन भुगतना पड़ता है महिला को। गुस्सा करें पुरुष और बाद में अपनी भूल पर पश्चाताप भी कर ले, लेकिन महिला की कोई गलती न होते हुए भी ऐसी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है, जिसके लिए वह जिंदगी भर अपने आपको माफ नहीं कर पाती।
उन्होंने कहा कि सिर्फ हमारे देश में ही बल्कि पश्चिमी क्षेत्र में ही एक साथ तीन तलाक जैसी कुरीति है, जबकि किसी अन्य देश में तीन तलाक नहीं है। पति और पत्नी में अनबन चरम तक पहुंच चुकी है तो तलाक तीन बार में एक-एक माह का समय देकर करना चाहिए। तीसरे तलाक तक पति और पत्नी एक ही छत के नीचे रहें। गुस्से में बात कहने के बाद बाद में पश्चाताप होने पर ठीक किया जा सके।
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उन्होंने कहा कि मुस्लिम पर्सनल लॉ हो या कुछ और हो सिर्फ कुरान की आयतों के अनुसार ही जीवन जिएं। समाज में समरसता आनी चाहिए।
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सपा नेता एवं सरोकार संस्था की सचिव शगुफ्ता खान ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम महिलाओं के हक में जो फैसला दिया है वह सराहनीय है। सजा का प्रावधान भी बिल्कुल सही है। इसके लिए पुरुषों में खौफ भी होना चाहिए। लोगों को कुरान की आयतों के अनुसार जिंदगी गुजारनी चाहिए। कुरान एवं हदीस की रोशनी में मुसलमानों को शरीयत के कानून का पालन करना चाहिए और तीन तलाक जैसी कुरीतियों को समाज से खत्म किया जाना चाहिए। गैर मुनासिब नीतियों से समाज पिछड़ता है और नुकसान होता है। तीन तलाक देता तो पुरुष है, लेकिन भुगतना पड़ता है महिला को। गुस्सा करें पुरुष और बाद में अपनी भूल पर पश्चाताप भी कर ले, लेकिन महिला की कोई गलती न होते हुए भी ऐसी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है, जिसके लिए वह जिंदगी भर अपने आपको माफ नहीं कर पाती।
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उन्होंने कहा कि सिर्फ हमारे देश में ही बल्कि पश्चिमी क्षेत्र में ही एक साथ तीन तलाक जैसी कुरीति है, जबकि किसी अन्य देश में तीन तलाक नहीं है। पति और पत्नी में अनबन चरम तक पहुंच चुकी है तो तलाक तीन बार में एक-एक माह का समय देकर करना चाहिए। तीसरे तलाक तक पति और पत्नी एक ही छत के नीचे रहें। गुस्से में बात कहने के बाद बाद में पश्चाताप होने पर ठीक किया जा सके।
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उन्होंने कहा कि मुस्लिम पर्सनल लॉ हो या कुछ और हो सिर्फ कुरान की आयतों के अनुसार ही जीवन जिएं। समाज में समरसता आनी चाहिए।