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संगतों को दिखाई फिल्म चार साहिबजादे-2
Updated Thu, 28 Dec 2017 11:54 PM IST
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देवबंद (सहारनपुर)। गुरु गोबिंद सिंह जी के छोटे साहिबजादों व माता गुजरी जी के शहीदी दिवस के उपलक्ष्य में बुधवार की रात्रि गुरुद्वारा श्री गुरुनानक सभा में संगतों को धार्मिक फिल्म चार साहिबजादे-2 दिखाकर इतिहास से रूबरू कराया गया।
दशमेश हॉल में फिल्म चार साहिबजादे-2 द राइजिंग ऑफ बाबा बंदा सिंह बहादुर में दिखाया गया कि आनंदपुर साहिब पंजाब का किला छोड़ने व गुरु साहिब के चारो साहिबजादों की शहादत के बाद गुरुजी ने नादेड़ (महाराष्ट्र) में गोदावरी नदी के तट पर डेरा लगाया। वहां तपस्या कर रहे माधोदास को पंजाब में मुगलों द्वारा हो रहे जुल्म व जबरन धर्म परिवर्तन कराने के बारे में बताते हुए इसका मुकाबला करने की प्रेरणा दी। माधेदास ने गुरुजी के आगे नतमस्तक होकर अमृत छका और माधोदास से बाबा बंदा सिंह बहादुर बन गए। बंदा सिंह ने नादेड़ से फौज लेकर पंजाब की ओर कूच किया। पंजाब में मुगलों के अत्याचारों से त्रस्त जनता उनके साथ जुड़ती चली गई और बंदा सिंह ने समाना, कपूरथला, मुजफ्फराबाद को जीतने के बाद सरहिंद पर हमला किया। छोटे साहिबजादों को जिंदा दीवारों में चुनने वाले दो जालिम भाइयों, सरहिंद के नवाब वजीर खां, उसके दरबारी सुच्चानंद को मौत के घाट उतार कर सन् 1708 में पंजाब में खालसा पंथ स्थापित किया। गुरुद्वारा कमेटी के उपप्रधान डा. महेन्द्र सिंह सोढी ने कहा कि हिंदुस्तान हमेशा गुरू गोबिंद सिंह का ऋणी रहेगा। उन्होंने अपने पूरे परिवार को देश व कौम के लिए कुर्बान कर दिया। पिता गुरू तेग बहादुर ने हिंदू धर्म की खातिर चांदनी चौक में शहीदी दी। दो बड़े साहिबजादे चमकौर की जंग में शहीद हुए, दो छोटे साहिबजादों बाबा जोरावर सिंह (9 वर्ष) व बाबा फतेह सिंह (7 वर्ष) को इस्लाम कबूल न करने पर सरहिंद पंजाब में जिंदा दीवारों में चिनवा दिया गया। पोते की शहादत को देखकर गुरू जी की माता गुजरी जी ने भी प्राण त्याग दिए। संचालन गुरजोत सिंह सेठी ने किया। इस मौके पर इंद्रपाल सिंह सेठी, श्याम लाल भारती, सतीश गिरधर, चंद्रदीप सिंह, दीपक सलूजा, हरविंदर बेदी, रवींद्र सिंह, अजय निझारा, गौरव अरोड़ा, विशाल छाबड़ा, चन्नी बेदी, गिरिश कोहली, गुरदीप सिंह, बलदीप सिंह, सन्नी सेठी, सिमरनजीत सिंह, हर्ष भारती, सुमित भारती आदि मौजूद रहे।
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दशमेश हॉल में फिल्म चार साहिबजादे-2 द राइजिंग ऑफ बाबा बंदा सिंह बहादुर में दिखाया गया कि आनंदपुर साहिब पंजाब का किला छोड़ने व गुरु साहिब के चारो साहिबजादों की शहादत के बाद गुरुजी ने नादेड़ (महाराष्ट्र) में गोदावरी नदी के तट पर डेरा लगाया। वहां तपस्या कर रहे माधोदास को पंजाब में मुगलों द्वारा हो रहे जुल्म व जबरन धर्म परिवर्तन कराने के बारे में बताते हुए इसका मुकाबला करने की प्रेरणा दी। माधेदास ने गुरुजी के आगे नतमस्तक होकर अमृत छका और माधोदास से बाबा बंदा सिंह बहादुर बन गए। बंदा सिंह ने नादेड़ से फौज लेकर पंजाब की ओर कूच किया। पंजाब में मुगलों के अत्याचारों से त्रस्त जनता उनके साथ जुड़ती चली गई और बंदा सिंह ने समाना, कपूरथला, मुजफ्फराबाद को जीतने के बाद सरहिंद पर हमला किया। छोटे साहिबजादों को जिंदा दीवारों में चुनने वाले दो जालिम भाइयों, सरहिंद के नवाब वजीर खां, उसके दरबारी सुच्चानंद को मौत के घाट उतार कर सन् 1708 में पंजाब में खालसा पंथ स्थापित किया। गुरुद्वारा कमेटी के उपप्रधान डा. महेन्द्र सिंह सोढी ने कहा कि हिंदुस्तान हमेशा गुरू गोबिंद सिंह का ऋणी रहेगा। उन्होंने अपने पूरे परिवार को देश व कौम के लिए कुर्बान कर दिया। पिता गुरू तेग बहादुर ने हिंदू धर्म की खातिर चांदनी चौक में शहीदी दी। दो बड़े साहिबजादे चमकौर की जंग में शहीद हुए, दो छोटे साहिबजादों बाबा जोरावर सिंह (9 वर्ष) व बाबा फतेह सिंह (7 वर्ष) को इस्लाम कबूल न करने पर सरहिंद पंजाब में जिंदा दीवारों में चिनवा दिया गया। पोते की शहादत को देखकर गुरू जी की माता गुजरी जी ने भी प्राण त्याग दिए। संचालन गुरजोत सिंह सेठी ने किया। इस मौके पर इंद्रपाल सिंह सेठी, श्याम लाल भारती, सतीश गिरधर, चंद्रदीप सिंह, दीपक सलूजा, हरविंदर बेदी, रवींद्र सिंह, अजय निझारा, गौरव अरोड़ा, विशाल छाबड़ा, चन्नी बेदी, गिरिश कोहली, गुरदीप सिंह, बलदीप सिंह, सन्नी सेठी, सिमरनजीत सिंह, हर्ष भारती, सुमित भारती आदि मौजूद रहे।
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