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बिंदरपाल सिंह को 20वें शहीदी दिवस पर किया याद
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साढ़ौली कदीम (सहारनपुर)। कारगिल युद्ध में मातृभूमि की रक्षा के लिए प्राणों का बलिदान करने वाले क्षेत्र के अमर सपूत शहीद बिंदरपाल सिंह को शनिवार को उनके 20वें शहीदी दिवस पर शिद्दत के साथ याद किया गया। हालांकि इस दौरान किसी भी प्रशासनिक अधिकारी एवं जनप्रतिनिधि की उपस्थिति न होने को लेकर क्षेत्रवासियों में रोष है।
तहसील बेहट के यमुना खादर तटवर्ती ग्राम बहरामपुर में एक जनवरी 1976 को एक साधारण गरीब किसान परिवार में जन्मे शहीद बिंदरपाल की शहादत को प्रशासन भले ही भूल गया हो लेकिन क्षेत्रवासी आज भी शिद्दत के साथ उन्हें याद करते हैं। बिंदरपाल मेरठ छावनी में 27 राजपूत बटालियन में भर्ती हुए थे। पहली पोस्टिंग उन्हें रुड़की छावनी में मिली। यहीं पर उनकी ट्रेनिंग शुरू हुई। वर्ष 1998 में मुजफ्फरनगर के रसूलपुर निवासी भोपाल सिंह की बेटी पूनम से इनकी शादी हुई थी।
कारगिल युद्ध के दौरान 17 जून 1999 को उन्हें लड़ाई के लिए कारगिल के पुंछ सेक्टर में भेजा गया। 12 दिनों तक दुश्मनों से लोहा लेने वाला यह वीर सपूत 29 जून 1999 को भारत माता की रक्षा करते हुए हमेशा के लिए मातृभूमि की गोद में सो गया। शनिवार को उनके 20वें शहीदी दिवस पर श्रद्धांजलि देते हुए शहीद के पिता चौ. रणजीत सिंह की आंखें भर आई। उनका कहना है कि उनके लाल ने देश की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दी है, लेकिन आज शहीदों की शहादत पर न तो प्रशासन का कोई अधिकारी पहुंचता है न ही कोई जनप्रतिनिधि। शहीदों के परिजनों को सम्मान दिए जाने को लेकर प्रत्येक राजनीतिक दल राजनीति तो कर लेता है लेकिन उनकी सुध लेने का उनके पास समय नहीं है। शहीद के नाम पर आज तक सिवाय एक जूनियर स्कूल के कोई भी मांग पूरी नहीं की जा रही है। उनका कहना था कि शहीद के नाम पर गांव में इंटर कालेज संचालित कराया जाए तथा गन्देवड़ चिलकाना रोड से शहीद के गांव को आने वाले मुख्य मार्ग पर शहीद के नाम पर गेट का निर्माण कराया जाए। इस अवसर पर चौ. मगनपाल सिंह, कृपाल सिंह, ब्रिजेश कांबोज, हार्दिक कांबोज, चौ. रामपाल सिंह, सोनू पंवार, श्यामपाल प्रधान सहित काफी लोग मौजूद रहे।
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तहसील बेहट के यमुना खादर तटवर्ती ग्राम बहरामपुर में एक जनवरी 1976 को एक साधारण गरीब किसान परिवार में जन्मे शहीद बिंदरपाल की शहादत को प्रशासन भले ही भूल गया हो लेकिन क्षेत्रवासी आज भी शिद्दत के साथ उन्हें याद करते हैं। बिंदरपाल मेरठ छावनी में 27 राजपूत बटालियन में भर्ती हुए थे। पहली पोस्टिंग उन्हें रुड़की छावनी में मिली। यहीं पर उनकी ट्रेनिंग शुरू हुई। वर्ष 1998 में मुजफ्फरनगर के रसूलपुर निवासी भोपाल सिंह की बेटी पूनम से इनकी शादी हुई थी।
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कारगिल युद्ध के दौरान 17 जून 1999 को उन्हें लड़ाई के लिए कारगिल के पुंछ सेक्टर में भेजा गया। 12 दिनों तक दुश्मनों से लोहा लेने वाला यह वीर सपूत 29 जून 1999 को भारत माता की रक्षा करते हुए हमेशा के लिए मातृभूमि की गोद में सो गया। शनिवार को उनके 20वें शहीदी दिवस पर श्रद्धांजलि देते हुए शहीद के पिता चौ. रणजीत सिंह की आंखें भर आई। उनका कहना है कि उनके लाल ने देश की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दी है, लेकिन आज शहीदों की शहादत पर न तो प्रशासन का कोई अधिकारी पहुंचता है न ही कोई जनप्रतिनिधि। शहीदों के परिजनों को सम्मान दिए जाने को लेकर प्रत्येक राजनीतिक दल राजनीति तो कर लेता है लेकिन उनकी सुध लेने का उनके पास समय नहीं है। शहीद के नाम पर आज तक सिवाय एक जूनियर स्कूल के कोई भी मांग पूरी नहीं की जा रही है। उनका कहना था कि शहीद के नाम पर गांव में इंटर कालेज संचालित कराया जाए तथा गन्देवड़ चिलकाना रोड से शहीद के गांव को आने वाले मुख्य मार्ग पर शहीद के नाम पर गेट का निर्माण कराया जाए। इस अवसर पर चौ. मगनपाल सिंह, कृपाल सिंह, ब्रिजेश कांबोज, हार्दिक कांबोज, चौ. रामपाल सिंह, सोनू पंवार, श्यामपाल प्रधान सहित काफी लोग मौजूद रहे।
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