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शरीयत में जो नाजायज है उसे जायज कैसे कहा जा सकता है
Updated Thu, 29 Mar 2018 12:28 AM IST
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देवबंद (सहारनपुर)। तीन तलाक के बाद हलाला और बहुविवाह की प्रथा को लेकर छिड़ी बहस पर देवबंदी उलमा और बुद्धजीवी वर्ग से लेकर आम आदमी तक का मानना है कि इस्लाम और शरीयत में जिन चीजों को जायज करार दिया गया है उन्हें गलत कैसे कहा जा सकता है। जबकि भारतीय संविधान ने सभी धर्मों के लोगों को अपने मजहब के मुताबिक जिंदगी गुजारने का अधिकार दिया हुआ है। ऐसे में मुसलमानों के पर्सनल लॉ के साथ छेड़छाड़ को किसी भी सूरत में दुरुस्त नहीं ठहराया जा सकता।
हलाला को गलत तरीके से पेश किया जा रहा
* हिंदुस्तान का दस्तूर (संविधान) हर मजहब के लोगों को अपने अपने धर्म के मुताबिक जिंदगी जीने का अधिकार देता है। सभी धर्मों की परंपराएं अलग-अलग हैं। उसी तरह मुस्लिमों का भी अपना पर्सनल लॉ है। जिसका अधिकार संविधान ने उन्हें दिया हुआ है। मुस्लिम समाज में बहुविवाह की शरई इजाजत है, लेकिन उसके लिए कुछ शर्तें हैं जिन्हें पूरा करना जरुरी है। हलाला को इस्लाम में लानत वाला कार्य बताया गया है। यदि पहले शौहर से दोबारा शादी करने के लिए किसी ओर व्यक्ति से निकाह करना और फिर तलाक ले लेना ये सरासर गलत अमल है। हलाला को गलत तरीके से पेश किया जा रहा है।
* मुफ्ती अरशद फारुकी, चेयरमैन, फतवा ऑनलाइन
इस्लाम धर्म में मर्द को चार शादियों की इजाजत
* इस्लाम धर्म में मर्द को चार शादियों की इजाजत मिली हुई है। लेकिन कुछ मामले ऐसे भी हैं जिनमें मर्द को एक भी शादी करने की इजाजत नहीं है। जहां तक हलाला का मसला तो उसमें ये है कि इस शर्त के साथ किसी दूसरे मर्द से औरत की शादी कराना कि वे उससे तलाक लेकर फिर से पहले शौहर से शादी कर लेगी गलत है। यह मामला इत्तेफाक पर टिका हुआ है। अगर तलाक के बाद दूसरे मर्द से शादी हो गई है और वो अपनी मर्जी से तलाक दे दे या फिर वो इत्तेफाक से मर जाए तो उस स्थिति में बीवी पहले शौहर से निकाह कर सकती है।
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* मुफ्ती तारिक कासमी, उस्ताद मदरसा जामिया हुसैनिया
हलाला तलाक देने वाले मर्द के लिए सजा है
* बहुविवाह के लिए मर्द को शरई तौर पर हक मिला हुआ है। मगर इसमें कुछ शर्तें भी रखी गई हैं, लेकिन कोई दौलत और दूसरे जरिये का इस्तेमाल कर अय्याशी के लिए एक के बाद एक कई शादियां करता है तो इस्लाम धर्म में यह हराम अमल करार दिया गया है। हलाला तलाक देने वाले मर्द के लिए एक तरह की सजा है। यानि उसकी गैरत का ललकारने वाला अमल है।
* सैय्यद वजाहत शाह, शिक्षक
इस्लाम में जो चीज नाजायज वो जायज कैसे हो सकती है
* मुसलमानों की जिंदगी जीने का पूरा निजाम शरीयत और इस्लाम पर टिका हुआ है। इस्लाम धर्म में जिस चीज को गलत और नाजायज बताया गया है उसे किसी भी सूरत में जायज नहीं ठहराया जा सकता। बहुविवाह के लिए इस्लाम इजाजत देता है इसमें किसी को दखलंदाजी करने का हक नहीं है। जबकि हलाला प्रथा भी इस्लाम धर्म का हिस्सा है। * तौसीफ अहमद, शिक्षक
दूसरी शादी के लिए पहली बीवी की इजाजत लेना जरूरी
* इस्लाम में बहुविवाह न फर्ज है, न वाजिब है और न ही सुन्नत है। लेकिन इस्लाम इसकी इजाजत देता है। जो लोग इस्लाम और शरीयत को मानते हैं तो वो पहली बीवी से इजाजत लेकर दूसरी शादी कर सकते हैं। जबकि हलाला तलाक देने वालों के लिए सजा और लानत है। * डा. एसए अजीज
बहुविवाह, तीन तलाक व हलाला इस्लाम धर्म के हिस्से
* भारतीय संविधान हर धर्म के लोगों को मजहब के अनुसार जीवन गुजारने का हक देता है। फिर मुसलमानों के धार्मिक मामलों में छेड़छाड़ क्यों की जा रही है। बहुविवाह, हलाला और तीन तलाक जैसे नाजुक मामले इस्लाम धर्म का हिस्सा है। जिनमें हस्तक्षेप करना गैर जरूरी है। बहुविवाह के लिए इस्लाम में मर्द को इजाजत है। जबकि हलाला तलाकशुदा महिला को सहारा दिलाने के लिए होता है। * नजम उस्मानी
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हलाला को गलत तरीके से पेश किया जा रहा
* हिंदुस्तान का दस्तूर (संविधान) हर मजहब के लोगों को अपने अपने धर्म के मुताबिक जिंदगी जीने का अधिकार देता है। सभी धर्मों की परंपराएं अलग-अलग हैं। उसी तरह मुस्लिमों का भी अपना पर्सनल लॉ है। जिसका अधिकार संविधान ने उन्हें दिया हुआ है। मुस्लिम समाज में बहुविवाह की शरई इजाजत है, लेकिन उसके लिए कुछ शर्तें हैं जिन्हें पूरा करना जरुरी है। हलाला को इस्लाम में लानत वाला कार्य बताया गया है। यदि पहले शौहर से दोबारा शादी करने के लिए किसी ओर व्यक्ति से निकाह करना और फिर तलाक ले लेना ये सरासर गलत अमल है। हलाला को गलत तरीके से पेश किया जा रहा है।
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* मुफ्ती अरशद फारुकी, चेयरमैन, फतवा ऑनलाइन
इस्लाम धर्म में मर्द को चार शादियों की इजाजत
* इस्लाम धर्म में मर्द को चार शादियों की इजाजत मिली हुई है। लेकिन कुछ मामले ऐसे भी हैं जिनमें मर्द को एक भी शादी करने की इजाजत नहीं है। जहां तक हलाला का मसला तो उसमें ये है कि इस शर्त के साथ किसी दूसरे मर्द से औरत की शादी कराना कि वे उससे तलाक लेकर फिर से पहले शौहर से शादी कर लेगी गलत है। यह मामला इत्तेफाक पर टिका हुआ है। अगर तलाक के बाद दूसरे मर्द से शादी हो गई है और वो अपनी मर्जी से तलाक दे दे या फिर वो इत्तेफाक से मर जाए तो उस स्थिति में बीवी पहले शौहर से निकाह कर सकती है।
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* मुफ्ती तारिक कासमी, उस्ताद मदरसा जामिया हुसैनिया
हलाला तलाक देने वाले मर्द के लिए सजा है
* बहुविवाह के लिए मर्द को शरई तौर पर हक मिला हुआ है। मगर इसमें कुछ शर्तें भी रखी गई हैं, लेकिन कोई दौलत और दूसरे जरिये का इस्तेमाल कर अय्याशी के लिए एक के बाद एक कई शादियां करता है तो इस्लाम धर्म में यह हराम अमल करार दिया गया है। हलाला तलाक देने वाले मर्द के लिए एक तरह की सजा है। यानि उसकी गैरत का ललकारने वाला अमल है।
* सैय्यद वजाहत शाह, शिक्षक
इस्लाम में जो चीज नाजायज वो जायज कैसे हो सकती है
* मुसलमानों की जिंदगी जीने का पूरा निजाम शरीयत और इस्लाम पर टिका हुआ है। इस्लाम धर्म में जिस चीज को गलत और नाजायज बताया गया है उसे किसी भी सूरत में जायज नहीं ठहराया जा सकता। बहुविवाह के लिए इस्लाम इजाजत देता है इसमें किसी को दखलंदाजी करने का हक नहीं है। जबकि हलाला प्रथा भी इस्लाम धर्म का हिस्सा है। * तौसीफ अहमद, शिक्षक
दूसरी शादी के लिए पहली बीवी की इजाजत लेना जरूरी
* इस्लाम में बहुविवाह न फर्ज है, न वाजिब है और न ही सुन्नत है। लेकिन इस्लाम इसकी इजाजत देता है। जो लोग इस्लाम और शरीयत को मानते हैं तो वो पहली बीवी से इजाजत लेकर दूसरी शादी कर सकते हैं। जबकि हलाला तलाक देने वालों के लिए सजा और लानत है। * डा. एसए अजीज
बहुविवाह, तीन तलाक व हलाला इस्लाम धर्म के हिस्से
* भारतीय संविधान हर धर्म के लोगों को मजहब के अनुसार जीवन गुजारने का हक देता है। फिर मुसलमानों के धार्मिक मामलों में छेड़छाड़ क्यों की जा रही है। बहुविवाह, हलाला और तीन तलाक जैसे नाजुक मामले इस्लाम धर्म का हिस्सा है। जिनमें हस्तक्षेप करना गैर जरूरी है। बहुविवाह के लिए इस्लाम में मर्द को इजाजत है। जबकि हलाला तलाकशुदा महिला को सहारा दिलाने के लिए होता है। * नजम उस्मानी