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111 साल पुरानी इमारत दे रही सर्वधर्म समभाव का संदेश
ब्यूरो/अमर उजाला रामपुर
Updated Sun, 26 Jun 2016 12:48 AM IST
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रजा लाइब्रेरी
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दुनियाभर में मशहूर रजा लाइब्रेरी में मौजूद दुर्लभ पांडुलिपियां, धार्मिक किताबें जहां ज्ञान बांट रही हैं, वहीं आलीशान इमारत सर्वधर्म समभाव का संदेश दे रही है।
लाइब्रेरी की 111 साल पुरानी इमारत के दोनों ओर के स्तंभ में यह सच छिपा हुआ है। इसमें सबसे ऊपर मंदिर फिर गुरुद्वारा इसके बाद गिरजाघर और नीचे मस्जिद की आकृति है। गौर से देखने पर यह आकृतियां स्पष्ट होती हैं। लाइब्रेरी में दुनियाभर की मशहूर कुरान मजीद की पांडुलिपियां हैं तो वाल्मीकि रामायण की प्रतिलिपि के हिंदी-फारसी संस्करण मौजूद हैं।
रजा लाइब्रेरी में अनेक भाषाओं और लिपियों की 17,000 दुर्लभ पांडुलिपियां हैं। मक्का की लाइब्रेरी की भी पांडुलिपि है, तो सत्रहवीं सदी की रामायण की पांडुलिपि है। सातवीं सदी का हजरत अली का लिखा हुआ क़ुरान है। स्वर्ण जड़ित क़ुरान और रामायण भी हैं यहां। सत्रहवीं सदी की वाल्मीकि रामायण तो देखने लायक है।
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रजा लाइब्रेरी ने इस रामायण को संजोकर रखा है।इमारत में घुसते ही पहली बात यही बताई जाती है कि हमारे पास एक खास वाल्मीकि रामायण है। रजा लाइब्रेरी के पास जो रामायण है, उसका अनुवाद 1713 में सुमेर चन्द ने संस्कृत से फारसी में किया था। सुमेर चन्द ने मुगल शासक फ़र्रुखसियर के शासनकाल में लिखा था। इसे सोने के पानी तथा कीमती पत्थरों के रंगों से गुलबूटे और नक्शो-निगार से लौह (पन्ने का ऊपरी भाग) सजाई गई है।
लाइब्रेरी की 111 साल पुरानी इमारत के दोनों ओर के स्तंभ में यह सच छिपा हुआ है। इसमें सबसे ऊपर मंदिर फिर गुरुद्वारा इसके बाद गिरजाघर और नीचे मस्जिद की आकृति है। गौर से देखने पर यह आकृतियां स्पष्ट होती हैं। लाइब्रेरी में दुनियाभर की मशहूर कुरान मजीद की पांडुलिपियां हैं तो वाल्मीकि रामायण की प्रतिलिपि के हिंदी-फारसी संस्करण मौजूद हैं।
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रजा लाइब्रेरी में अनेक भाषाओं और लिपियों की 17,000 दुर्लभ पांडुलिपियां हैं। मक्का की लाइब्रेरी की भी पांडुलिपि है, तो सत्रहवीं सदी की रामायण की पांडुलिपि है। सातवीं सदी का हजरत अली का लिखा हुआ क़ुरान है। स्वर्ण जड़ित क़ुरान और रामायण भी हैं यहां। सत्रहवीं सदी की वाल्मीकि रामायण तो देखने लायक है।
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रजा लाइब्रेरी ने इस रामायण को संजोकर रखा है।इमारत में घुसते ही पहली बात यही बताई जाती है कि हमारे पास एक खास वाल्मीकि रामायण है। रजा लाइब्रेरी के पास जो रामायण है, उसका अनुवाद 1713 में सुमेर चन्द ने संस्कृत से फारसी में किया था। सुमेर चन्द ने मुगल शासक फ़र्रुखसियर के शासनकाल में लिखा था। इसे सोने के पानी तथा कीमती पत्थरों के रंगों से गुलबूटे और नक्शो-निगार से लौह (पन्ने का ऊपरी भाग) सजाई गई है।