पटवाई। रमजान के इस पाक महीने में बंदे अल्लाह को राजी रखने के लिए इबादतगाहों और घरों पर इबादत करते है, रोजा रखते है। अल्लाह का बंदा अपनी नफ्स पर काबू रखता है, तो अल्लाह अपने बंदे की जिंदगी से लेकर आखिरत तक अल्लाह की मेहरबानी और रहमत होती है।
पटवाई के मुफ्ती वसीम रजा खान ने बताया कि रमजान के इस पाक महीने में अल्लाह का बंदा अपनी नफ्स पर काबू रखता है, तो अल्लाह के लिए उस बंदे की ओर इबादतों में से एक इबादत होती है। अल्लाह ने अपने पहले नबी आदम अलैहिसलाम से लेकर आखिरी नबी मोहम्मद मुस्तफा सल्लाल्लाहू अलैही वसल्लम तक पर रोजे फर्ज किए है। मुफ़्ती वसीम रजा खान ने बताया कि कुरान मजीद के दूसरे पारे की आयत में अल्लाह इरशाद फरमात है कि ‘ए इमान वालों तुम रोजे फर्ज किए गए, जिस तरह तुमसे पहली उम्मतों पर भी फर्ज किए गए थे। इस आयत से ये बात साबित होता है कि रोजा तो है कि इबादत जदीदा नहीं इबादते कदीमा है। आगे बताया कि ये अलग बात है कि सबके अहकाम जुदा-जुदा है। ये रोजा अपनी नफ्स को मारने-कुचलने में भी एक बहुत एहम इबादत है। रोजे की हालत में अपनी नफ्स पर काबू रखना भी अल्लाह की इबादत है। अल्लाह देखता है कि मेरे बंदे कितनी इबादत करते है। बताया गया कि रोजेदार को किसी दूसरे की किसी चीज पर बुरी नजर नहीं डालनी चाहिए। रोजे की हालात में कोई ऐसा काम न करें जिससे दूसरों को कोई तकलीफ पहुंचे। अल्लाह का हुक्म है कि रोजेदार अपने नफ्स पर काबू रखे।