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Rampur News: डायमंड सिनेमा... अब कोई पिक्चर अभी बाकी नहीं है मेरे दोस्त

Wed, 19 Nov 2025 02:07 AM IST
मुरादाबाद ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, रामपुर
संवाद न्यूज एजेंसी, रामपुर Updated Wed, 19 Nov 2025 02:07 AM IST
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Diamond Cinema... there is no movie left now my friend
रामपुर। सामने पर्दे पर नायिका शोभा गुर्टू की ढुमरी पर नृत्य कर रही है- सैंया रूठ गए मैं मनाती रही..। पिक्चर चल रही है, मैं तुलसी तेरे आंगन की। हॉल खचाखच भरा हुआ है। कुछ बरस बीते। परदे पर दृश्य बदला हुआ है। मुकद्दर का सिकंदर का नायक दोनों हाथ छोड़कर बेफिक्री से मोटरसाइकिल चलाते हुए गा रहा है- रोते हुए आते हैं हंसता हुआ जो जाएगा...। हॉल फिर खचाखच भरा हुआ है।
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दृश्य फिर बदल गया है। यह आज का दौर है। परदे पर दे दे प्यार दे-2 चल रही है। रकुल प्रीति सिंह और अजय देवगन कुछ चुहल कर रहे हैं। हाल में गिनती के दर्शक उपस्थित हैं। उनमें से भी आधे से ज्यादा की नजरें पर्दे की बजाय अपने मोबाइल स्क्रीन पर हैं। वह स्क्रीन को स्क्रॉल करते हुए रील की अतरंगी दुनिया में खोए हुए हैं। यह शहर का डायमंड सिनेमा हॉल है। ऐसा सिनेमा हॉल जहां कभी टिकट ब्लैक में बिका करते थे। बेकाबू भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पुलिस बुलानी पड़ती थी मगर अरसे से यह सिनेमा हॉल अपने अस्तित्व के लिए जूझ रहा है।
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रामपुर में डायमंड अब भी लोकेशन जानने-समझने के लिए बड़ा लैंड मार्क तो है, बस सिनेमा के लिए पहले जैसा खिंचाव नहीं है। दो ओडी वाले डायमंड में अब फिल्म एक परदे तक सिमट गई है। काफी पहले बंद हो चुके दूसरे हिस्से में जादू का शो चलवाया जा रहा है ताकि उसके किराये से हॉल का मेंटीनेंस हो और बचे-खुचे स्टाफ की तनख्वाह दी जा सके।
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डायमंड सिनेमा में लंबे समय बुकिंग क्लर्क की जिम्मेदारी संभाल चुके 70 वर्षीय मोहम्मद फहीम खान बताते हैं कि दुल्हन वही जो पिया मन भाए की रिलीज के साथ 1982 में इस टॉकीज की शुरुआत हुई थी। डायमंड टॉकीज की यह पहली फिल्म कमाई के लिहाज से मील का पत्थर साबित हुई। बाद के वर्षों में मुकद्दर का सिकंदर, कुली समेत कई फिल्मों के टिकट की मारामारी खिड़की पर हकीकत की मारामारी तक पहुंची थी। सिनेमाघरों की सेवाओं में 42 साल गुजार चुके फहीम खान स्वीकारते हैं कि जो आज है आने वाले कल में वह भी मुश्किल होगा।




शहर की सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों से गहरी निस्बत रखने वाली तबस्सुम जहां कहती हैं- आज डिजिटल प्लेटफॉर्म पर इतना विविधतापूर्ण कंटेंट है कि किसी भी तरह की परफार्मिंग आर्ट के लिए उसके सामने टिके रहना मुश्किल हो गया है। आप देखिए, मुशायरों का आज क्या हाल है। जिन शहरों में रंगमंच है, वहां दर्शक नहीं मिल रहे हैं। सिनेमा हॉल सीधे-सीधे परफार्मिंग आर्ट भले ही न हो इसके लिए घर से निकलने और हॉल तक जाने में जहमत उठानी पड़ती है। तीन घंटे टिककर बैठना पड़ता है। अब लोगों में इतना धैर्य नहीं बचा है, इसलिए डायमंड जैसे सिनेमा हॉल अपने अस्तित्व के लिए जूझ रहे हैं।
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