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आजम खां के सामने अपने सियासी किले को बचाने की चुनौती
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रामपुर। नफरती भाषण देने के मामले में कोर्ट से तीन साल कैद की सजा मिलने के बाद आजम खां की विधायकी रद्द हो गई है। रामपुर शहर सीट को रिक्त घोषित कर दिया गया है। ऐसे में यहां पर उप चुनाव होगा। अब आजम खां के सामने अपने सियासी किले को बचाने की चुनौती होगी, जिस पर उनका पिछले 45 सालों से दबदबा कायम है। आजम खां जब तक इस मामले में सेशन कोर्ट या हाईकोर्ट से बरी नहीं हो जाते हैं, चुनाव नहीं लड़ पाएंगे। ऐसे में अगर रामपुर शहर विधानसभा सीट पर उप चुनाव होता है तो उनके सामने सबसे बड़ी समस्या यह होगी कि वो किसे चुनावी मैदान में उतारे।
आजम खां 1977 से सक्रिय राजनीति में हैं। उन्होंने विधानसभा का पहला चुनाव 1977 में लड़ा था, जिसमें उनको हार का सामना करना पड़ा था। आजम खां ने 1980 के विधानसभा चुनाव से अपनी जीत सफर शुरू किया था तो 2022 तक जारी है। इस बीच में 1996 में एक बार कांग्रेस के प्रत्याशी अफरोज अली खां से विधानसभा चुनाव का हार गए थे। उस वक्त पार्टी ने उनको राज्यसभा में भेज दिया था। आजम खां अब तक विधानसभा के 12 चुनाव लड़ चुके हैं, जिसमें से उनको 10 में जीत हासिल हुई थी। चार बार वो प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री भी रहे हैं। 2019 में उन्होंने रामपुर संसदीय सीट से लोकसभा का चुनाव लड़ा था और भारी मतों से विजयी हुए थे। आजम खां के सांसद बनने की स्थिति में उन्होंने रामपुर शहर विधानसभा की सीट छोड़ दी थी। इस सीट पर हुए उप चुनाव में उनकी पत्नी डॉ. तजीन फात्मा निर्वाचन हुई थीं।
हालांकि 2019 में आजम खां, उनकी पत्नी डॉ. तजीन फात्मा और बेटे अब्दुल्ला आजम के खिलाफ कई मुकदमे दर्ज हुए थे। र्की का वारंट जारी होने के बाद आजम खां ने डॉ. फात्मा और अब्दुल्ला के साथ कोर्ट में आत्मसमर्पण कर दिया था। इसके बाद तीनों को सीतापुर की जेल भेज दिया गया था। सभी मुकदमों में जमानत मिलने के बाद सबसे पहले डॉ. फात्मा और उसके अब्दुल्ला आजम जेल से बाहर आए थे। आजम खां लगभग 27 महीने तक जेल में रहने के बाद जमानत पर जेल से बाहर आए हैं। जेल रहते हुए उन्होंने रामपुर शहर सीट से सपा की टिकट पर विधानसभा का चुनाव लड़ा और जीते। विधायक बनने के बाद उन्होंने लोकसभा की सदस्यता छोड़ दी थी। लोकसभा के उप चुनाव में बाजी भाजपा के हाथ में रही।
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अब जब आजम खां की विधानसभा की सदस्यता चली गई है और रामपुर विधानसभा सीट पर उप चुनाव की सुगबुगाहट शुरू हो गई है तो उनके सामने सबसे बड़ी समस्या यह है कि उनकी इस परंपरागत सीट पर सपा का प्रत्याशी कौन होगा। उनके पुत्र अब्दुल्ला आजम तो पहले से स्वार सीट से विधायक हैं। डॉ. तजीन फात्मा की सेहत ठीक नहीं रहती है।
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आजम खां 1977 से सक्रिय राजनीति में हैं। उन्होंने विधानसभा का पहला चुनाव 1977 में लड़ा था, जिसमें उनको हार का सामना करना पड़ा था। आजम खां ने 1980 के विधानसभा चुनाव से अपनी जीत सफर शुरू किया था तो 2022 तक जारी है। इस बीच में 1996 में एक बार कांग्रेस के प्रत्याशी अफरोज अली खां से विधानसभा चुनाव का हार गए थे। उस वक्त पार्टी ने उनको राज्यसभा में भेज दिया था। आजम खां अब तक विधानसभा के 12 चुनाव लड़ चुके हैं, जिसमें से उनको 10 में जीत हासिल हुई थी। चार बार वो प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री भी रहे हैं। 2019 में उन्होंने रामपुर संसदीय सीट से लोकसभा का चुनाव लड़ा था और भारी मतों से विजयी हुए थे। आजम खां के सांसद बनने की स्थिति में उन्होंने रामपुर शहर विधानसभा की सीट छोड़ दी थी। इस सीट पर हुए उप चुनाव में उनकी पत्नी डॉ. तजीन फात्मा निर्वाचन हुई थीं।
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हालांकि 2019 में आजम खां, उनकी पत्नी डॉ. तजीन फात्मा और बेटे अब्दुल्ला आजम के खिलाफ कई मुकदमे दर्ज हुए थे। र्की का वारंट जारी होने के बाद आजम खां ने डॉ. फात्मा और अब्दुल्ला के साथ कोर्ट में आत्मसमर्पण कर दिया था। इसके बाद तीनों को सीतापुर की जेल भेज दिया गया था। सभी मुकदमों में जमानत मिलने के बाद सबसे पहले डॉ. फात्मा और उसके अब्दुल्ला आजम जेल से बाहर आए थे। आजम खां लगभग 27 महीने तक जेल में रहने के बाद जमानत पर जेल से बाहर आए हैं। जेल रहते हुए उन्होंने रामपुर शहर सीट से सपा की टिकट पर विधानसभा का चुनाव लड़ा और जीते। विधायक बनने के बाद उन्होंने लोकसभा की सदस्यता छोड़ दी थी। लोकसभा के उप चुनाव में बाजी भाजपा के हाथ में रही।
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अब जब आजम खां की विधानसभा की सदस्यता चली गई है और रामपुर विधानसभा सीट पर उप चुनाव की सुगबुगाहट शुरू हो गई है तो उनके सामने सबसे बड़ी समस्या यह है कि उनकी इस परंपरागत सीट पर सपा का प्रत्याशी कौन होगा। उनके पुत्र अब्दुल्ला आजम तो पहले से स्वार सीट से विधायक हैं। डॉ. तजीन फात्मा की सेहत ठीक नहीं रहती है।