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रजा लाइब्रेरी में टैगोर की शख्सियत पर व्याख्यान
Rampur
Updated Tue, 08 Oct 2013 05:41 AM IST
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रामपुर। रजा लाइब्रेरी में ‘फारसी साहित्य का टैगोर पर प्रभाव’ विषय पर हुए विस्तार व्याख्यान में टैगोर की शख्सियत पर प्रकाश डाला गया। मुख्य वक्ता शमीम तारिक ने कहा कि टैगोर के दादा का फारसी जुबान से रिश्ता था। इस नाते और और उनके ईरान भ्रमण से स्पष्ट होता है कि वह फारसी साहित्य से से प्रभावित थे।
रजा लाइब्रेरी में सोमवार को ‘फारसी साहित्य का टैगोर पर प्रभाव’ विषय पर विस्तार व्याख्यान हुआ। इसमें लाइब्रेरी के निदेशक प्रोफेसर एसएम अजीजउद्दीन हुसैन ने कहा कि 1801 में जन्मे रविंद्रनाथ टैगोर के दादा ने हफीज शीराजी की शायरी दीवान-ए-हाफिज (फारसी भाषा की पुस्तक) का बंगाली भाषा में अनुवाद किया था। इस प्रकार से हम कह सकते हैं कि रविंद्र नाथ टैगोर फारसी से प्रभावित थे। मुख्य वक्ता शमीम तारिक ने कहा कि दृष्टांत बताते हैं कि टैगोर असाधारण व्यक्तित्व के धन थे। वह कहानीकार, कवि, चित्रकार और स्वतंत्रता सेनानी भी थे। वह महात्मा गांधी के विचारों का समर्थन करते थे और आवश्यकता पड़ने पर विरोध भी जताते थे। उन्होंने बताया कि टैगोर के पूर्वज उत्तर प्रदेश के कन्नौज से आए थे। उनके दादा का फारसी जुबान से रिश्ता था। टैगोर ईरान भी गए थे और ईरान में रामायण, शिवपुराण और पंचतंत्र का फारसी भाषा में अनुवाद हो चुका था। फारसी भाषा का निसंदेह टैगोर के ऊपर प्रभाव पड़ा। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे जामिया मिलिया इस्लामिया नई दिल्ली के उर्दू विभाग के टैगोर प्रोजेक्ट के समन्वयक प्रोफेसर शहजाद अंजुम ने कहा कि टैगोर एवं उनके परिवार के जीवन चरित्र पर मुस्लिम जमीदारों की पुरानी तहजीब का अत्यधिक प्रभाव दिखाई देता है। उन्होंने कहा कि टैगोर का अध्ययन महान फनकार, कलाकार, शायर और कवि की तरह करना चाहिए। संचालन कार्यक्रम समन्वयक इस्बाह खां ने किया। इस अवसर पर डा. किश्वर सुल्ताना, अजहर इनायती, डा. मेहंदी हसन, डा. सै. अनवारुल हसन, हीरालाल किरण, नवेद केसर आदि थे।
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रजा लाइब्रेरी में सोमवार को ‘फारसी साहित्य का टैगोर पर प्रभाव’ विषय पर विस्तार व्याख्यान हुआ। इसमें लाइब्रेरी के निदेशक प्रोफेसर एसएम अजीजउद्दीन हुसैन ने कहा कि 1801 में जन्मे रविंद्रनाथ टैगोर के दादा ने हफीज शीराजी की शायरी दीवान-ए-हाफिज (फारसी भाषा की पुस्तक) का बंगाली भाषा में अनुवाद किया था। इस प्रकार से हम कह सकते हैं कि रविंद्र नाथ टैगोर फारसी से प्रभावित थे। मुख्य वक्ता शमीम तारिक ने कहा कि दृष्टांत बताते हैं कि टैगोर असाधारण व्यक्तित्व के धन थे। वह कहानीकार, कवि, चित्रकार और स्वतंत्रता सेनानी भी थे। वह महात्मा गांधी के विचारों का समर्थन करते थे और आवश्यकता पड़ने पर विरोध भी जताते थे। उन्होंने बताया कि टैगोर के पूर्वज उत्तर प्रदेश के कन्नौज से आए थे। उनके दादा का फारसी जुबान से रिश्ता था। टैगोर ईरान भी गए थे और ईरान में रामायण, शिवपुराण और पंचतंत्र का फारसी भाषा में अनुवाद हो चुका था। फारसी भाषा का निसंदेह टैगोर के ऊपर प्रभाव पड़ा। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे जामिया मिलिया इस्लामिया नई दिल्ली के उर्दू विभाग के टैगोर प्रोजेक्ट के समन्वयक प्रोफेसर शहजाद अंजुम ने कहा कि टैगोर एवं उनके परिवार के जीवन चरित्र पर मुस्लिम जमीदारों की पुरानी तहजीब का अत्यधिक प्रभाव दिखाई देता है। उन्होंने कहा कि टैगोर का अध्ययन महान फनकार, कलाकार, शायर और कवि की तरह करना चाहिए। संचालन कार्यक्रम समन्वयक इस्बाह खां ने किया। इस अवसर पर डा. किश्वर सुल्ताना, अजहर इनायती, डा. मेहंदी हसन, डा. सै. अनवारुल हसन, हीरालाल किरण, नवेद केसर आदि थे।
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