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नोट बंदी के 50 दिन बाद भी नहीं बदले हालात

Tue, 27 Dec 2016 11:55 PM IST
रायबरेली/ अमर उजाला ब्यूराे
रायबरेली/ अमर उजाला ब्यूराे Updated Tue, 27 Dec 2016 11:55 PM IST
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The situation did not change even after 50 days of Notbandi
money - फोटो : amar ujala
नोट बंदी के 50 दिन तो पूरे हो गए हैं, लेकिन मोदी के वादे के मुताबिक अभी भी हालात सामान्य नहीं हो सके हैं। सबसे बड़ी दिक्कत सामान्य मध्यम वर्ग के लिए है, जो दिन में हुई अपनी कमाई से परिवार का गुजारा करता है।
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करेंसी न होने की वजह से बड़े लोगों ने जहां रोजमर्रा की चीजों की खरीद में कमी कर दी है, वहीं फेरी वाले विक्रेता सामान न बिकने से परेशान हैं। करेंसी न होने से छोटे-मोटे प्रतिष्ठान चलाने वाले लोगों ने जहां अपने कामगारों ने कटौती कर दी है, वहीं छोटे व गरीब परिवार के लोग आय घटने से परेशान हैं।
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सबसे बदतर हालात देहात क्षेत्रों के हैं। इन क्षेत्रों के बैंकों व डाकघरों में करेंसी न होने से लोगों को खुद का पैसा भी नहीं मिल पा रहा है। यहां तक कि मनरेगा जॉब कार्डधारकों को भी बाद में रुपया देने की बात कहकर वापस कर दिया जाता है।
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दुसौती की रहने वाली गृहणी विभा सिंह कहती हैं कि प्रधानमंत्री की नोटबंदी से भले ही कुछ दिन परेशानी हो, लेकिन आने वाले समय में इसके अच्छे परिणाम सामने आएंगे। जहां सभी चीजों के दाम गिरेंगे, वहीं ब्याज दरों में कमी आएगी। कहती हैं कि बैंक अफसरों की वजह से करेंसी की कमी आ रही है। इसको लेकर सरकार को नजर रखनी चाहिए।

सब्जी बेचकर परिवार का गुजारा करने वाली फूलमती का कहना है कि नोट बंदी से पहले वह 400 से लेकर 500 रुपये तक की सब्जी बेच लेती थी। इसमें लाभ के रूप में 40-50 रुपये मिल जाते थे। इससे आसानी से उसके परिवार का खर्च चल जाता था।

नोटबंदी के बाद रोजाना आने वाले ग्राहकों ने उधार पर सब्जी लेनी शुरू कर दी है। अब उसे नकदी नहीं मिल पा रही है। जिन लोगों ने खरीदा है, वे भी करेंसी की वजह से परेशान हैं। इसलिए थोड़ा-थोड़ा पैसा देते हैं।

जेल रोड पर होटल चलाने वाले बब्बी शुक्ला के मुताबिक नोट बंदी के बाद उसके होटल में ग्राहकों की संख्या में काफी कमी आई है। पहले उसके दुकान में सुबह से ही चाय पीने वाले की भीड़ लग जाती थी। अब ग्राहकों की संख्या पहले से कम हो गई है।

जो लोग आते हैं, वे एक या फिर दो कप चाय पीकर दो हजार रुपये का नोट थमाते हैं। करेंसी न होने से उधार करना पड़ता है। वर्तमान में इसका आधा व्यवसाय उधारी पर चल रहा है। यह पैसा कब मिलेगा पता नहीं। फिलहाल उसे आर्थिक संकट का सामना करना पड़ रहा है। होटल का सामान उधारी में लाना पड़ता है।

डिग्री कॉलेज चौराहा पर ठेलिया पर चाय बेचने वाले मो. नईम तो नोट बंदी के बाबत पूछने पर उखड़ पड़ा। उसने उल्टे ही सवाल दाग दिया। आखिर नोटबंदी कर सरकार को मिला क्या। अमीर लोगों का काम ज्यों का त्यों चल रहा है। परेशान हम गरीबों को होना पड़ रहा है। धंधा चौपट हो गया है। 

बड़े व्यवसायी के रूप में पहचान रखने वाले उमेश सिकरिया कहते हैं कि उद्योग चलाने के लिए कच्चा माल मंगाने व अन्य संसाधन जुटाने में कैश की कमी खल रही है। नोट बंदी के बाद से कारोबार पर असर पड़ा है। इसके लिए कामगार मजदूरी के रूप में नकद पैसा चाहते हैं, लेकिन उनको नकद भुगतान करना संभव नहीं हो पा रहा है।


बड़े फल-सब्जी व्यवसायी हरिओम सोनकर कहते हैं कि नोट बंदी के बाद से फल की बिक्री में गिरावट आ गई है। अब मजबूरी में ही लोग फलों की खरीदारी कर रहे हैं। बड़े व्यवसायी पंकज मुरारका कहते हैं कि वे छोटी राइस मिल का काम चलाते हैं।

इसमें धान खरीदने से लेकर लेबर, वाहन का भुगतान करने में हर जगह कैश की आवश्यकता होती है। नोट बंदी के बाद से भुगतान दिक्कत का सामना हो रहा है।
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