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दो माननीयों के लिए सपा से टिकट पाना बना चुनौती
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रायबरेली। छह विधानसभा सीटों वाले रायबरेली जिले में वैसे तो हर सीट पर प्रमुख दलों से टिकट लेने वालों की लाइन लगी है, लेकिन ऊंचाहार विधानसभा सीट पर दो सूरमा अपनी-अपनी ताकत दिखाकर टिकट पाने के लिए बेताब हैं।
एक दल के हैं तो दूसरे दल बदलकर आए हैं। दोनों माननीय हैं। एक तीसरी बार विधायक बनकर हैट्रिक बनाने के लिए जोर आजमाइश कर रहे हैं तो दूसरे खुद या फिर बेटे के टिकट के लिए किसी हद तक जाने को तैयार हैं।
सपा मुखिया के सामने बड़ी चुनौती है कि आखिरकार किसको टिकट दें और किसका काटें। एक ब्राह्मण तो दूसरा पिछड़ा वर्ग का प्रमुख चेहरा है। माना जा रहा है कि दल वाले को टिकट नहीं मिला तो वह भी पाला बदलकर ऊंचाहार से ही ताल ठोकेंगे।
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ऊंचाहार विधानसभा सीट पहले डलमऊ विधानसभा के रूप में जानी जाती थी। यहां से स्वामी प्रसाद मौर्य कई बार विधायक बने और कई बार हारे। 2007 में बसपा के टिकट पर मैदान में थे।
हारने के बाद यह सीट छोड़कर पड़रौना चले गए। साल 2012 में बसपा से विधायक बनने के बाद 2017 के चुनाव से पहले भाजपा में शामिल हुए और चुनाव जीतने के बाद कैबिनेट मंत्री बनाए गए।
इधर 2012 और 2017 में डॉ. मनोज कुमार पांडेय ऊंचाहार सीट से चुनाव लड़े और जीते। मनोज के सामने स्वामी प्रसाद मौर्य के बेटे उत्कृष्ट मौर्य उर्फ अशोक उतरे और हार गए।
यही कसक स्वामी को बेचैन किए है। बेटी को तो भाजपा से सांसद बनवाने में कामयाबी पाई, लेकिन बेटे को विधायक नहीं बना पाए।
शायद यही वजह रही कि पिता और पुत्र दोनों के टिकट की गारंटी नहीं बन पाई तो विधानसभा चुनाव 2022 का बिगुल बजते ही सपा में आ गए। अब यहां भी टिकट का पेंच फंसा है।
इस बात की आम चर्चा है कि दोनों ही दिग्गज ऊंचाहार से टिकट चाहते हैं। खास बात यह है कि दोनों ही यह कहने से नहीं चूक रहे हैं कि नेताजी ने उनको ऊंचाहार से चुनाव लड़ने के लिए हरी झंडी दे दी है।
दावेदार क्षेत्र में सक्रिय हैं। सवाल यह उठ रहा है कि जब नेताजी ने हां कर दिया है तो टिकट की घोषणा क्यों नहीं की जा रही है। स्वामी की चाहत यह है कि सत्ता में रहते हुए क्षेत्र में सियासी जमीन तैयार की है तो उसका फायदा भी मिले, जबकि मनोज कुमार पांडेय चाहते हैं कि 10 साल एक दल में रहने और लोगों से जुड़े रहने का इनाम उन्हें ही मिलना चाहिए।
स्टार प्रचारकों की सूची से नाम गायब होने से बढ़ी हलचल
सपा की स्टार प्रचारकों की जारी सूची में ब्राह्मण चेहरा माने जाने वाले डॉ. मनोज कुमार पांडेय का नाम गायब होने से तरह-तरह की चर्चाएं आम हैं। कोई कह रहा है कि यह सूची ऊंचाहार से सपा से टिकट कटने और दूसरे दल में जाने का संकेत हैं तो कोई इसे दूसरे नजरिये से देख रहा है।
पिछले चुनाव में मनोज पांडेय का नाम सपा की स्टार प्रचारकों की सूची में था। सपा जिलाध्यक्ष वीरेंद्र यादव का कहना है कि टिकट का निर्णय तो हाईकमान ही करता है। किसका कट रहा है और किसको मिल रहा है, यह उनको नहीं पता।
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एक दल के हैं तो दूसरे दल बदलकर आए हैं। दोनों माननीय हैं। एक तीसरी बार विधायक बनकर हैट्रिक बनाने के लिए जोर आजमाइश कर रहे हैं तो दूसरे खुद या फिर बेटे के टिकट के लिए किसी हद तक जाने को तैयार हैं।
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सपा मुखिया के सामने बड़ी चुनौती है कि आखिरकार किसको टिकट दें और किसका काटें। एक ब्राह्मण तो दूसरा पिछड़ा वर्ग का प्रमुख चेहरा है। माना जा रहा है कि दल वाले को टिकट नहीं मिला तो वह भी पाला बदलकर ऊंचाहार से ही ताल ठोकेंगे।
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ऊंचाहार विधानसभा सीट पहले डलमऊ विधानसभा के रूप में जानी जाती थी। यहां से स्वामी प्रसाद मौर्य कई बार विधायक बने और कई बार हारे। 2007 में बसपा के टिकट पर मैदान में थे।
हारने के बाद यह सीट छोड़कर पड़रौना चले गए। साल 2012 में बसपा से विधायक बनने के बाद 2017 के चुनाव से पहले भाजपा में शामिल हुए और चुनाव जीतने के बाद कैबिनेट मंत्री बनाए गए।
इधर 2012 और 2017 में डॉ. मनोज कुमार पांडेय ऊंचाहार सीट से चुनाव लड़े और जीते। मनोज के सामने स्वामी प्रसाद मौर्य के बेटे उत्कृष्ट मौर्य उर्फ अशोक उतरे और हार गए।
यही कसक स्वामी को बेचैन किए है। बेटी को तो भाजपा से सांसद बनवाने में कामयाबी पाई, लेकिन बेटे को विधायक नहीं बना पाए।
शायद यही वजह रही कि पिता और पुत्र दोनों के टिकट की गारंटी नहीं बन पाई तो विधानसभा चुनाव 2022 का बिगुल बजते ही सपा में आ गए। अब यहां भी टिकट का पेंच फंसा है।
इस बात की आम चर्चा है कि दोनों ही दिग्गज ऊंचाहार से टिकट चाहते हैं। खास बात यह है कि दोनों ही यह कहने से नहीं चूक रहे हैं कि नेताजी ने उनको ऊंचाहार से चुनाव लड़ने के लिए हरी झंडी दे दी है।
दावेदार क्षेत्र में सक्रिय हैं। सवाल यह उठ रहा है कि जब नेताजी ने हां कर दिया है तो टिकट की घोषणा क्यों नहीं की जा रही है। स्वामी की चाहत यह है कि सत्ता में रहते हुए क्षेत्र में सियासी जमीन तैयार की है तो उसका फायदा भी मिले, जबकि मनोज कुमार पांडेय चाहते हैं कि 10 साल एक दल में रहने और लोगों से जुड़े रहने का इनाम उन्हें ही मिलना चाहिए।
स्टार प्रचारकों की सूची से नाम गायब होने से बढ़ी हलचल
सपा की स्टार प्रचारकों की जारी सूची में ब्राह्मण चेहरा माने जाने वाले डॉ. मनोज कुमार पांडेय का नाम गायब होने से तरह-तरह की चर्चाएं आम हैं। कोई कह रहा है कि यह सूची ऊंचाहार से सपा से टिकट कटने और दूसरे दल में जाने का संकेत हैं तो कोई इसे दूसरे नजरिये से देख रहा है।
पिछले चुनाव में मनोज पांडेय का नाम सपा की स्टार प्रचारकों की सूची में था। सपा जिलाध्यक्ष वीरेंद्र यादव का कहना है कि टिकट का निर्णय तो हाईकमान ही करता है। किसका कट रहा है और किसको मिल रहा है, यह उनको नहीं पता।