न्याय की आस में टूट रहीं लोगों की उम्मीदें

Raebareli Updated Tue, 26 Nov 2013 05:42 AM IST
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केस एक
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धन रिकवरी के बाद भी नहीं मिली सूचना
रिंकू पुत्र रामअवध निवासी बेनीकामा ब्लॉक जगतपुर ने ग्राम पंचायत अधिकारी से 11 मई 2011 को पांच बिंदुओं पर सूचना मांगी थी। सूचना न मिलने पर 17 अक्तूबर 11 को राज्य सूचना आयोग में अपील की। पांच मार्च 2012 को ग्राम पंचायत अधिकारी बेनीकामा बुधराम के खिलाफ सूचना न देने पर 25 हजार रुपये अर्थदंड लगाया गया। धन की रिकवरी हो गई, लेकिन सूचना आज तक नहीं मिली।
केस दो-
गैरजिम्मेदार सीएमओ पर भी लगा अर्थदंड
शहर में मिलन सिनेमा के निकट रहने वाले डॉ. रज्जनलाल सोनकर ने जिला परियोजना अधिकारी परिवार कल्याण जेल रोड से 30 जनवरी 2011 को आठ बिंदुओं पर सूचना मांगी थी। सूचना न मिलने पर चार मार्च 11 को प्रथम अपील और 19 अप्रैल को राज्य सूचना आयोग में अपील की। राज्य सूचना आयोग की ओर से सुनवाई के लिए कई पेशी लगाई गईं। इसके बाद छह फरवरी 2013 को सीएमओ पर 25 हजार रुपये का अर्थदंड लगाया गया। आदेश के अनुपालन में अभी तक रिकवरी नहीं हुई।

रायबरेली। आम आदमी को न्याय दिलाने के लिए भारतीय संविधान में कानून तो बनाए गए हैं, लेकिन उनका सही ढंग से अनुपालन न होने से पीड़ितों को समय से न्याय नहीं मिला पा रहा है। कोर्ट, कचहरी और विभागों के चक्कर लगाते-लगाते फैसला आने में वर्षों लग जाते हैं। इसके चलते अदालतों पर जहां मुकदमों का बोझ बढ़ता जा रहा है, वहीं आम आदमी को आर्थिक, शारीरिक और मानसिक परेशानी से गुजरना पड़ता है।
आज विश्व कानून दिवस है। जाहिर सी बात है कि न्यायिक कार्यालयों, विभागों में इसको लेकर गोष्ठियां, जागरूकता अभियान तक चलाए जाएंगे। जिले में दीवानी कचहरी, कलेक्ट्रेट, तहसील दिवस, थाना दिवस आदि में 50 हजार से अधिक मामले में लंबित हैं। इनके निस्तारण को लेकर कोई ठोस कदम नहीं उठाया जा रहा है।
केंद्र सरकार की ओर से आरटीआई (राइट टू इनफार्मेशन एक्ट) 2005 में बनाया गया। इसको लेकर पहले तो अधिकारियों में काफी खौफ रहा। समय व्यतीत होने के साथ ही धीरे-धीरे यह भी सुस्त पड़ने लगा। राज्य सूचना आयोग के अर्थदंड लगाने के बावजूद भी सूचनाएं नहीं मिल पा रही हैं। अब तक करीब 40 हजार आवेदन किए गए हैं। इसमें से अभी लगभग 15 हजार लोगों को सूचनाएं नहीं मिल सकी हैं।

इनसेट
राज्य आयोग में भी हो तेजी से सुनवाई
सूचना का अधिकार टास्क फोर्स के जिलाध्यक्ष शंभूरतन वाजपेयी का कहना है कि अधिनियम में व्यवस्थाएं अच्छी की गई हैं। एक माह के अंदर सूचना देने की व्यवस्था है। राज्य सूचना आयोग में सुनवाई के दौरान कई महीने लग जाते हैं। ऐसे में आवेदनकर्ता को समय से सूचना नहीं मिल पाती है। सरकार को राज्य आयोग में भी सुनवाई की समय सीमा निर्धारित करनी चाहिए।

इनसेट
हड़ताल से प्रभावित होता है कार्य
साल भर में 200 से ज्यादा सरकारी छुट्टियों से न्यायिक कार्य प्रभावित होता ही है। साथ ही वकीलों के न्यायिक कार्य के बहिष्कार से पीड़ितों को समय से न्याय नहीं मिलता है। बात कलेक्ट्रेट और तहसील की करें तो यहां पर शायद ही कोई सप्ताह खाली जाता हो। कलेक्ट्रेट बार एसोसिएशन अध्यक्ष के मुताबिक सप्ताह में दो से तीन दिन ही काम हो पाता है। अधिवक्ता तो कभी कर्मचारी संगठन हड़ताल पर चले जाते हैं। हालांकि दीवानी कचहरी में हालात बेहतर है। यहां छुट्टियां भी कम हैं और हड़ताल एक साल में 10 से 15 दिन हुई है।

इनसेट-
बार और बेंच के बीच बने सामंजस्य
वरिष्ठ अधिवक्ता लाभ सिंह मोंगा का कहना है कि छोटे विवादों का लोक अदालत और थाना स्तर पर निस्तारण होना चाहिए। इससे कोर्ट पर अनावश्यक बोझ नहीं पड़ेगा। सेंट्रल बार एसोसिएशन के अध्यक्ष राकेश कुमार सिंह राना और महामंत्री विनोद कुमार द्विवेदी का कहना है कि निस्तारण में तेजी के लिए बार और बेंच में सामंजस्य होना चाहिए। महिला अधिवक्ता विजय लक्ष्मी द्विवेदी का कहना है कि महिला उत्पीड़न संबंधी मामलों के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट का गठन कर त्वरित निस्तारण करना चाहिए।

विवेचना में तेजी के लिए निर्देश जारी किए गए हैं। कोर्ट में लंबित मामलों के निस्तारण के लिए हरसंभव कोशिश की जाती है।
राजेश पांडेय, एसपी

इनसेट
अपराध रोकने को उठाए जाएं सख्त कदम
वरिष्ठ नागरिक एवं सेवानिवृत्त खंड विकास अधिकारी जेपी मिश्र का कहना है कि जिले की कानून व्यवस्था काफी लचर है। ग्रामीण अंचलों की कौन कहे शहर में ही आए दिन आपराधिक घटनाएं हो रही हैं। इसे रोकने के लिए सख्त कदम उठाने की जरूरत है। पूर्व प्राचार्य एफजी कॉलेज रामबहादुर वर्मा का कहना है कि पुलिस विभाग को राजनीतिक दबाव से मुक्त रखना होगा, तभी कानून व्यवस्था में सुधार होगा। किसान धीरेंद्र सिंह का कहना है कि थाना और कोतवाली स्तर पर अच्छे और ईमानदार अधिकारियों की तैनाती होनी चाहिए।
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