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दुश्मनी का नहीं था नामोनिशान, हंसकर लड़े जाते थे चुनाव
Updated Fri, 10 Nov 2017 12:34 AM IST
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दुश्मनी का नहीं था नामोनिशान, हंसकर लड़े जाते थे चुनाव
रायबरेली। पहले और आज के चुनाव की तस्वीर बदल सी गई है। आज नामांकन प्रक्रिया के दौरान ही प्रत्याशी विपक्षियों को अपनी ताकत दिखाने का एहसास कराते हैं। पर पहले ऐसा नहीं होता था। बस दो से तीन लोगों के साथ ही दावेदार नामांकन स्थल पहुंचकर अपना परचा जमा कर देता था। आज के दौर में चुनाव को लेकर जिस तरह तलवारें खिंच जाती थी, वैसे भी नहीं था। दुश्मनी का नामोनिशान नहीं रहता था। हंसकर प्रत्याशी व उनके समर्थक चुनाव लड़ते थे। शोर-शराबा भी कम रहता था। एक बार फिर निकाय चुनाव की रणभेरी बज चुकी है। नामांकन प्रक्रिया शुरू हो गई है। बुजुर्गों से चुनाव को लेकर उनकी यादों को कुरेदा गया तो उन्होंने अपनी बात को बेबाकी के साथ रखा।
भौकाल नहीं दिखाया जाता था
अमर नगर के दिनेश कुमार त्रिपाठी व इंदिरा नगर के रहने वाले रवींद्र पांडेय कहते हैं कि पहले और आज के चुनाव में बहुत फर्क हो गया है। उनके समय मोहनलाल त्रिपाठी अध्यक्ष बने थे। उन्हें याद है कि वे नामांकन करने महज तीन-चार लोगों के साथ गए थे। कोई शोर-शराबा नहीं था। भौकाल नहीं दिखाया जाता था। सुबह प्रचार और शाम को सब लोग मिलकर चाय की चुस्की लेते थे। अब ऐसा नहीं है। एक दूसरे से प्रत्याशी दूरी बनाए रखते हैं। साथ ही एक दूसरे का खूब विरोध करते हैं।
चुनाव में बना रहता था भाईचारा
प्रभु टाउन के रहने वाले सुभाषचंद्र सक्सेना व सत्य नगर के रहने वाले रामू से चुनाव की बात छिड़ते ही पुरानी यादों में खो जाते हैं। कहते हैं कि क्या चुनाव होते थे। किसी से कोई गिला शिकवा नहीं रहता था। भाईचारा रहता था। आज तो थोड़ी सी बात को लेकर विवाद खडा़ हो जाता है। कोई भय नहीं रहता था। मोहनलाल त्रिपाठी चुनाव जीतकर अध्यक्ष बने थे। हम लोग खुशी से झूम रहे थे।
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कुर्सी का नहीं रहता था लोभ
जायस के रहने वाले जुगड़ीलाल कौशल कहते हैं कि आज के दौर में निकाय चुनाव में भी बहुत शोरशराबा होने लगा है। चुनाव देखकर लगता है कि विधानसभा का चुनाव हो गया है। ऐसा कुर्सी के लोभ को लेकर हुआ है। पहले कुर्सी का लोग ज्यादा नहीं रहता था। लोकतंत्र सेनानी गोविंदलाल गुप्ता कहते हैं कि चुनाव में प्रत्याशी रुपया ज्यादा खर्च करने लगे हैं। पहले तीन से चार हजार रुपये चुनाव में खर्च होते थे। उन्हें याद है कि रायबरेली में अध्यक्ष पद पर मोहनलाल त्रिपाठी चुनाव हारते-हारते जीत गए थे।
बहुत कम होता था प्रचार-प्रसार
महराजगंज कस्बे के रहने वाली सुशीला देवी और नंदकुमार पांडेय कहते हैं कि निकाय चुनाव में पहले बहुत शांति रहती थी। प्रचार-प्रसार बहुत कम होता था। आज के दौर में बड़े चुनाव को छोड़िए छोटे चुनाव में जीत हासिल करने के लिए दावेदारों में मारामारी रहती है। चुनाव के दौरान भी लोग एक-दूसरे का सम्मान करते थे। आज तो चुनाव जीतने के लिए अभद्र व्यवहार तक कर दिया जाता है। चुनाव जीतने के लिए रुपया खर्च किया जाता है। आज ऐसा नहीं है। पहले अब के चुनाव में बहुत फर्क हो गया है।
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रायबरेली। पहले और आज के चुनाव की तस्वीर बदल सी गई है। आज नामांकन प्रक्रिया के दौरान ही प्रत्याशी विपक्षियों को अपनी ताकत दिखाने का एहसास कराते हैं। पर पहले ऐसा नहीं होता था। बस दो से तीन लोगों के साथ ही दावेदार नामांकन स्थल पहुंचकर अपना परचा जमा कर देता था। आज के दौर में चुनाव को लेकर जिस तरह तलवारें खिंच जाती थी, वैसे भी नहीं था। दुश्मनी का नामोनिशान नहीं रहता था। हंसकर प्रत्याशी व उनके समर्थक चुनाव लड़ते थे। शोर-शराबा भी कम रहता था। एक बार फिर निकाय चुनाव की रणभेरी बज चुकी है। नामांकन प्रक्रिया शुरू हो गई है। बुजुर्गों से चुनाव को लेकर उनकी यादों को कुरेदा गया तो उन्होंने अपनी बात को बेबाकी के साथ रखा।
भौकाल नहीं दिखाया जाता था
अमर नगर के दिनेश कुमार त्रिपाठी व इंदिरा नगर के रहने वाले रवींद्र पांडेय कहते हैं कि पहले और आज के चुनाव में बहुत फर्क हो गया है। उनके समय मोहनलाल त्रिपाठी अध्यक्ष बने थे। उन्हें याद है कि वे नामांकन करने महज तीन-चार लोगों के साथ गए थे। कोई शोर-शराबा नहीं था। भौकाल नहीं दिखाया जाता था। सुबह प्रचार और शाम को सब लोग मिलकर चाय की चुस्की लेते थे। अब ऐसा नहीं है। एक दूसरे से प्रत्याशी दूरी बनाए रखते हैं। साथ ही एक दूसरे का खूब विरोध करते हैं।
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चुनाव में बना रहता था भाईचारा
प्रभु टाउन के रहने वाले सुभाषचंद्र सक्सेना व सत्य नगर के रहने वाले रामू से चुनाव की बात छिड़ते ही पुरानी यादों में खो जाते हैं। कहते हैं कि क्या चुनाव होते थे। किसी से कोई गिला शिकवा नहीं रहता था। भाईचारा रहता था। आज तो थोड़ी सी बात को लेकर विवाद खडा़ हो जाता है। कोई भय नहीं रहता था। मोहनलाल त्रिपाठी चुनाव जीतकर अध्यक्ष बने थे। हम लोग खुशी से झूम रहे थे।
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कुर्सी का नहीं रहता था लोभ
जायस के रहने वाले जुगड़ीलाल कौशल कहते हैं कि आज के दौर में निकाय चुनाव में भी बहुत शोरशराबा होने लगा है। चुनाव देखकर लगता है कि विधानसभा का चुनाव हो गया है। ऐसा कुर्सी के लोभ को लेकर हुआ है। पहले कुर्सी का लोग ज्यादा नहीं रहता था। लोकतंत्र सेनानी गोविंदलाल गुप्ता कहते हैं कि चुनाव में प्रत्याशी रुपया ज्यादा खर्च करने लगे हैं। पहले तीन से चार हजार रुपये चुनाव में खर्च होते थे। उन्हें याद है कि रायबरेली में अध्यक्ष पद पर मोहनलाल त्रिपाठी चुनाव हारते-हारते जीत गए थे।
बहुत कम होता था प्रचार-प्रसार
महराजगंज कस्बे के रहने वाली सुशीला देवी और नंदकुमार पांडेय कहते हैं कि निकाय चुनाव में पहले बहुत शांति रहती थी। प्रचार-प्रसार बहुत कम होता था। आज के दौर में बड़े चुनाव को छोड़िए छोटे चुनाव में जीत हासिल करने के लिए दावेदारों में मारामारी रहती है। चुनाव के दौरान भी लोग एक-दूसरे का सम्मान करते थे। आज तो चुनाव जीतने के लिए अभद्र व्यवहार तक कर दिया जाता है। चुनाव जीतने के लिए रुपया खर्च किया जाता है। आज ऐसा नहीं है। पहले अब के चुनाव में बहुत फर्क हो गया है।