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58 लाख के घपले में बाबू दोषी,
Updated Fri, 02 Feb 2018 11:34 PM IST
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58 लाख रुपये के घपले में बाबू दोषी
रायबरेली। चुनाव आयोग से मिले 58 लाख रुपये में हुए गड़बड़झाले के मामले की जांच तीन सदस्यीय टीम कर रही है। चुनाव आयोग ने जिले स्तर पर इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों को रखने को गोदाम बनाने के लिए बजट दिया था।
तत्कालीन अधिकारियों व कर्मचारियों ने धनराशि को इधर-उधर कर दिया ह। जांच टीम ने चुनाव कार्यालय और कोषागार में सील किए गए अलमारियों को खोलकर अभिलेखों की जांच की।
प्रथम दृष्टया संबंधित कर्मचारी दोषी पाया गया है। मामले में तत्कालीन एडीएम (वित्त एवं राजस्व) पर भी शक की सुई घूम रही है, क्योंकि चेकों पर बिना उनके साइन के भुगतान हो ही नहीं सकता था। जांच शुरू होने के बाद हड़कंप मच गया है।
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पिछले साल चुनाव आयोग ने सभी विधानसभा क्षेत्रवार इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों को रखने के लिए कलेक्ट्रेट में गोदाम बनाने के लिए बजट दिया था।
आयोग से 1.22 करोड़ रुपये दिए गए थे। जिसमें जिला प्रशासन ने 1.15 करोड़ रुपये से गोदाम बनवाने की स्वीकृति दी थी। इसमें पहली किस्त निर्माण इकाई पैकफेड को दी गई थी।
फरवरी 2017 में निर्माण इकाई ने पहली किस्त की धनराशि को खर्च कर जिला प्रशासन से दूसरी किस्त के 58 लाख रुपये दिए जाने की मांग की तो घपले की पोल खुल गई।
गोदाम बनवाने के लिए मिले 58 लाख रुपये खाते में नहीं मिले। उसी समय मामले की जांच शुरू की गई थी, लेकिन सेटिंग-गेटिंग कर मामले को रफा-दफा कर दिया गया था, क्योंकि उस समय एडीएम और बाबू यहीं तैनात था।
अब न यहां बाबू है और न एडीएम। आयोग के कडे़ रुख के बाद अब जांच के लिए सीडीओ राकेश कुमार, सिटी मजिस्ट्रेट आलोक कुमार समेत तीन अधिकारियों की टीम गठित की गई है।
टीम ने चुनाव कार्यालय और ट्रेजरी में पूर्व में सील किए गए अभिलेखों को निकलवाकर चेक किया। जांच में प्रथम दृष्टया बाबू दोषी पाया गया है।
हालांकि तत्कालीन एडीएम पर भी शक की सुई घूम रही है, क्योंकि बिना एडीएम के चेक पर साइन के भुगतान नहीं हो सकता था।
हालांकि टीम मामले की तह तक पहुंचने का प्रयास कर रही है। टीम के सदस्यों का कहना है कि अभी तो निशाने पर बाबू है और लोगों के बारे में भी जांच की जाएगी। इसके बाद ही कुछ कहा जा सकता है।
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रायबरेली। चुनाव आयोग से मिले 58 लाख रुपये में हुए गड़बड़झाले के मामले की जांच तीन सदस्यीय टीम कर रही है। चुनाव आयोग ने जिले स्तर पर इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों को रखने को गोदाम बनाने के लिए बजट दिया था।
तत्कालीन अधिकारियों व कर्मचारियों ने धनराशि को इधर-उधर कर दिया ह। जांच टीम ने चुनाव कार्यालय और कोषागार में सील किए गए अलमारियों को खोलकर अभिलेखों की जांच की।
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प्रथम दृष्टया संबंधित कर्मचारी दोषी पाया गया है। मामले में तत्कालीन एडीएम (वित्त एवं राजस्व) पर भी शक की सुई घूम रही है, क्योंकि चेकों पर बिना उनके साइन के भुगतान हो ही नहीं सकता था। जांच शुरू होने के बाद हड़कंप मच गया है।
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पिछले साल चुनाव आयोग ने सभी विधानसभा क्षेत्रवार इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों को रखने के लिए कलेक्ट्रेट में गोदाम बनाने के लिए बजट दिया था।
आयोग से 1.22 करोड़ रुपये दिए गए थे। जिसमें जिला प्रशासन ने 1.15 करोड़ रुपये से गोदाम बनवाने की स्वीकृति दी थी। इसमें पहली किस्त निर्माण इकाई पैकफेड को दी गई थी।
फरवरी 2017 में निर्माण इकाई ने पहली किस्त की धनराशि को खर्च कर जिला प्रशासन से दूसरी किस्त के 58 लाख रुपये दिए जाने की मांग की तो घपले की पोल खुल गई।
गोदाम बनवाने के लिए मिले 58 लाख रुपये खाते में नहीं मिले। उसी समय मामले की जांच शुरू की गई थी, लेकिन सेटिंग-गेटिंग कर मामले को रफा-दफा कर दिया गया था, क्योंकि उस समय एडीएम और बाबू यहीं तैनात था।
अब न यहां बाबू है और न एडीएम। आयोग के कडे़ रुख के बाद अब जांच के लिए सीडीओ राकेश कुमार, सिटी मजिस्ट्रेट आलोक कुमार समेत तीन अधिकारियों की टीम गठित की गई है।
टीम ने चुनाव कार्यालय और ट्रेजरी में पूर्व में सील किए गए अभिलेखों को निकलवाकर चेक किया। जांच में प्रथम दृष्टया बाबू दोषी पाया गया है।
हालांकि तत्कालीन एडीएम पर भी शक की सुई घूम रही है, क्योंकि बिना एडीएम के चेक पर साइन के भुगतान नहीं हो सकता था।
हालांकि टीम मामले की तह तक पहुंचने का प्रयास कर रही है। टीम के सदस्यों का कहना है कि अभी तो निशाने पर बाबू है और लोगों के बारे में भी जांच की जाएगी। इसके बाद ही कुछ कहा जा सकता है।