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Pratapgarh News: चरखा बांटने पर शोभनाथ पांडेय से खफा हो गई थी अंग्रेजी हुकूमत
Sun, 13 Aug 2023 09:00 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, प्रतापगढ़
संवाद न्यूज एजेंसी, प्रतापगढ़
Updated Sun, 13 Aug 2023 09:00 PM IST
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पट्टी तहसील के उड़ैयाडीह के रहने वाले स्वतंत्रता संग्राम सेनानी को भेजा गया था बस्ती जेल
किस्से आजादी के
संवाद न्यूज एजेंसी
शिवगढ़। देश को आजाद कराने के आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाने वाले शोभनाथ पांडेय के चरखा वितरण से नाराज अंग्रेजी हुकूमत ने उन्हें जेल की सलाखों के पीछे डाल दिया था। जेल से छूटने के बाद भी उनका हौंसला नहीं डिगा और वह फिर से आंदोलन में सक्रिय हो गए थे।
पट्टी तहसील के उड़ैयाडीह निवासी शोभनाथ पांडेय ने सत्याग्रह आंदोलन में बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया था। उन्होंने वर्ष 1939 में चलाए गए चरखा आंदोलन के दौरान जामताली में तीन और बभनमई में 130 चरखा वितरित करते हुए लोगों को देश की स्वतंत्रता के लिए गांव-गांव प्रेरित किया था। इस बात की जानकारी होने पर अंग्रेजी हुकूमत ने उन्हें जेल में डाल दिया था। पांच माह की सजा सुनाने के साथ ही उन पर 15 रुपये जुर्माना लगाया गया था। इसके अलावा वर्ष 1941 में गांधी आश्रम मगहर बस्ती में आयोजित आंदोलन में शामिल होने पर उन्हें पकड़ कर जेल में बंद किया गया था। 27 अक्तूबर 1943 को वह पांच माह की सजा और 19 रुपये जुर्माना जमा करने के बाद छूटे थे। इनके आंदोलन में बढ़ चढ़कर हिस्सा लेने का असर पत्नी जयंता देवी पर भी पड़ा। इनके नाती अशोक शुक्ला बताते हैं कि देश आजाद होने के बाद नाना ने बाजार में ग्रामीणों के साथ जश्न मनाया था। 86 वर्ष की उम्र में 23 जून 2006 को उनका निधन हो गया था। उनकी बेटी हीरावती देवी को पेंशन मिलती है। वर्ष 2005 में सरकार ने पेट्रोल पंप भी आवंटित किया। गांव में अभी भी पक्की सड़कें नहीं बन पाई हैं। परिजनों को इस बात का मलाल है कि देश की आजादी के लिए संघर्ष करने वाले स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के नाम से कोई स्मारक व संस्थान नहीं है।
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किस्से आजादी के
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शिवगढ़। देश को आजाद कराने के आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाने वाले शोभनाथ पांडेय के चरखा वितरण से नाराज अंग्रेजी हुकूमत ने उन्हें जेल की सलाखों के पीछे डाल दिया था। जेल से छूटने के बाद भी उनका हौंसला नहीं डिगा और वह फिर से आंदोलन में सक्रिय हो गए थे।
पट्टी तहसील के उड़ैयाडीह निवासी शोभनाथ पांडेय ने सत्याग्रह आंदोलन में बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया था। उन्होंने वर्ष 1939 में चलाए गए चरखा आंदोलन के दौरान जामताली में तीन और बभनमई में 130 चरखा वितरित करते हुए लोगों को देश की स्वतंत्रता के लिए गांव-गांव प्रेरित किया था। इस बात की जानकारी होने पर अंग्रेजी हुकूमत ने उन्हें जेल में डाल दिया था। पांच माह की सजा सुनाने के साथ ही उन पर 15 रुपये जुर्माना लगाया गया था। इसके अलावा वर्ष 1941 में गांधी आश्रम मगहर बस्ती में आयोजित आंदोलन में शामिल होने पर उन्हें पकड़ कर जेल में बंद किया गया था। 27 अक्तूबर 1943 को वह पांच माह की सजा और 19 रुपये जुर्माना जमा करने के बाद छूटे थे। इनके आंदोलन में बढ़ चढ़कर हिस्सा लेने का असर पत्नी जयंता देवी पर भी पड़ा। इनके नाती अशोक शुक्ला बताते हैं कि देश आजाद होने के बाद नाना ने बाजार में ग्रामीणों के साथ जश्न मनाया था। 86 वर्ष की उम्र में 23 जून 2006 को उनका निधन हो गया था। उनकी बेटी हीरावती देवी को पेंशन मिलती है। वर्ष 2005 में सरकार ने पेट्रोल पंप भी आवंटित किया। गांव में अभी भी पक्की सड़कें नहीं बन पाई हैं। परिजनों को इस बात का मलाल है कि देश की आजादी के लिए संघर्ष करने वाले स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के नाम से कोई स्मारक व संस्थान नहीं है।
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