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प्रतापगढ़: हर विधानसभा क्षेत्र में अब कार्यालय, सोशल मीडिया का इस्तेमाल
Mon, 22 Apr 2019 12:10 AM IST
विनोद सिंह
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, प्रतापगढ़
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, प्रतापगढ़
Published by: विनोद सिंह
Updated Mon, 22 Apr 2019 12:10 AM IST
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पहले चुनावों में पार्टी का माहौल बनाने व प्रत्याशी के प्रचार- प्रसार को लेकर पदाधिकारियों एवं कार्यकर्ताओं का जोश भी आज की तरह ही था, मगर तब न तो जगह- जगह-कार्यालय थे और न ही इतने संसाधन। जिला मुख्यायल स्थित कार्यालय से चुनावी बिगुल बजता था, रणनीति बनती थी और प्रचार-प्रसार के लिए कार्यकर्ता व पदाधिकारी नियुक्त किए जाते थे।
कार्यकर्ता गांव में प्रचार-प्रसार कर माहौल बनाते थे। पदाधिकारी साइकिल व इक्के से जाकर गांवों में माहौल भांपते थे। अब प्रचार का तरीका हाईटेक हो गया है। हर विधानसभा क्षेत्र में प्रत्याशियों के कार्यालय हैं। प्रचार में सोशल मीडिया का इस्तेमाल किया जा रहा है।
आजादी के बाद 1952 में हुए लोकसभा चुनाव के दौरान जिले में कांग्रेस, जनसंघ, अखिल भारतीय रामराज परिषद, सोशलिस्ट पार्टी के कार्यालय की स्थापना हुई थी। तब कांग्रेस का दबदबा हुआ करता था। अन्य पार्टियां अपनी सियासी जमीन तैयार करने में जुटी थीं। इसके लिए जिला कार्यकारिणी का गठन, बूथ लेवल पर कार्यकर्ताओं की तैनाती की जा रही थी।
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लोकसभा व विधानसभा चुनाव में प्रचार-प्रसार रणनीति के साथ होता था। सर्वोदय सद्भावना संस्थान के अध्यक्ष ओमप्रकाश पांडेय बताते हैं कि तब सभी पार्टियों का एक ही कार्यालय हुआ करता था। मुख्यालय पर स्थित कार्यालय पर ही कार्यकर्ताओं की बैठक, पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की सभा और चुनावी रणनीति बनती थी। प्रचार- प्रसार के लिए अलग से कोई कार्यालय नहीं खुलता था।
चुनाव के एक महीने पहले कार्यकर्ताओं की एक बैठक कार्यालय पर होती थी और उसी दिन पदाधिकारियों एवं कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारी तय कर दी जाती। कार्यकर्ता गांव-गांव पैदल भ्रमण कर प्रचार-प्रसार करते, जबकि पदाधिकारी साइकिल व इक्के से माहौल भांपते। इसके बाद कार्यकर्ताओं से जानकारी लेते। 1952 से 1989 तक करीब-करीब चुनाव प्रचार का यही तरीका रहा।
1989 के बाद चुनाव प्रसार का तरीका बदलना शुरू हुआ। अब प्रत्याशियों ने जिला मुख्यालय के साथ हर विधानसभा क्षेत्र में अपने कार्यालय खोल लिए हैं। जहां प्रचार और जनसंपर्क के लिए प्रभारी भी तैनात किए गए हैं। इसके अलावा चुनाव प्रचार के लिए सोशल मीडिया का भी खूब इस्तेमाल किया जा रहा है। प्रत्याशियों की गतिविधियों को पल-पल अपडेट करने के साथ ही एक-दूसरे पर वार और पलटवार भी किया जा रहा है।
पहले प्रचार के लिए किराए पर ली जाती थीं साइकिलें
चुनाव का माहौल भांपने के लिए जिले से पदाधिकारियों की टोली निकलती थी। पूर्व विधायक बाबूलाल श्रीवास्तव के पुत्र डा. अविनाश श्रीवास्तव बताते हैं कि यह टोली साइकिल से भ्रमण करती थीं। साइकिल किराए पर ली जाती थी। शहर स्थित प्रकाश साइकिल स्टोर पर पार्टियों के पदाधिकारी संपर्क करते थे।
कांग्रेस ने सबसे पहले शुरू किया कार्यालय का विस्तार
कांग्रेस ने सबसे पहले कार्यालय का विस्तार करना शुरू किया। ओमप्रकाश पांडेय बताते हैं कि मुख्यालय के बाद दूसरा कार्यालय कांग्रेस पार्टी द्वारा लालगंज में स्थापित किया गया। 1989 के बाद कार्यालयों का विस्तार व प्रचार-प्रसार का तरीका बदला।
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कार्यकर्ता गांव में प्रचार-प्रसार कर माहौल बनाते थे। पदाधिकारी साइकिल व इक्के से जाकर गांवों में माहौल भांपते थे। अब प्रचार का तरीका हाईटेक हो गया है। हर विधानसभा क्षेत्र में प्रत्याशियों के कार्यालय हैं। प्रचार में सोशल मीडिया का इस्तेमाल किया जा रहा है।
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आजादी के बाद 1952 में हुए लोकसभा चुनाव के दौरान जिले में कांग्रेस, जनसंघ, अखिल भारतीय रामराज परिषद, सोशलिस्ट पार्टी के कार्यालय की स्थापना हुई थी। तब कांग्रेस का दबदबा हुआ करता था। अन्य पार्टियां अपनी सियासी जमीन तैयार करने में जुटी थीं। इसके लिए जिला कार्यकारिणी का गठन, बूथ लेवल पर कार्यकर्ताओं की तैनाती की जा रही थी।
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लोकसभा व विधानसभा चुनाव में प्रचार-प्रसार रणनीति के साथ होता था। सर्वोदय सद्भावना संस्थान के अध्यक्ष ओमप्रकाश पांडेय बताते हैं कि तब सभी पार्टियों का एक ही कार्यालय हुआ करता था। मुख्यालय पर स्थित कार्यालय पर ही कार्यकर्ताओं की बैठक, पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की सभा और चुनावी रणनीति बनती थी। प्रचार- प्रसार के लिए अलग से कोई कार्यालय नहीं खुलता था।
चुनाव के एक महीने पहले कार्यकर्ताओं की एक बैठक कार्यालय पर होती थी और उसी दिन पदाधिकारियों एवं कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारी तय कर दी जाती। कार्यकर्ता गांव-गांव पैदल भ्रमण कर प्रचार-प्रसार करते, जबकि पदाधिकारी साइकिल व इक्के से माहौल भांपते। इसके बाद कार्यकर्ताओं से जानकारी लेते। 1952 से 1989 तक करीब-करीब चुनाव प्रचार का यही तरीका रहा।
1989 के बाद चुनाव प्रसार का तरीका बदलना शुरू हुआ। अब प्रत्याशियों ने जिला मुख्यालय के साथ हर विधानसभा क्षेत्र में अपने कार्यालय खोल लिए हैं। जहां प्रचार और जनसंपर्क के लिए प्रभारी भी तैनात किए गए हैं। इसके अलावा चुनाव प्रचार के लिए सोशल मीडिया का भी खूब इस्तेमाल किया जा रहा है। प्रत्याशियों की गतिविधियों को पल-पल अपडेट करने के साथ ही एक-दूसरे पर वार और पलटवार भी किया जा रहा है।
पहले प्रचार के लिए किराए पर ली जाती थीं साइकिलें
चुनाव का माहौल भांपने के लिए जिले से पदाधिकारियों की टोली निकलती थी। पूर्व विधायक बाबूलाल श्रीवास्तव के पुत्र डा. अविनाश श्रीवास्तव बताते हैं कि यह टोली साइकिल से भ्रमण करती थीं। साइकिल किराए पर ली जाती थी। शहर स्थित प्रकाश साइकिल स्टोर पर पार्टियों के पदाधिकारी संपर्क करते थे।
कांग्रेस ने सबसे पहले शुरू किया कार्यालय का विस्तार
कांग्रेस ने सबसे पहले कार्यालय का विस्तार करना शुरू किया। ओमप्रकाश पांडेय बताते हैं कि मुख्यालय के बाद दूसरा कार्यालय कांग्रेस पार्टी द्वारा लालगंज में स्थापित किया गया। 1989 के बाद कार्यालयों का विस्तार व प्रचार-प्रसार का तरीका बदला।