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प्रतापगढ़: उपली की माला पहनकर निकला दूल्हा
Fri, 22 Mar 2019 11:52 PM IST
विनोद सिंह
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, प्रतापगढ़
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, प्रतापगढ़
Published by: विनोद सिंह
Updated Fri, 22 Mar 2019 11:52 PM IST
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माला पहनकर सिंहासन पर बैठकर निकला दूल्हे
- फोटो : प्रतापगढ़
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शहर के चिलबिला बाजार में 64 साल से उपली (कंडा) की माला पहनकर सिंहासन पर बैठने वाले दूल्हे की आज भी झाडू से सफाई होती है। बुधवार की आधी रात तक बाजार में निकलने वाली यात्रा में शामिल लोग डीजे पर थिरकते रहे।
चिलबिला बाजार में 1955 से होली का अद्भुत स्वरूप देखने को मिल रहा है। नरसिंह भगवान के हाथों मरने वाले हिरणाकश्यप की होलिका दहन के पूर्व गाजे-बाजे के साथ बारात निकाली जाती है। जिसमें हिरणाकश्यप को दूल्हा बनाकर उपली की माला पहनाई जाती है और झाडू से पंखा किया जाता है।
चिलबिला बाजार के विभिन्न मार्गों से होते हुए यह यात्रा व्यापारियों के घर-घर जाती है, जहां लोग उनका गुझिया और ठंडई से स्वागत करते हैं। बुधवार की शाम परंपरा का निर्वहन करने के लिए राहुल को दूल्हा बनाया गया।
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डीजे पर थिरकते युवा आधी रात तक बाजार में झूमते रहे। बारात जिस व्यापारी के घर के सामने रुकती, लोग गुझिया और ठंडई से स्वागत करते। होलिका दहन स्थल पर पहुंचकर बारात समाप्त हुई। महिलाओं के आकर्षक का केंद्र दूल्हा था।
देर रात होलिका दहन के बाद ही डीजे का शोर थमा। समाजसेवी रोशनलाल उमरवैश्य ने बताया कि 1955 से प्रतिवर्ष इसी तरह बारात निकलती है। उन्होंने बताया कि पहले बारात का जोश और होता था।
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चिलबिला बाजार में 1955 से होली का अद्भुत स्वरूप देखने को मिल रहा है। नरसिंह भगवान के हाथों मरने वाले हिरणाकश्यप की होलिका दहन के पूर्व गाजे-बाजे के साथ बारात निकाली जाती है। जिसमें हिरणाकश्यप को दूल्हा बनाकर उपली की माला पहनाई जाती है और झाडू से पंखा किया जाता है।
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चिलबिला बाजार के विभिन्न मार्गों से होते हुए यह यात्रा व्यापारियों के घर-घर जाती है, जहां लोग उनका गुझिया और ठंडई से स्वागत करते हैं। बुधवार की शाम परंपरा का निर्वहन करने के लिए राहुल को दूल्हा बनाया गया।
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डीजे पर थिरकते युवा आधी रात तक बाजार में झूमते रहे। बारात जिस व्यापारी के घर के सामने रुकती, लोग गुझिया और ठंडई से स्वागत करते। होलिका दहन स्थल पर पहुंचकर बारात समाप्त हुई। महिलाओं के आकर्षक का केंद्र दूल्हा था।
देर रात होलिका दहन के बाद ही डीजे का शोर थमा। समाजसेवी रोशनलाल उमरवैश्य ने बताया कि 1955 से प्रतिवर्ष इसी तरह बारात निकलती है। उन्होंने बताया कि पहले बारात का जोश और होता था।