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आंवला उद्योग को चाहिए रेलवे का सपोर्ट
अमर उजाला ब्यूरो प्रतापगढ़
Updated Tue, 16 Feb 2016 11:35 PM IST
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जिले के आंवला उद्योग को बढ़ावा देने के लिए रेलवे ने सपोर्ट नहीं किया। माल ढुलाई भाड़े में छूट न मिलने और ट्रेनों के कम ठहराव ने यहां के आंवला किसानों और व्यापारियों की कमर तोड़ दी है। यही वजह है कि करीब एक दशक से व्यापारियों ने ट्रेनों से आंवले की बुकिंग बंद कर रखी है। अब वे अपना माल ट्रकों से बाहर भेजते हैं। इससे उनकी बचत हो रही है। रेल मंत्रालय अगर इनकी मदद का एलान करता है तो आंवला उद्योग एक फिर चमक उठेगा। व्यापारियों ने रेलमंत्री का ध्यान समस्याआें की ओर आकृष्ट कराया है।
बेल्हा का आंवला यानि अमृत फल मुंबई, हाथरस, पंजाब, कोलकाता और दक्षिण के प्रांतों में अपनी अलग ही पहचान बनाए हुए है। इन स्थानों पर आंवला प्रतापगढ़ और चिलबिला से भेजा जाता है। पहले आंवले की ढुलाई ट्रेनों से की जाती थी। इससे रेलवे को अच्छी-खासी आय होती थी। मगर रेलवे ने किसानों और व्यापारियों की सुविधाओं पर ध्यान नहीं दिया। माल की ढुलाई में भाड़े की वृद्धि और ट्रेनों का ठहराव कम होने से किसानों का नुकसान होने लगा। पंजाब मेल, मुंबई की ट्रेनों में लोडिंग पूरी नहीं हो पाती थी। तभी वह छूट जाती थीं। जिससे आंवला स्टेशन पर ही रह जाता था। बाद में उसे भेजने का कोई इंतजाम नहीं हो पाता था।
अगर किसी तरह से माल की लोडिंग हो भी जाती थी तो जहां उतरना होता था वहां भी ठहराव की समस्या के कारण उतर नहीं पाता था। ढुलाई भाड़ा में भी किसी तरह की छूट नहीं मिल रही थी। इस तरह की समस्याओं से जूझ रहे किसानों ने रेलवे की ओर से मुंह मोड़ लिया। यही वजह है कि कई साल से लोडिंग नहीं हो रही है। रेलवे तो चाहता है कि आंवले की ढुलाई उसके यहां से हो, मगर किसान सुविधा चाहते हैं। जो अभी तक रेलवे ने नहीं दी है। अब किसान दस चक्के वाले ट्रक से आंवला बाहर भेजने लगे हैं।
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बेल्हा का आंवला यानि अमृत फल मुंबई, हाथरस, पंजाब, कोलकाता और दक्षिण के प्रांतों में अपनी अलग ही पहचान बनाए हुए है। इन स्थानों पर आंवला प्रतापगढ़ और चिलबिला से भेजा जाता है। पहले आंवले की ढुलाई ट्रेनों से की जाती थी। इससे रेलवे को अच्छी-खासी आय होती थी। मगर रेलवे ने किसानों और व्यापारियों की सुविधाओं पर ध्यान नहीं दिया। माल की ढुलाई में भाड़े की वृद्धि और ट्रेनों का ठहराव कम होने से किसानों का नुकसान होने लगा। पंजाब मेल, मुंबई की ट्रेनों में लोडिंग पूरी नहीं हो पाती थी। तभी वह छूट जाती थीं। जिससे आंवला स्टेशन पर ही रह जाता था। बाद में उसे भेजने का कोई इंतजाम नहीं हो पाता था।
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अगर किसी तरह से माल की लोडिंग हो भी जाती थी तो जहां उतरना होता था वहां भी ठहराव की समस्या के कारण उतर नहीं पाता था। ढुलाई भाड़ा में भी किसी तरह की छूट नहीं मिल रही थी। इस तरह की समस्याओं से जूझ रहे किसानों ने रेलवे की ओर से मुंह मोड़ लिया। यही वजह है कि कई साल से लोडिंग नहीं हो रही है। रेलवे तो चाहता है कि आंवले की ढुलाई उसके यहां से हो, मगर किसान सुविधा चाहते हैं। जो अभी तक रेलवे ने नहीं दी है। अब किसान दस चक्के वाले ट्रक से आंवला बाहर भेजने लगे हैं।
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