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अब स्वदेशी रेशे से लिनेन का कपड़ा तैयार करेंगी मिलें
अमर उजाला ब्यूरो, प्रतापगढ़
Updated Sat, 21 Nov 2015 11:26 PM IST
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देश के किसानों और वस्त्र उद्योगों के लिए अच्छी खबर है। अब लिनेन का कपड़ा अपने ही देश में पैदा हुए रेशे से बन सकेगा। किसान फ्लैक्स फसल की खेती करके लिनेन नामक रेशे की पैदावार करेंगे। बाद में टेक्सटाइल मिलें इसे खरीदकर कपड़ा तैयार करेंगी। सब कुछ ठीक रहा तोे विदेश से महंगा रेशा आयात करने की जरूरत भी नहीं पड़ेगी। प्रतापगढ़ के सनई अनुसंधान केंद्र के वैज्ञानिकों की कई सालों की मेहनत के बाद यह संभव हो सका है। इसकी खेती यूपी, हिमाचल प्रदेश, मेघालय, जम्मू कश्मीर, सिक्किम, पश्चिम बंगाल में की जा सकती है।
रिसर्च सेंटर के प्रमुख वैज्ञानिक डॉ. मनोज कुमार त्रिपाठी की देखरेख में वैज्ञानिकों ने फ्लैक्स नामक फसल से रेशे की एक ऐसी प्रजाति खोज निकाली है जिससे लिनेन का कपड़ा तैयार किया जाएगा। यह देश की पहली प्रजाति है। वैज्ञानिकों ने इस प्रजाति का नाम टियरा ( जेआरएफ-2) रखा है। कृषि मंत्रालय ने टियरा प्रजाति को पेटेंट करवा दिया है। सरकार से अनुमति मिलने के बाद जिले के सनई अनुसंधान केंद के साथ ही देश के कई अन्य रिसर्च सेंटरों के फार्म हाउस पर इसकी खेती का काम शुरू कर दिया गया है।
वर्तमान में हमारा देश लिनिन के रेशे का आयात यूरोपीय देशों जैसे कनाडा, चीन, बेल्जियम, हालैंड एवं फ्रांस आदि देशों से करता है। अगर यह देश में ही तैयार हुआ तो कपड़े सस्ते हो सकते हैं। मालूम हो कि टियरा प्रजाति के रेशे का उत्पादन अगर सही ढंग से किया जाता है तो लगभग 15 क्विंटल प्रति हेक्टेअर रेशा प्राप्त किया जा सकता है। बाजार में इसकी कीमत करीब दो लाख रुपये है।
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यह चार महीने में तैयार होने वाली फसल है। अक्तूबर के अंतिम सप्ताह से नवंबर के प्रथम पखवारे तक का समय फ्लैक्स की बुवाई के लिए सबसे उपयुक्त है। फ्लैैक्स के पौधों से रेशा निकालने के लिए हाथ और यांत्रिक मशीनों का इस्तेमाल किया जाता है। डॉ.मनोज कुमार त्रिपाठी, प्रमुख वैज्ञानिक, प्रतापगढ़ सनई अनुसंधान केंद्र यह देश की पहली ऐसी प्रजाति है जिसके रेशे से लिनेन का कपड़ा तैयार होगा। टियरा नाम की इस प्रजाति को भारत सरकार ने हाल ही में पेटेंट कर दिया है। इस रेशे के उत्पादन के बाद देश की कपड़ा मिलों को विदेशों से लिनेन के लिए रेशा मंगाने की जरूरत नहीं पड़ेगी।
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रिसर्च सेंटर के प्रमुख वैज्ञानिक डॉ. मनोज कुमार त्रिपाठी की देखरेख में वैज्ञानिकों ने फ्लैक्स नामक फसल से रेशे की एक ऐसी प्रजाति खोज निकाली है जिससे लिनेन का कपड़ा तैयार किया जाएगा। यह देश की पहली प्रजाति है। वैज्ञानिकों ने इस प्रजाति का नाम टियरा ( जेआरएफ-2) रखा है। कृषि मंत्रालय ने टियरा प्रजाति को पेटेंट करवा दिया है। सरकार से अनुमति मिलने के बाद जिले के सनई अनुसंधान केंद के साथ ही देश के कई अन्य रिसर्च सेंटरों के फार्म हाउस पर इसकी खेती का काम शुरू कर दिया गया है।
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वर्तमान में हमारा देश लिनिन के रेशे का आयात यूरोपीय देशों जैसे कनाडा, चीन, बेल्जियम, हालैंड एवं फ्रांस आदि देशों से करता है। अगर यह देश में ही तैयार हुआ तो कपड़े सस्ते हो सकते हैं। मालूम हो कि टियरा प्रजाति के रेशे का उत्पादन अगर सही ढंग से किया जाता है तो लगभग 15 क्विंटल प्रति हेक्टेअर रेशा प्राप्त किया जा सकता है। बाजार में इसकी कीमत करीब दो लाख रुपये है।
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यह चार महीने में तैयार होने वाली फसल है। अक्तूबर के अंतिम सप्ताह से नवंबर के प्रथम पखवारे तक का समय फ्लैक्स की बुवाई के लिए सबसे उपयुक्त है। फ्लैैक्स के पौधों से रेशा निकालने के लिए हाथ और यांत्रिक मशीनों का इस्तेमाल किया जाता है। डॉ.मनोज कुमार त्रिपाठी, प्रमुख वैज्ञानिक, प्रतापगढ़ सनई अनुसंधान केंद्र यह देश की पहली ऐसी प्रजाति है जिसके रेशे से लिनेन का कपड़ा तैयार होगा। टियरा नाम की इस प्रजाति को भारत सरकार ने हाल ही में पेटेंट कर दिया है। इस रेशे के उत्पादन के बाद देश की कपड़ा मिलों को विदेशों से लिनेन के लिए रेशा मंगाने की जरूरत नहीं पड़ेगी।