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साढ़े तीन घंटे तक सीओ को खोज नहीं सकी थी खाकी
अमर उजाला ब्यूरो, प्रतापगढ़
Updated Thu, 17 Sep 2015 11:21 PM IST
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हथिगवां थाना क्षेत्र के बलीपुर गांव में हुई प्रधान की हत्या के बाद बवाल व फायरिंग की घटना में खाकी बुरी तरह फेल हुई थी। सबकुछ जानने के बाद भी अपने अफसर का शव उठाने की हिम्मत पुलिस अधिकारी नहीं जुटा पाए थे। इतना ही नहीं एएसपी के चार थानों की पुलिस के साथ आगे बढने की हिम्मत को भी मातहतों ने ही तोड़ दिया था। जिस पर पीएसी व अन्य थाने से फोर्स बुलानी पड़ी। हथिगवां थाना क्षेत्र के बलीपुर ग्राम प्रधान की हत्या हत्यारों ने साढ़े सात बजे कर दी थी। इसकी खबर पर हथिगवां एसओ के साथ ही सीओ कुंडा जियाउलहक, कोतवाल सर्वेश मिश्र, एसएसआई विनय कुमार सिंह समेत दर्जन भर सिपाही मौके पर पहुंचे। एसओ हथिगवां तो दूसरे रास्ते से पहुंचे और स्थिति भांप रास्ते में ही रुक गए थे, लेकिन हालात से अनजान सीओ सीधे घर के समीप पहुंच गए।
सीओ पर गोली चलते देख मातहतों ने मोर्चा संभालने के बजाय भागने का रास्ता अख्तियार किया। इतना ही नहीं सारी स्थिति भी चंद मिनटों में ही सभी की समझ में आ गई, लेकिन किसी ने अफसर की खोज में गांव में घुसने की हिम्मत नहीं जुटाई। मौके पर पहुंचे तत्कालीन तेजतर्रार एसओ अरविन्द सिंह, पंकज सिंह, निशिकान्त राय, कोतवाल सर्वेश मिश्र घटनास्थल से लगभग 800 मीटर दूर खड़े टार्च लगाते रहे। लगभग पांच दरोगा, 25 पुलिसकर्मी इतनी हिम्मत नहीं जुटा पाए कि वह अफसर का शव खोजने गांव की गली में घुस सकें। 10 बजे पहुंचे प्रभारी एसपी आशाराम यादव ने सिपाहियों संग सीओ की खोज में गांव का रुख किया तथा रोशनी के लिए गाड़ी चलाने को कहा। इस पर जीप चालक बोल पड़ा था कि हमें गाड़ी के शीशे नहीं फोड़वाने, गोली नहीं खानी। इतने में एक सिपाही बोला अरे साहब उनके पास इतनी कारतूस है कि दो घंटे गोलियां चलाएंगे। इस पर एएसपी की भी हिम्मत जवाब दे गई। पीछे हटकर उन्होंने अफसरों को सारी बात बताई और पीएसी की मांग की। 11 बजे के बाद पहुंची पीएसी व जेठवारा, संग्रामगढ़ समेत कई अन्य थानों की फोर्स के साथ बड़ी हिम्मत कर पुलिस अफसर आगे बढ़े तो कई सिपाही व चालक कदम पीछे खींचते रहे। मात्र दस मिनट की खोजबीन में ही सीओ का शव खड़ंजे पर मिला था। पुलिस फोर्स पहुंचने के बाद महज तीन-चार मिनट में गेहूं के खेत में छिपा सीओ का गनर इमरान एवं एसएसआई कुंडा विनय कुमार सिंह बाहर निकले थे।
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सीओ पर गोली चलते देख मातहतों ने मोर्चा संभालने के बजाय भागने का रास्ता अख्तियार किया। इतना ही नहीं सारी स्थिति भी चंद मिनटों में ही सभी की समझ में आ गई, लेकिन किसी ने अफसर की खोज में गांव में घुसने की हिम्मत नहीं जुटाई। मौके पर पहुंचे तत्कालीन तेजतर्रार एसओ अरविन्द सिंह, पंकज सिंह, निशिकान्त राय, कोतवाल सर्वेश मिश्र घटनास्थल से लगभग 800 मीटर दूर खड़े टार्च लगाते रहे। लगभग पांच दरोगा, 25 पुलिसकर्मी इतनी हिम्मत नहीं जुटा पाए कि वह अफसर का शव खोजने गांव की गली में घुस सकें। 10 बजे पहुंचे प्रभारी एसपी आशाराम यादव ने सिपाहियों संग सीओ की खोज में गांव का रुख किया तथा रोशनी के लिए गाड़ी चलाने को कहा। इस पर जीप चालक बोल पड़ा था कि हमें गाड़ी के शीशे नहीं फोड़वाने, गोली नहीं खानी। इतने में एक सिपाही बोला अरे साहब उनके पास इतनी कारतूस है कि दो घंटे गोलियां चलाएंगे। इस पर एएसपी की भी हिम्मत जवाब दे गई। पीछे हटकर उन्होंने अफसरों को सारी बात बताई और पीएसी की मांग की। 11 बजे के बाद पहुंची पीएसी व जेठवारा, संग्रामगढ़ समेत कई अन्य थानों की फोर्स के साथ बड़ी हिम्मत कर पुलिस अफसर आगे बढ़े तो कई सिपाही व चालक कदम पीछे खींचते रहे। मात्र दस मिनट की खोजबीन में ही सीओ का शव खड़ंजे पर मिला था। पुलिस फोर्स पहुंचने के बाद महज तीन-चार मिनट में गेहूं के खेत में छिपा सीओ का गनर इमरान एवं एसएसआई कुंडा विनय कुमार सिंह बाहर निकले थे।
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