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अस्पताल में सुविधाओं का अकाल
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अस्पतालों में सुविधाओं का अकाल, 82 लाख दबाकर बैठे रहे अफसर
सरकारी अस्पतालों में सुविधाएं न होने के कारण मरीज परेशान होते रहे और स्वास्थ्य विभाग 82 लाख रुपये दबाकर बैठा रहा। अस्पतालों में मरीजों की सुविधाओं के लिए कोई इंतजाम नहीं किया गया। जिला अस्पताल में पल्स मॉनीटर खराब पड़ा है तो सीएचसी में अल्ट्रासाउंड मशीनें सालभर से बंद पड़ी हैं। अब शासन ने मार्च तक 82 लाख रुपये खर्च करने के लिए स्वास्थ्य विभाग को आदेश दिया तो अफसर परेशान हो गए हैं। मंथन किया जा रहा है कि इस बजट को कहां खपाया जाए।
स्वास्थ्य विभाग को शासन की ओर से अस्पतालों की मरम्मत, समय-समय पर रंगाई-पुताई के साथ ही उपकरणों की खरीद समेत अन्य कार्यों के लिए हर साल करोड़ों रुपये का बजट मिलता है।इस बजट से खराब पड़ीं मशीनों की मरम्मत कराने और नए उपकरणों को खरीदने के साथ मरीजों की सहूलियत के लिए अन्य व्यवस्थाएं करनी होती हैं। स्वास्थ्य विभाग में बजट के 82 लाख रुपये अफसर अभी तक दबाकर बैठे थे। विभाग के सूत्रों का कहना है कि इसके अलावा 33 लाख रुपये और उपकरण खरीदने और अस्पतालों की मरम्मत के लिए शासन से मिले थे।वह भी डंप हैं।
विभाग यदि इस धनराशि का सही ढंग से उपयोग करता तो शायद एक साल तक जिले के लोगों को इलाज के लिए परेशान न होना पड़ता। प्रयागराज और लखनऊ का चक्कर भी नहीं काटना पड़ता। जिला अस्पताल में लाखों रुपये की लागत से डिजिटल एक्सरे मशीन लगाई गई है, मगर प्लेट के अभाव में मरीजों का कलर एक्सरे नहीं किया जाता है। चिकित्सक एक्सरे कराने के लिए प्राइवेट सेंटरों पर भेज देते हैं। पल्स मानीटर भी खराब पड़ा है। आईसीयू वार्ड में ताला लगा है। वार्डों की दशा ठीक नहीं है।
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वहीं महिला अस्पताल में मरीजों के आनलाइन इलाज की व्यवस्था शुरू नहीं हो सकी। सीएचसी में भी मरीजों का अल्ट्रासाउंड और डिजिटल एक्सरे नहीं हो रहा है। जिले के कुछ अस्पतालों को छोड़ दिया जाए तो ज्यादातर सीएचसी-पीएचसी की मरम्मत और रंगाई-पुताई के नाम पर मिले बजट को अफसर डकर गए। अब बजट खपाने के लिए शासन ने आदेश दिया है तो अफसरों के होश उड़ गए हैं। दिन-रात आफिस में बैठकर बजट किस-किस मद में कहां-कहां खर्च किया जाए, इसकी रूपरेखा तैयार कर रहे हैं। दरअसल विभाग के पास इतना बजट खपाने के लिए महज 31 दिन ही बचे हैं।
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सरकारी अस्पतालों में सुविधाएं न होने के कारण मरीज परेशान होते रहे और स्वास्थ्य विभाग 82 लाख रुपये दबाकर बैठा रहा। अस्पतालों में मरीजों की सुविधाओं के लिए कोई इंतजाम नहीं किया गया। जिला अस्पताल में पल्स मॉनीटर खराब पड़ा है तो सीएचसी में अल्ट्रासाउंड मशीनें सालभर से बंद पड़ी हैं। अब शासन ने मार्च तक 82 लाख रुपये खर्च करने के लिए स्वास्थ्य विभाग को आदेश दिया तो अफसर परेशान हो गए हैं। मंथन किया जा रहा है कि इस बजट को कहां खपाया जाए।
स्वास्थ्य विभाग को शासन की ओर से अस्पतालों की मरम्मत, समय-समय पर रंगाई-पुताई के साथ ही उपकरणों की खरीद समेत अन्य कार्यों के लिए हर साल करोड़ों रुपये का बजट मिलता है।इस बजट से खराब पड़ीं मशीनों की मरम्मत कराने और नए उपकरणों को खरीदने के साथ मरीजों की सहूलियत के लिए अन्य व्यवस्थाएं करनी होती हैं। स्वास्थ्य विभाग में बजट के 82 लाख रुपये अफसर अभी तक दबाकर बैठे थे। विभाग के सूत्रों का कहना है कि इसके अलावा 33 लाख रुपये और उपकरण खरीदने और अस्पतालों की मरम्मत के लिए शासन से मिले थे।वह भी डंप हैं।
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विभाग यदि इस धनराशि का सही ढंग से उपयोग करता तो शायद एक साल तक जिले के लोगों को इलाज के लिए परेशान न होना पड़ता। प्रयागराज और लखनऊ का चक्कर भी नहीं काटना पड़ता। जिला अस्पताल में लाखों रुपये की लागत से डिजिटल एक्सरे मशीन लगाई गई है, मगर प्लेट के अभाव में मरीजों का कलर एक्सरे नहीं किया जाता है। चिकित्सक एक्सरे कराने के लिए प्राइवेट सेंटरों पर भेज देते हैं। पल्स मानीटर भी खराब पड़ा है। आईसीयू वार्ड में ताला लगा है। वार्डों की दशा ठीक नहीं है।
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वहीं महिला अस्पताल में मरीजों के आनलाइन इलाज की व्यवस्था शुरू नहीं हो सकी। सीएचसी में भी मरीजों का अल्ट्रासाउंड और डिजिटल एक्सरे नहीं हो रहा है। जिले के कुछ अस्पतालों को छोड़ दिया जाए तो ज्यादातर सीएचसी-पीएचसी की मरम्मत और रंगाई-पुताई के नाम पर मिले बजट को अफसर डकर गए। अब बजट खपाने के लिए शासन ने आदेश दिया है तो अफसरों के होश उड़ गए हैं। दिन-रात आफिस में बैठकर बजट किस-किस मद में कहां-कहां खर्च किया जाए, इसकी रूपरेखा तैयार कर रहे हैं। दरअसल विभाग के पास इतना बजट खपाने के लिए महज 31 दिन ही बचे हैं।