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दावे धड़ाम, बढ़े दवाओं के दाम

Fri, 05 Jan 2018 11:43 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो प्रतापगढ़
अमर उजाला ब्यूरो प्रतापगढ़ Updated Fri, 05 Jan 2018 11:43 PM IST
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necessary medicines rate not came down
online medicine - फोटो : FILE PHOTO
जीएसटी लागू होने के बाद लोगों को उम्मीद थी कि जरूरी दवाओं के दाम घटेंगे और इसका लाभ मरीजों को मलेगा, मगर हुआ ठीक इसका उल्टा। एक्साइज ड्यूटी खत्म होने के बाद भी दवा की कीमतें घटने की बजाय पहले से ज्यादा बढ़ गई हैं। दवा कंपनियां मनमानी पर उतारू हैं। इतना ही नहीं दवाओं का मूल्य बढ़ाकर पहले से ज्यादा कीमत वसूल रहे हैं। होलसेलर खुद को मजबूर बता रहे हैं, रिटेलर केमिस्टों ने छूट देनी बंद कर दी है। 
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दवा कंपनियां पहले उत्पाद की कीमत ट्रेड मूल्य के साथ एक्साइज और टैक्स जोड़कर तय करती थीं। इसके बाद भी थोक विक्रेता वैट और अपना मुनाफा जोड़कर बिक्री करते थे। जीएसटी लागू होने के साथ ही एक्साइज ड्यूटी खत्म हो गई, लेकिन कंपनियों ने सीधे तौर पर मनमानी की और अधिकांश दवा पर एमआरपी बढ़ा दी। साथ ही थोक दवा विक्रेता को देने वाली कम से कम 10 और अधिक से अधिक 40 प्रतिशत छूट भी खत्म कर दी। इससे महंगाई की जद में जरूरी दवाएं भी आ गईं। जीएसटी लागू होने के शुरुआती तीन महीने तक तो स्टाक में रखीं दवाएं पूरी कीमत पर बेची गईं। जीएसटी में कई पेचीदगी थी और इसका लाभ दवा कंपनियों के साथ दवा विक्रेताओं ने भी उठाया है। पुराने स्टाक को खपाने के एवज में दवा कंपनियों ने थोक विक्रेताओं को क्रेडिट नोट देने का भी प्रलोभन दिया था। जब दवा की बिक्री तेज हुई और दवा कम होने लगी तो कंपनियां अपने वादे से मुकर गईं। कंपनियों के प्रतिनिधियों ने इसे कॉरपोरेट निर्णय बताते हुए कुछ बोलने से इनकार कर दिया। नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर बताया कि भारत और चीन का रिश्ता इन दिनों बहुत अच्छा नहीं है। इसलिए चीन से दवा में प्रयुक्त होने वाले रसायन अब दूसरे देशों से आयात किए जाने से दवा की कीमतों में इजाफा हुआ है। 
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वहीं पहले कंपनियां दवाओं के दाम ट्रेड + एक्साइज (8 से 15) फीसदी + टैक्स (4 फीसदी) जोड़कर तय करती थीं। जीएसटी लागू होने के बाद कंपनियों को टैक्स और दवा का मूल्य तय करना चाहिए था। लेकिन ऐसा नहीं किया गया। इससे जरूरी दवा के साथ आम दवाओं के दाम घटने की जगह और बढ़ गए।
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