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बेल्हा में बनी नील से चमकते थे कपड़े
अमर उजाला ब्यूरो प्रतापगढ़
Updated Mon, 04 Jul 2016 12:25 AM IST
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mudda belha ki virasat ka
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बेल्हा आज भले ही उद्योग शून्य हो गया हो, लेकिन एक जमाना था जब यहां तैयार होने वाली नील से मेमसाहबों के कपड़े चमकते थे। सन् 1930 में जिले के कई स्थानों पर अंग्रेज किसानों की जमीनों पर कब्जा कर उनसे नील की खेती करवाते थे। इसकी फसल को अंग्रेज अपने कारखाने में ले जाकर पिपरमेंट की माफिक उससे नील तैयार करने का काम करते थे। यहां की बनी नील गोरे लोगों की मेम साहबान अपने कपड़े चमकाने में इस्तेमाल करती थीं। सहोदरपुर पूर्वी और मोहनगंज इलाके में आज भी अंग्रेजों द्वारा स्थापित नील तैयार करने वाली फैक्ट्री के अवशेष मौजूद हैं। उस समय नील की खेती करने वाले किसानों के वंशज अब दूसरे कामों में व्यस्त हो गए हैं। किसानों के परिवार में एक, दो बुजुर्ग ही बचे हैं जो खेती के बारे में तो बताते हैं।
अब नगर पालिका का वार्ड बन चुका सहोदरपुर पूर्वी गुलामी के दौर में नील की खेती के लिए मशहूर था। लोग बताते हैं कि उस दौर में सहोदरपुर ग्रामसभा हुआ करती थी। इसकी न्याय पंचायत करनपुर थी। अगल-बगल के गांव जैसे जुड़ा का पुरवा और कीना का पुरवा भी इससे जुड़े थे। जब अंग्रेज यहां पर आए तो उन्होंने इस इलाके के किसानों के खेतों पर कब्जा कर लिया। करीब बीस से तीस बिस्वा खेत में अकेले नील की खेत करवाते थे। नील की फसल तैयार होने के बाद उसको सहोदरपुर में स्थापित फैक्ट्री में ले जाकर उससे नील तैयार करवाते थे। तैयार की गई नील को रखने के लिए भूमिगत कुएं और बड़े-बड़े ड्रम का इस्तेमाल किया जाता था। बाद में तैयार नील को इंग्लैंड और अन्य दूसरे मुल्कों में भेजा जाता था। इस नील के इस्तेमाल से अंग्रेज और उनके परिवार की महिलाएं और बच्चे कपड़े चमकाते थे। सहोदरपुर में रहने वाले भारत मौर्या की जमीन पर आज भी फैक्ट्री और कुएं के अवशेष मौजूद हैं।
मौर्या और यादव वंशज करते थे नील की खेत
प्रतापगढ़। गुलामी के दौर में सहोदरपुर में किसान रामप्रसाद मौर्या और माताफेर यादव के खेतों पर अंग्रेज कब्जा करके नील की खेती करवाते थे। रामप्रसाद के पौत्र भारत मौर्या घर के सामने नील बनाने वाली फैक्ट्री के खंडहरों की तरफ इशारा करते हुए बताते हैं कि उस दौर में इसी फैक्ट्री में नील तैयार हुआ करती थी। आज के दौर में जिस तरह से पिपरमेंट को तैयार किया जाता है। उस समय भी ठीक ऐसे ही नील तैयार की जाती थी। उनके बाबा और पड़ोस के माताफेर यादव के परिवार के लोग नील की खेती किया करते थे। अंग्रेजों द्वारा नील की फैक्ट्री करीब एक बिस्वा में स्थापित थी। नील की खेती और उसको बनाने का इल्म यहां पर आज किसी के पास नहीं है। माताफेर की पौत्र बहू कमला यादव बताती हैं कि जब वे ब्याहकर उस घर में आईं तो उस समय देश आजाद हो चुका था। उनके ससुर रामनाथ अक्सर नील की खेती का जिक्र किया करते थे। वे बताती हैं कि उस समय उनका और रामप्रसाद मौर्य का ही परिवार इस पूरे इलाके में नील की फसल उगाता था।
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नहीं जान सके नील बनाने का तरीका
वर्तमान में सहोदरपुर पूर्वी के रिटायर रेलकर्मचारी मलय सिंह बताते हैं कि गुलामी के दौर में यहां के किसानों की जमीनों पर गोरे लोग कब्जा कर नील की फसल तैयार करवाते थे। नील कैसे तैयार करते थे उसका तरीका किसानों को नहीं पता चल पाया। उनके बुजुर्ग बताते हैं कि इसके लिये अंग्रेज अपने लोगों को ही फैक्ट्री में रखते थे। ताकि उनकी विधि भारतीय किसान चुरा न लें। यही वजह है कि आजादी के बाद जब अंग्रेज यहां से जाने लगे तो उस फैक्ट्री को ही नष्ट कर दिए। पुष्पेंद्र प्रताप सिंह बताते हैं कि सहोदरपुर के अलावा मोहनगंज इलाके मेें कुछ स्थानों पर नील तैयार की जाती थी। जो नील तैयार होती थी उसका इस्तेमाल केवल अंग्रेज और उनके परिवार के सदस्यों के ही करने की इजाजत थी। ऐसा उनके वंशज बताते थे।
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अब नगर पालिका का वार्ड बन चुका सहोदरपुर पूर्वी गुलामी के दौर में नील की खेती के लिए मशहूर था। लोग बताते हैं कि उस दौर में सहोदरपुर ग्रामसभा हुआ करती थी। इसकी न्याय पंचायत करनपुर थी। अगल-बगल के गांव जैसे जुड़ा का पुरवा और कीना का पुरवा भी इससे जुड़े थे। जब अंग्रेज यहां पर आए तो उन्होंने इस इलाके के किसानों के खेतों पर कब्जा कर लिया। करीब बीस से तीस बिस्वा खेत में अकेले नील की खेत करवाते थे। नील की फसल तैयार होने के बाद उसको सहोदरपुर में स्थापित फैक्ट्री में ले जाकर उससे नील तैयार करवाते थे। तैयार की गई नील को रखने के लिए भूमिगत कुएं और बड़े-बड़े ड्रम का इस्तेमाल किया जाता था। बाद में तैयार नील को इंग्लैंड और अन्य दूसरे मुल्कों में भेजा जाता था। इस नील के इस्तेमाल से अंग्रेज और उनके परिवार की महिलाएं और बच्चे कपड़े चमकाते थे। सहोदरपुर में रहने वाले भारत मौर्या की जमीन पर आज भी फैक्ट्री और कुएं के अवशेष मौजूद हैं।
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मौर्या और यादव वंशज करते थे नील की खेत
प्रतापगढ़। गुलामी के दौर में सहोदरपुर में किसान रामप्रसाद मौर्या और माताफेर यादव के खेतों पर अंग्रेज कब्जा करके नील की खेती करवाते थे। रामप्रसाद के पौत्र भारत मौर्या घर के सामने नील बनाने वाली फैक्ट्री के खंडहरों की तरफ इशारा करते हुए बताते हैं कि उस दौर में इसी फैक्ट्री में नील तैयार हुआ करती थी। आज के दौर में जिस तरह से पिपरमेंट को तैयार किया जाता है। उस समय भी ठीक ऐसे ही नील तैयार की जाती थी। उनके बाबा और पड़ोस के माताफेर यादव के परिवार के लोग नील की खेती किया करते थे। अंग्रेजों द्वारा नील की फैक्ट्री करीब एक बिस्वा में स्थापित थी। नील की खेती और उसको बनाने का इल्म यहां पर आज किसी के पास नहीं है। माताफेर की पौत्र बहू कमला यादव बताती हैं कि जब वे ब्याहकर उस घर में आईं तो उस समय देश आजाद हो चुका था। उनके ससुर रामनाथ अक्सर नील की खेती का जिक्र किया करते थे। वे बताती हैं कि उस समय उनका और रामप्रसाद मौर्य का ही परिवार इस पूरे इलाके में नील की फसल उगाता था।
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नहीं जान सके नील बनाने का तरीका
वर्तमान में सहोदरपुर पूर्वी के रिटायर रेलकर्मचारी मलय सिंह बताते हैं कि गुलामी के दौर में यहां के किसानों की जमीनों पर गोरे लोग कब्जा कर नील की फसल तैयार करवाते थे। नील कैसे तैयार करते थे उसका तरीका किसानों को नहीं पता चल पाया। उनके बुजुर्ग बताते हैं कि इसके लिये अंग्रेज अपने लोगों को ही फैक्ट्री में रखते थे। ताकि उनकी विधि भारतीय किसान चुरा न लें। यही वजह है कि आजादी के बाद जब अंग्रेज यहां से जाने लगे तो उस फैक्ट्री को ही नष्ट कर दिए। पुष्पेंद्र प्रताप सिंह बताते हैं कि सहोदरपुर के अलावा मोहनगंज इलाके मेें कुछ स्थानों पर नील तैयार की जाती थी। जो नील तैयार होती थी उसका इस्तेमाल केवल अंग्रेज और उनके परिवार के सदस्यों के ही करने की इजाजत थी। ऐसा उनके वंशज बताते थे।