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वर्ल्डवार में उतरते थे युद्धक विमान पृथ्वीगंज हवाई अड्डा अब वीरान
अमर उजाला ब्यूरो प्रतापगढ़
Updated Fri, 01 Jul 2016 12:18 AM IST
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mudda belha ki virasat ka
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28 जुलाई 1914 से लेकर 11 नवंबर 1918 के पहले व 9 सितंबर 1939 से लेकर 1945 तक दूसरे विश्व युद्ध के दौरान अंग्रेजी हुकूमत ने पृथ्वीगंज में 544 बीघे में हवाई अड्डे का निर्माण कराया था। यहां से सेना का विमान सैनिकों को उनकी मंजिल पर पहुंचाने के साथ ही लाने का काम करता था। देश आजाद होने के बाद कभी वीआईपी बना यह इलाका मौजूदा समय में अपनी पहचान खोता जा रहा है। यदि हवाई अड्डे को उपयोग में लाने के लिए केंद्र व प्रदेश की सरकारों ने काम किया होता तो शायद हजारों बेरोजगारों को रोजी-रोटी मिल जाती।
शहर से 11 किमी दूर पृथ्वीगंज में नौ गांव के लोगों की 544 बीघे जमीन को अंग्रेजी हुकूमत ने कब्जे में ले लिया। कुछ ही वर्षों में यहां हवाई अड्डा बनकर तैयार हो गया। उस समय अंग्रेजी हुकूमत की सेनाएं शहर के रामलीला मैदान में रुकती थीं। जनपद अवध क्षेत्र के मध्य में स्थित था। यहां से चारों दिशाओं में सेना की टुकड़ी भेजने के संसाधन मौजूद थे। हवाई अड्डे को प्रथम व द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान उपयोग में लाया गया। यहां से सैनिकों को युद्ध में भेजा जाता था। चूंकि करीब ही पृथ्वीगंज हाल्ट स्टेशन भी मौजूद है। इसलिए वायु के साथ रेलमार्ग का भी उपयोग अंग्रेजी सेना करती थी। हवाईअड्डे के उपयोग में नौ गांवों की जमीन लाई गई।
राजस्व अभिलेखों के मुताबिक 543 बीघा 17 विस्वा 6 धूर में यह हवाई अड्डा है। राजस्व अभिलेखों में यह एयरोड्रम दर्ज है। इसमें घाटमपुर, राजापुर, औव्वार, पूरे हिरावन, नमकशायर, भुइदहा, भरोखन, खरहर, मकरी गांव की जमीनों को शामिल किया गया है। हवाईअड्डे का आजादी के बाद से अस्तित्व ही समाप्त होने लगा। सिगभनल लाइट हो या अन्य उपकरण। देखरेख के अभाव में नष्ट हो गए। मौजूदा समय में आधे से अधिक हवाईअड्डे की जमीन पर लोग खेती करते हैं। हवाईपट्टी पर गेहूं की मड़ाई के साथ ही गोबर के कंडे पाथे जाते हैं। भारी वाहनों के आवागमन के नाते अधिकांश स्थानों पर हवाई पट्टी गड्ढे में तब्दील हो चुकी है।
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दुश्मनों की निगाह से छिपा था सेना का हवाई अड्डा
प्रथम व द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान अवध प्रांत का मध्य इलाके को अंग्रेजी हुकूमत काफी सुरक्षित मानती थी। जानकारों की मानें तो दुश्मनों की निगाह से यह इलाका महफूज था। इलाके की हरियाली के चलते दुश्मनों को धोखा देने में अंग्रेजी हुकूमत दोनों विश्व युद्ध में काफी हद तक कामयाब भी रही।
युद्ध के लिए सात देशों के उतरते थे सैनिक
प्रथम व द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान युद्ध के लिए सात देशों के विमान से सैनिक भेजे जाते थे। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी सूर्यबली पांडेय के पुत्र ओमप्रकाश पांडेय की मानें तो सैनिक सेना के जहाज से उतारे जाते थे। आराम कर चुके सैनिकों को युद्ध पर भेजा जाता था। वहां से दूसरे सैनिकों को हवाई अड्डे पर लाया जाता। जिन्हें रामलीला मैदान में बने अस्थायी कालोनी में पहुंचाया जाता था। पृथ्वीगंज के आसपास रहने वालों के साथ ही विश्व युद्ध के दौरान जंगी जहाज को देखने के लिए जनपद के कोने-कोने से लोग आया करते थे।
हवाईपट्टी पर उतर चुके हैं पूर्व प्रधानमंत्री के उड़नखटोले
जनपद के पृथ्वीगंज हवाई अड्डे पर देश के पूर्व प्रधानमंत्री जनसभा करने के लिए अपना उड़नखटोला उतार चुके हैं। सबसे पहले 1962 में देश के प्रथम प्रधानमंत्री पं जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी, लाल बहादुर शास्त्री भी राजनैतिक समारोहों को संबोधित करने के लिए यहीं उतरे हैं। जबकि जयहिंद फौज के संस्थापक नेताजी सुभाषचंद्र बोस भी क्रांतिकारियों से मिलने के लिए इस हवाई अड्डे का प्रयोग कर चुके हैं। हवाईअड्डे के बगल औव्वार व नमकशायर के बड़ी संख्या में लोग आजाद हिंद फौज की सेना में शामिल थे। गांव के विवेक कुमार सिंह, हरिशरण सिंह, अखिलेश कुमार सिंह व शैलेंद्र प्रताप सिंह की मानें तो नमकशायर, औव्वार क्रांतिकारियों का गढ़ रहा है। वे देश की आजादी के लिए अपने प्राणों का बलिदान से देने से पीछे नहीं रहे। यहां रहकर चंद्रशेखर आजाद भी अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ विद्रोह का बिगुल बजाते रहते थे।
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शहर से 11 किमी दूर पृथ्वीगंज में नौ गांव के लोगों की 544 बीघे जमीन को अंग्रेजी हुकूमत ने कब्जे में ले लिया। कुछ ही वर्षों में यहां हवाई अड्डा बनकर तैयार हो गया। उस समय अंग्रेजी हुकूमत की सेनाएं शहर के रामलीला मैदान में रुकती थीं। जनपद अवध क्षेत्र के मध्य में स्थित था। यहां से चारों दिशाओं में सेना की टुकड़ी भेजने के संसाधन मौजूद थे। हवाई अड्डे को प्रथम व द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान उपयोग में लाया गया। यहां से सैनिकों को युद्ध में भेजा जाता था। चूंकि करीब ही पृथ्वीगंज हाल्ट स्टेशन भी मौजूद है। इसलिए वायु के साथ रेलमार्ग का भी उपयोग अंग्रेजी सेना करती थी। हवाईअड्डे के उपयोग में नौ गांवों की जमीन लाई गई।
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राजस्व अभिलेखों के मुताबिक 543 बीघा 17 विस्वा 6 धूर में यह हवाई अड्डा है। राजस्व अभिलेखों में यह एयरोड्रम दर्ज है। इसमें घाटमपुर, राजापुर, औव्वार, पूरे हिरावन, नमकशायर, भुइदहा, भरोखन, खरहर, मकरी गांव की जमीनों को शामिल किया गया है। हवाईअड्डे का आजादी के बाद से अस्तित्व ही समाप्त होने लगा। सिगभनल लाइट हो या अन्य उपकरण। देखरेख के अभाव में नष्ट हो गए। मौजूदा समय में आधे से अधिक हवाईअड्डे की जमीन पर लोग खेती करते हैं। हवाईपट्टी पर गेहूं की मड़ाई के साथ ही गोबर के कंडे पाथे जाते हैं। भारी वाहनों के आवागमन के नाते अधिकांश स्थानों पर हवाई पट्टी गड्ढे में तब्दील हो चुकी है।
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दुश्मनों की निगाह से छिपा था सेना का हवाई अड्डा
प्रथम व द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान अवध प्रांत का मध्य इलाके को अंग्रेजी हुकूमत काफी सुरक्षित मानती थी। जानकारों की मानें तो दुश्मनों की निगाह से यह इलाका महफूज था। इलाके की हरियाली के चलते दुश्मनों को धोखा देने में अंग्रेजी हुकूमत दोनों विश्व युद्ध में काफी हद तक कामयाब भी रही।
युद्ध के लिए सात देशों के उतरते थे सैनिक
प्रथम व द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान युद्ध के लिए सात देशों के विमान से सैनिक भेजे जाते थे। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी सूर्यबली पांडेय के पुत्र ओमप्रकाश पांडेय की मानें तो सैनिक सेना के जहाज से उतारे जाते थे। आराम कर चुके सैनिकों को युद्ध पर भेजा जाता था। वहां से दूसरे सैनिकों को हवाई अड्डे पर लाया जाता। जिन्हें रामलीला मैदान में बने अस्थायी कालोनी में पहुंचाया जाता था। पृथ्वीगंज के आसपास रहने वालों के साथ ही विश्व युद्ध के दौरान जंगी जहाज को देखने के लिए जनपद के कोने-कोने से लोग आया करते थे।
हवाईपट्टी पर उतर चुके हैं पूर्व प्रधानमंत्री के उड़नखटोले
जनपद के पृथ्वीगंज हवाई अड्डे पर देश के पूर्व प्रधानमंत्री जनसभा करने के लिए अपना उड़नखटोला उतार चुके हैं। सबसे पहले 1962 में देश के प्रथम प्रधानमंत्री पं जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी, लाल बहादुर शास्त्री भी राजनैतिक समारोहों को संबोधित करने के लिए यहीं उतरे हैं। जबकि जयहिंद फौज के संस्थापक नेताजी सुभाषचंद्र बोस भी क्रांतिकारियों से मिलने के लिए इस हवाई अड्डे का प्रयोग कर चुके हैं। हवाईअड्डे के बगल औव्वार व नमकशायर के बड़ी संख्या में लोग आजाद हिंद फौज की सेना में शामिल थे। गांव के विवेक कुमार सिंह, हरिशरण सिंह, अखिलेश कुमार सिंह व शैलेंद्र प्रताप सिंह की मानें तो नमकशायर, औव्वार क्रांतिकारियों का गढ़ रहा है। वे देश की आजादी के लिए अपने प्राणों का बलिदान से देने से पीछे नहीं रहे। यहां रहकर चंद्रशेखर आजाद भी अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ विद्रोह का बिगुल बजाते रहते थे।