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बचाइए अपने लाडलों को, चिड़चिड़ा बना रहे इंटरनेट गेम

Fri, 04 Aug 2017 11:48 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो, प्रतापगढ़
अमर उजाला ब्यूरो, प्रतापगढ़ Updated Fri, 04 Aug 2017 11:48 PM IST
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अगर आपका बच्चा इंटरनेट गेम के चक्कर में घंटों फोन, लैपटॉप या आईपैड से चिपका रहता है तो सावधान हो जाइए। घंटों इंटरनेट पर गेम खेलने वाले बच्चे चिड़चिड़े हो रहे हैं। इस लत के चलते उन्हें कम उम्र में ही अनिद्रा और सिरदर्द जैसी शिकायतें भी हो रही हैं। स्मार्टफोन से चिपके रहने के कारण न सिर्फ उनकी आंखों की रेटिना पर सीधा प्रभाव पड़ रहा है, बल्कि व्यवहार मेें भी बदलाव आ रहा है। बेल्हा में इस तरह के कई केस सामने आए हैं। डाक्टर इंटरनेट गेमिंग को इसका कारण बता रहे हैं। उनका कहना है कि कई बार बच्चे ग्राफिक्स के जरिए तैयार गेम की नकल करने की कोशिश करते हैं। यह कोशिश न सिर्फ उनकी तबीयत बल्कि जान पर भी भारी पड़ सकती है।
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इंटरनेट पर सैकड़ों ऐसे गेम उपलब्ध हैं जिनमें जोखिम भरे कारनामे ग्राफिक्स के जरिए दिखाए जाते हैं। ‘बैटमैन आर्केन’, ‘स्पाइडरमैन’, ‘फीफा-10’, ‘गियर्स ऑफ वार’, ‘मोर्टल कॉमबैट’, ‘हेला’, ‘स्पीड रेसिंग’, ‘रेसिंग हेरिजोन’ जैसे खेलों में एक बिल्डिंग से दूसरी बिल्डिंग पर कूदना, खतरनाक लड़ाई जैसी चीजें आम हैं। इन गेम में टॉस्क भी दिया जाता है। ग्राफिक्स के जरिए तैयार इन गेम के रियल स्टूमेंट बेहद खतरनाक हैं। बच्चे इन खेलों में दिखाए जाने वाले कारनामों को असल जिंदगी में भी कॉपी करने की कोशिश कर रहे हैं। जिससे उनकी जान भी जा सकती है। अभी हाल ही में मुंबई में ‘द ब्लू व्हेल’ गेम के जरिए नौवीं कक्षा में पढ़ने वाले 14 साल के किशोर ने सातवीं मंजिल से कूदकर जान दे दी थी। वरिष्ठ बाल रोग विशेषज्ञ डा. मोहित शुक्ला का कहना है कि उनके पास सौ से भी अधिक ऐसे मामले आए हैं जिनमें इंटरनेट गेमिंग के चक्कर में लगातार स्मार्टफोन और लैपटॉप से चिपके रहने के कारण बच्चों में चिड़िचिड़ेपन शिकायत मिली है। स्मार्टफोन, आईपैड और कंप्यूटर स्क्रीन की लाइट से उनकी आंखों की रेटिना पर सीधा असर पड़ रहा है। जिसके चलते उन्हें अनिद्रा और सिरदर्द जैसी दिक्कत हो रही है।
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धीरे-धीरे लगी लत, बदल रहा व्यवहार
इंटरनेट गेम में व्यस्त बच्चों का व्यहार भी तेजी से बदल रहा है। वो एंटी सोशल हो रहे हैं। लोगों के बीच रहना, खेलना-कूदना, व्यायाम जैसी आउटडोर एक्टिविटी से वे तेजी से कट रहे हैं। इन सब चीजों के बजाए उन्हें इंटरनेट गेम खेलना ज्यादा रास आ रहा है। चार से 15 साल के बच्चों को इंटरनेट गेम की लत धीरे-धीरे लगी और फिर हालात ऐसे होते गए कि अब उन्हें अगर गेम खेलने को न दिया जाए तो बेचैनी महसूस करते हैं। डाक्टर मोहित शुक्ला बताते हैं कि कई बार इंटरनेट पर गेम के दौरान पोर्न वीडियो भी आ जाते हैं। जिससे बच्चों के दिमाग पर बुरा असर पड़ रहा है।
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सोशल मीडिया ग्रुप पर भी गेम, दिए जाते हैं टॉस्क
कई खतरनाक गेम सोशल मीडिया ग्रुप पर भी चल रहे हैं। इसमें शुरुआत में जो टॉस्क मिलते हैं वो बहुत खतरनाक नहीं होते हैं। जैसे-जैसे गेम आगे बढ़ता है वैसे टॉस्क भी खतरनाक होता जाता है। कई बार ऊंची इमारत पर बिना सीढ़ी के चढ़ने-कूदने, हाथ की नसें काटने जैसे कारनामे भी होते हैं। इसका बच्चों पर गलत असर पड़ता है।


गलत पैरेंटिंग और सोसाइटी का बदला स्ट्रक्चर भी जिम्मेदार
इंटरनेट गेम के प्रति बच्चों में बढ़ती दीवानगी के लिए मां-बाप भी कम जिम्मेदार नहीं हैं। आजकल पैरेंट्स ही चार से पांच तक के बच्चों को काम करने के दौरान व्यस्त रखने के लिए स्मार्टफोन पकड़ा देते हैं। कई बार तो उन्हें मोबाइल गेम दिखाया भी जाता है। धीरे-धीरे बच्चे इसके लती हो जाते हैं। एमडीपीजी कालेज में मनोविज्ञान विभाग की विभागाध्यक्ष डा. निशा सिंह बताती हैं कि इसके लिए गलत पैरेंटिंग भी जिम्मेदार है। मां-बाप अपनी महात्वाकांक्षाओं को पूरा करने और काम में इतने व्यस्त हैं कि उन्हें बच्चों को बाहर खेलने के लिए ले जाने की फुर्सत नहीं है। बच्चे भी बाहर जाकर खेलने में खुद को असुरक्षित महसूस करने लगे हैं। कई बार कम उम्र के बच्चों को मोबाइल पर गेम खेलते देख वे अपने बच्चे को झाड़ भी लगाते हैं। ऐसे में उनके बच्चे भी तेजी से इंटरनेट गेम के प्रति आकर्षित होते हैं।
 
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