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इंटर हो गए पास, अब कहां जाएंगे बॉस
ब्यूरो/अमर उजाला प्रतापगढ़
Updated Sun, 17 May 2015 11:45 PM IST
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इंटर की परीक्षा पास खुशी से झूम रहे जिले के छात्र-छात्राओं के लिए आगे की राह आसान नहीं है। जिले में एक भी विश्वविद्यालय नहीं है। मेडिकल और तकनीकी शिक्षा का भी अभाव है। ऐसे में उनके सामने उच्च शिक्षा के लिए संकट खड़ा हो गया है। इसके लिए उन्हें बड़े शहरों की ओर भागना पड़ेगा।
जिले में मेडिकल और बेहतर शिक्षा देने वाले इंजीनियरिंग कॉलेजों का अकाल है। इस कमी का दंश जिले के मेधावियों को आगामी शिक्षा सत्र 2015-2016 में झेलना पड़ेगा। बीए, बीएससी, बीकॉम जैसी शिक्षा के लिए भी प्रवेश को लेकर अबकि यहां के महाविद्यालयों में मारामारी होगी। कारण यह है कि फैजाबाद विश्वविद्यालय ने जो नीति अपनाई है उससे इन कॉलेजों में सीटों का कम होना तय है।
बीटीसी, बीएड व विधि कॉलेजों को छोड़ दिया जाए तो परंपरागत शिक्षा देने वाले महाविद्यालयों की संख्या जिले में 76 के करीब बताई जाती है। पिछले शिक्षा सत्र में इनमें से अधिकांश महाविद्यालयों ने मानक व क्षमता से अधिक छात्र और छात्राओं का प्रवेश लिया था। इस तरह परंपरागत शिक्षा से पढ़ाई करने वाले लगभग 50 हजार विद्यार्थियों ने परीक्षा दी थी। शिक्षाविद् डॉ. सीएन पांडेय की मानें तो फैजाबाद विश्वविद्यालय ने महाविद्यालयों में नियमित व अनुमोदित शिक्षकों के अनुपात में ही इंटर पास छात्र व छात्राआें का प्रवेश लेने की नीति तैयार की है।
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नीति लागू करते हुए विश्वविद्यालय ने महाविद्यालयों से नियमित एवं अनुमोदित शिक्षकों के वेतन भुगतान सहित उनका सारा ब्योरा मांगा है। कहते हैं कि ज्यादातर महाविद्यालयों में अनुमोदित व नियमित शिक्षकों की काफी कमी है। ऐसे भी महाविद्यालय हैं जिनमें जिन शिक्षकों को अनुमोदित दिखाया गया है वह उनमें शिक्षण कार्य नहीं कर रहे। चाही गई रिपोर्ट से यह तय हो जाएगा कि कागज पर जिन शिक्षकों को अनुमोदित दिखाया गया है वह कार्यरत हैं अथवा नहीं। ऐसे में महाविद्यालयों की प्रवेश क्षमता स्वत: कम हो जाएगी। विश्व विद्यालय की नीति अमल में आने के बाद अबकि बार महाविद्यालयों की प्रवेश क्षमता घट कर 40 हजार के अंदर सिमट जाएगी। ऐसी स्थिति बनी तो परंपरागत शिक्षा के लिए भी यहां के महाविद्यालयों में दाखिला लेने में छात्र व छात्राओं को लोहे का चना चबाना पड़ेगा। यदि ऐसा हुआ तो परंपरागत शिक्षा के लिए भी जिले के छात्र व छात्राओं को बाहर का रास्ता देखने की मजबूरी बन जाएगी।
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जिले में मेडिकल और बेहतर शिक्षा देने वाले इंजीनियरिंग कॉलेजों का अकाल है। इस कमी का दंश जिले के मेधावियों को आगामी शिक्षा सत्र 2015-2016 में झेलना पड़ेगा। बीए, बीएससी, बीकॉम जैसी शिक्षा के लिए भी प्रवेश को लेकर अबकि यहां के महाविद्यालयों में मारामारी होगी। कारण यह है कि फैजाबाद विश्वविद्यालय ने जो नीति अपनाई है उससे इन कॉलेजों में सीटों का कम होना तय है।
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बीटीसी, बीएड व विधि कॉलेजों को छोड़ दिया जाए तो परंपरागत शिक्षा देने वाले महाविद्यालयों की संख्या जिले में 76 के करीब बताई जाती है। पिछले शिक्षा सत्र में इनमें से अधिकांश महाविद्यालयों ने मानक व क्षमता से अधिक छात्र और छात्राओं का प्रवेश लिया था। इस तरह परंपरागत शिक्षा से पढ़ाई करने वाले लगभग 50 हजार विद्यार्थियों ने परीक्षा दी थी। शिक्षाविद् डॉ. सीएन पांडेय की मानें तो फैजाबाद विश्वविद्यालय ने महाविद्यालयों में नियमित व अनुमोदित शिक्षकों के अनुपात में ही इंटर पास छात्र व छात्राआें का प्रवेश लेने की नीति तैयार की है।
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नीति लागू करते हुए विश्वविद्यालय ने महाविद्यालयों से नियमित एवं अनुमोदित शिक्षकों के वेतन भुगतान सहित उनका सारा ब्योरा मांगा है। कहते हैं कि ज्यादातर महाविद्यालयों में अनुमोदित व नियमित शिक्षकों की काफी कमी है। ऐसे भी महाविद्यालय हैं जिनमें जिन शिक्षकों को अनुमोदित दिखाया गया है वह उनमें शिक्षण कार्य नहीं कर रहे। चाही गई रिपोर्ट से यह तय हो जाएगा कि कागज पर जिन शिक्षकों को अनुमोदित दिखाया गया है वह कार्यरत हैं अथवा नहीं। ऐसे में महाविद्यालयों की प्रवेश क्षमता स्वत: कम हो जाएगी। विश्व विद्यालय की नीति अमल में आने के बाद अबकि बार महाविद्यालयों की प्रवेश क्षमता घट कर 40 हजार के अंदर सिमट जाएगी। ऐसी स्थिति बनी तो परंपरागत शिक्षा के लिए भी यहां के महाविद्यालयों में दाखिला लेने में छात्र व छात्राओं को लोहे का चना चबाना पड़ेगा। यदि ऐसा हुआ तो परंपरागत शिक्षा के लिए भी जिले के छात्र व छात्राओं को बाहर का रास्ता देखने की मजबूरी बन जाएगी।