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हाईकोर्ट : वन विभाग के आकस्मिक श्रमिकों को मिलेंगे 18 हजार रुपये प्रतिमाह

Thu, 14 Sep 2023 12:11 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रतापगढ़
अमर उजाला नेटवर्क, प्रतापगढ़ Published by: विनोद सिंह Updated Thu, 14 Sep 2023 12:11 PM IST
सार

कहा गया कि आकस्मिक श्रमिकों से निरंतर कार्य न लिया जाए ताकि भविष्य में वे नियमितीकरण की मांग न कर सकें। आकस्मिक श्रमिकों को कार्य का पारिश्रमिक दिया जाता है। न्यूनतम वेतनमान भत्ते अनुमन्य करना शासकीय नीति के खिलाफ है।

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High Court: Casual workers of Forest Department will get Rs 18 thousand per month
(सांकेतिक तस्वीर) - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

इलाहाबाद हाईकोर्ट में अपर महाधिवक्ता अशोक मेहता ने कहा कि राज्य सरकार ने प्रदेश के वन विभाग में कार्यरत उन सभी आकस्मिक श्रमिकों को 18 हजार रुपये प्रतिमाह वेतनमान देने का नीतिगत फैसला लिया है, जो छठे वेतन आयोग के तहत सात हजार रुपये न्यूनतम वेतनमान पा रहे हैं। इस पर न्यायमूर्ति अश्वनी कुमार मिश्र ने कोई आदेश न देकर याचिका उचित कोर्ट में पेश करने का आदेश दिया, जिस पर अगली सुनवाई 26 सितंबर को होगी।

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अब तक छठे वेतन आयोग के तहत जिन श्रमिकों को सात हजार रुपये न्यूनतम वेतनमान मिल रहा है, पुनरीक्षित कर उन्हें अब 18 हजार रुपये प्रतिमाह न्यूनतम वेतनमान मिलने का रास्ता साफ हो गया है। इस आदेश के तीसरे दिन अनुसचिव दिनेश कुमार सिंह ने 28 अगस्त 23 को सभी प्रमुख वन संरक्षकों व विभागाध्यक्षों को आदेश दिया कि यदि वन विभाग के आकस्मिक श्रमिकों को न्यूनतम वेतनमान दिया गया तो यह राज्य पर विधिक बाध्यता होगी और दूसरे विभाग भी ऐसी ही मांग करेंगे।

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कहा गया कि आकस्मिक श्रमिकों से निरंतर कार्य न लिया जाए ताकि भविष्य में वे नियमितीकरण की मांग न कर सकें। आकस्मिक श्रमिकों को कार्य का पारिश्रमिक दिया जाता है। न्यूनतम वेतनमान भत्ते अनुमन्य करना शासकीय नीति के खिलाफ है। यह भी कि यदि किसी अधिकारी ने आकस्मिक श्रमिकों से निरंतर कार्य लिया तो उसके विरुद्ध कार्रवाई होगी।

यह आदेश अलीगढ़ में वन विभाग में कार्यरत इशाक मोहम्मद की याचिका पर दिया गया। याची के अधिवक्ताओं अर्चना श्रीवास्तव, पंकज श्रीवास्तव का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट ने सभा शंकर दूबे केस में वर्ष 2018 में छठा वेतन आयोग का लाभ पा रहे सभी श्रमिकों को प्रतिमाह 18 हजार रुपये वेतनमान देने का निर्देश दिया है। इसका पालन नहीं किया जा रहा है। कोर्ट ने कहा, अपर महाधिवक्ता के बयान के बाद किसी आदेश की आवश्यकता नहीं है। यदि कुछ है भी तो सक्षम अदालत सुनेगी।

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