एक्सक्लूसिव: भाजपा की हुई कांग्रेस की 'राजकुमारी', रत्ना सिंह ने छोड़ा 'हाथ', अब कमल के साथ
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कालाकांकर राजघराने के राजा और पूर्व विदेश मंत्री स्वर्गीय दिनेश सिंह के निधन के बाद कांग्रेस में उनकी विरासत संभालने वाली जिले की पूर्व सांसद रत्ना सिंह ने 27 साल बाद हाथ के पंजे का साथ छोड़ दिया।
कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल होने से अब राजनैतिक मंचों पर कांग्रेस के दिग्गज नेता प्रमोद तिवारी के साथ रत्ना सिंह की जुगलबंदी देखने को नहीं मिलेगी। 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान भी रत्ना सिंह के भाजपा में शामिल होने की अटकलें तेज थीं, लेकिन अंत में उन्होंने कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ा था। मोदी लहर का एहसास होने पर उन्होंने पूरे चुनाव में वह तेजी नहीं दिखाई जो पहले के चुनावों के दौरान नजर आती थी।
पूर्व विदेशमंत्री स्व. राजा दिनेश सिंह की विरासत संभालने वाली रत्ना सिंह ने 1992 में राजनीति में कदम रखा। चार साल तक राजनीति का ककहरा पढ़ने वाली रत्ना सिंह को कांग्रेस के वरिष्ठ नेता प्रमोद तिवारी का साथ मिला और 1996 में पहली बार कांग्रेस से टिकट मिलते ही जिले में हाथ को मजबूती के साथ पहचान मिली।
सात बार सांसद का चुनाव लड़ने वाली रत्ना सिंह एक ही सीट से तीन बार लोकसभा का सदस्य चुनी गईं, जबकि चार बार उन्हें हार का सामना करना पड़ा। 27 साल के राजनीतिक सफर में मंचों पर प्रमोद तिवारी और रत्ना सिंह की जुगलबंदी हमेशा देखने को मिली। रत्ना सिंह जिले में होने वाले प्रमुख आयोजनों में प्रमोद तिवारी के साथ ही नजर आती थीं।
एक बार चुनाव जीतने और एक बार हारने का क्रम बनाने वाली रत्ना सिंह के वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान ही भाजपा में जाने की चर्चा तेज हो गई थी, लेकिन उन्होंने एक बार फिर कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ा। इस चुनाव में करारी हार के बाद रत्ना कांग्रेस के कार्यक्रमों से दूरी बनाने लगी थीं।
कांग्रेस के खिलाफ कुछ नहीं बोलीं
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की जनसभा में रत्ना सिंह ने भाजपा की सदस्यता भले ही ग्रहण कर ली, मगर उन्होंने अपने संबोधन में कांग्रेस के खिलाफ एक भी शब्द नहीं कहा। उन्होंने कहा कि पूरा देश मोदी के साथ है।
मोदी और कालाकांकर राजघराने को राष्ट्रभक्त बताते हुए भाजपा में आस्था प्रकट करने की बात कही, मगर उन्होंने कांग्रेस पार्टी और उसके नेताओं के खिलाफ कोई भी टिप्पणी नहीं की।
राजा दिनेश सिंह ने भी 1980 में छोड़ दी थी कांग्रेस
पूर्व विदेश मंत्री राजा दिनेश सिंह ने भी 1980 में कांग्रेस पार्टी छोड़कर जनता दल से चुनाव लड़ा था, मगर बेल्हा की जनता ने उनके इस फैसले को नकार दिया। जनता की नाराजगी का खामियाजा यह रहा कि राजा अजीत प्रताप सिंह जिले के सांसद बने और दिनेश सिंह को तीसरा स्थान मिला। हालांकि उनके चुनाव हारने पर तत्कालीन प्रधानमंत्री चंद्रशेखर सिंह ने उन्हें राज्यसभा का सदस्य नामित किया।
1980 में जनता दल के टिकट पर जिले से चुनाव लड़ने वाले राजा दिनेश सिंह को करारी हार का सामना करना पड़ा था। कांग्रेस से चुनाव मैदान में कूदे राजा अजीत प्रताप सिंह ने जीत दर्ज की थी, जबकि राजा दिनेश सिंह को तीसरा स्थान मिला था। हालांकि तत्कालीन प्रधानमंत्री चंद्रशेखर सिंह ने राजा दिनेश सिंह को राज्यसभा सदस्य नामित किया था।
अधिक दिनों तक वह जनता दल में नहीं रह सके। 1984 में होने वाले लोकसभा चुनाव में वह पुन: कांग्रेस में आ गए और चुनाव में जिले के मतदाताओं ने भारी मतों से जिताकर उन्हें संसद भेजा।