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जून के बाद अगस्त भी निकला ‘बेईमान’, संकट में किसान

Sat, 19 Aug 2017 11:29 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो, प्रतापगढ़
अमर उजाला ब्यूरो, प्रतापगढ़ Updated Sat, 19 Aug 2017 11:29 PM IST
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farmers in problem due to less rain
आलू की खुदाई करते किसान - फोटो : अमर उजाला
जिले में दो वर्षों बाद इस बार फिर औसत से कम बारिश हुई है। जून में 101 तो अगस्त में 80.8 मिमी बरसात हुई। केवल जुलाई में 302.7 मिमी बरसात हुई। कम वर्षा से किसानों पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं। उन्हें धान की पैदावार कम होने की चिंता सता रही है। मौसम वैज्ञानिक आगे भी बारिश न के बराबर होने की संभावना जता रहे हैं। हर दिन बादल तो दिख रहे हैं, लेकिन बारिश नहीं हो रही। करीब एक पखवारे से बादलाें के दगा देने के कारण किसानों की उम्मीद टूटती जा रही है।
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धान की उपयुक्त पैदावार के लिए जिले में 20 अगस्त तक करीब 650 मिमी की बारिश औसत मानी जाती है। इस साल मानसून ने जिले में देरी से दस्तक दी। दो-तीन बार की जोरदार बारिश में ऐसा लगा कि सूखे की आशंकाएं बेकार साबित होंगी। जिले के अधिकांश किसान धान की पैदावार के लिए बारिश के पानी पर ही निर्भर रहते हैं। जहां नहरें हैं वहां समय से पानी नहीं मिलता। संडवाचंद्रिका, कोहंडौर, सदर, पट्टी के अधिकांश भूभाग में तो सिर्फ बारिश का ही पानी सहारा होता है। जिन लोगाें ने पंपिंगसेट या सबमर्सिबल पंप लगाया है, उनकी भी खेती बिना बारिश के पानी के चौपट हो जाती है। करीब एक पखवारे से बादलों ने पूरी तरह से दगा दे दिया है। जिन लोगों ने पंपिंगसेट या सबमर्सिबल पंप से रोपाई कर दी थी, उनके खेतों में पानी के अभाव में धान के पौधों की वृद्धि रुक गई। ऊंची जमीन में तो पौधे सूखने भी लगे हैं। बादलों के घुमड़कर चले जाने के कारण किसानों की उम्मीद टूटती जा रही है। सनई अनुसंधान केंद्र के मौसमविद् देशराज मीना ने बताया कि इस साल औसत से बहुत कम बारिश हुई है। जून माह में 101 मिमी तो जुलाई में 302.7 और अगस्त में 80.8 मिलीमीटर ही बरसात हुई। पिछले साल तो औसत से अधिक 846 मिमी पानी बरसा था। इस बीच एक पखवारे से आसमान में घुमड़ने वाले बादल बारिश वाले नहीं थे। अभी दो-चार दिन में बारिश होने की उम्मीद भी कम है।
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औसत से कम बरसात होने के कारण धान की पैदावार कम हो जाएगी। बरसात के कारण धान की लंबाई बढ़ती है और फसल में रोग नहीं लगते। बारिश के कारण धान की पैदावार भी बेहतर होती है। बरसात न होने के कारण पंपिगसेट और सबमर्सिबल पंप से भले ही धान की फसल को बचाने के लिए किसान पसीना बहाते रहे, लेकिन पैदावार पर असर पड़ना तय है।
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जिले में बड़े पैमाने पर धान की खेती की गई है। कुल 100928 हेक्टेअर में धान की रोपाई हुई है। बारिश न होने के कारण जिले में इस बार पैदावार पर काफी असर पड़ सकता है। जिसके चलते छोटे-बड़े सभी किसान प्रभावित हो सकते हैं।

 
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