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सत्र शुरू होते ही निजी स्कूलों में मच गई लूट
अमर उजाला ब्यूरो, प्रतापगढ़
Updated Fri, 07 Apr 2017 11:50 PM IST
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डेमो पिक
जिले के कान्वेंट स्कूल पूरी तरह मनमानी पर उतर आए हैं। मनमाने ढंग से फीस निर्धारित करने वाले निजी स्कूल संचालकों ने नया सत्र प्रारंभ होते ही ड्रेस, जूता, मोजा के साथ ही किताबें और पाठ्यक्रम भी बदल दिया है। क्वालिटी एजुकेशन के नाम पर अभिभावकों को लूटा जा रहा है।
स्कूल संचालकों ने कहीं कापी-किताबों और ड्रेस के लिए दुकानों से सेटिंग कर रखी है तो कहीं खुद स्कूल से बांट रहे हैं। फीस बढ़ाकर तो जेब भरी ही जा रही है, कापी-किताब और ड्रेस से भी मोटी कमाई की जा रही है। इन स्कूल संचालकों पर जिला प्रशासन का किसी तरह का कोई अंकुश नहीं है।
शहर के निजी और कॉन्वेंट स्कूलों में अच्छी शिक्षा और व्यवस्था का लालीपॉप देकर अभिभावकों को ठगा जा रहा है। फीस निर्धारण में मनमानी करने वाले स्कूल संचालकों ने चालू शिक्षासत्र में 20-30 प्रतिशत फीस में इजाफा कर दिया है। जनरेटर के नाम पर प्रतिमाह फीस वसूलने वाले अधिकांश स्कूलों में बिजली गुल होने के बाद बच्चे गर्मी से बिलबिलाते रहते हैं। शहर के अधिकांश कान्वेंट स्कूल ऐसे हैं, जिनमें प्रतिवर्ष नए पाठ्यक्रम की पुस्तकें लागू कर दी जाती हैं, और वह भी एक निश्चित दुकान से खरीदने को मजबूर किया जाता है। महंगी पुस्तकों को बदलने और ड्रेस चेंज करने के पीछे और कुछ नहीं बल्कि अभिभावकों का आर्थिक शोषण करना लक्ष्य होता है।
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वास्तव में निजी स्कूलों पर किसी का अंकुश नहीं रह गया है। पिछले वर्षों में फीस बढ़ोतरी को लेकर अभिभावकों का दबाव भी कम हो गया है। बीएसए कार्यालय से इन स्कूलों को अंग्रेजी विषय की मान्यता तो दी जाती है, मगर उनका नियंत्रण इन पर नहीं होता है। अधिकांश स्कूल ऐसे हैं जिन्होंने सीबीएसई से मान्यता ले रखी है। जिले में इस बोर्ड के अफसरों के नहीं बैठने से पठन-पाठन और परीक्षा में भी भारी अनियमितता बरती जा रही है।
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स्कूल संचालकों ने कहीं कापी-किताबों और ड्रेस के लिए दुकानों से सेटिंग कर रखी है तो कहीं खुद स्कूल से बांट रहे हैं। फीस बढ़ाकर तो जेब भरी ही जा रही है, कापी-किताब और ड्रेस से भी मोटी कमाई की जा रही है। इन स्कूल संचालकों पर जिला प्रशासन का किसी तरह का कोई अंकुश नहीं है।
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शहर के निजी और कॉन्वेंट स्कूलों में अच्छी शिक्षा और व्यवस्था का लालीपॉप देकर अभिभावकों को ठगा जा रहा है। फीस निर्धारण में मनमानी करने वाले स्कूल संचालकों ने चालू शिक्षासत्र में 20-30 प्रतिशत फीस में इजाफा कर दिया है। जनरेटर के नाम पर प्रतिमाह फीस वसूलने वाले अधिकांश स्कूलों में बिजली गुल होने के बाद बच्चे गर्मी से बिलबिलाते रहते हैं। शहर के अधिकांश कान्वेंट स्कूल ऐसे हैं, जिनमें प्रतिवर्ष नए पाठ्यक्रम की पुस्तकें लागू कर दी जाती हैं, और वह भी एक निश्चित दुकान से खरीदने को मजबूर किया जाता है। महंगी पुस्तकों को बदलने और ड्रेस चेंज करने के पीछे और कुछ नहीं बल्कि अभिभावकों का आर्थिक शोषण करना लक्ष्य होता है।
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वास्तव में निजी स्कूलों पर किसी का अंकुश नहीं रह गया है। पिछले वर्षों में फीस बढ़ोतरी को लेकर अभिभावकों का दबाव भी कम हो गया है। बीएसए कार्यालय से इन स्कूलों को अंग्रेजी विषय की मान्यता तो दी जाती है, मगर उनका नियंत्रण इन पर नहीं होता है। अधिकांश स्कूल ऐसे हैं जिन्होंने सीबीएसई से मान्यता ले रखी है। जिले में इस बोर्ड के अफसरों के नहीं बैठने से पठन-पाठन और परीक्षा में भी भारी अनियमितता बरती जा रही है।