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अभी भी बेटियों से अधिक है बेटों से प्रेम
अमर उजाला ब्यूरो, प्रतापगढ़
Updated Sat, 05 Sep 2015 11:12 PM IST
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शासन और समाजसेवी संगठनों द्वारा बेटियों को बचाने के लिए चलाए जा रहे प्रयास का कोई खास असर नहीं दिख रहा है। तमाम जागरूकता कार्यक्रमों के बाद भी बेटियों को लेकर लोगों की सोच नहीं बदली है। आज भी लोग उन्हें बोझ ही मानते हैं। फतनपुर थाना क्षेत्र के पटहिटया कला में हुई हृदय विदारक घटना ने इसे साबित कर दिया है।
जिले में आए दिन नवजात बच्चों का शव शहर से लेकर ग्रामीण अंचलों मेें सूनसान स्थलों पर फेंका हुआ मिलता है। इनमें अधिकांश बेटियां रहती हैं। जो जन्म होने के कुछ घंटे बाद ही जंगल, खेत व सरपत के झुरमुटों में फेंक दी जाती हैं। इन बेटियों को जन्म देने वाली मां ही उनकी कातिल होती है। फतनपुर थाना क्षेत्र के पटहटिया कला में शनिवार को लक्ष्मी की करतूत ने अब यह सोचने पर लोगों को मजबूर कर दिया है कि बेटियों को जन्म देने के बाद उनका कत्ल उनके परिवार के लोग ही कर देते हैं और समाज की नजरों से बचने के लिए दूर शव को फेंक देते हैं ताकि कोई उनकी गंदी करतूत को जान न सके। अभी भी लोगों के भीतर बेटों की अधिक चाहत दिखती है। बेटों की ललक में जन्म देने वाली मां ही अपनी बेटियों का कत्ल करने पर उतारू हैं। सबसे खास पहलू यह है कि बेटों और बेटियों में भेदभाव रोकने और लोगों में पैठ बना चुकी भ्रांतियों को दूर करने के लिए समाजसेवी संगठनों के साथ मिलकर सरकार काफी प्रयास कर रही है। लेकिन उसकी मुहिम को झटका लगता दिख रहा है।
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जिले में आए दिन नवजात बच्चों का शव शहर से लेकर ग्रामीण अंचलों मेें सूनसान स्थलों पर फेंका हुआ मिलता है। इनमें अधिकांश बेटियां रहती हैं। जो जन्म होने के कुछ घंटे बाद ही जंगल, खेत व सरपत के झुरमुटों में फेंक दी जाती हैं। इन बेटियों को जन्म देने वाली मां ही उनकी कातिल होती है। फतनपुर थाना क्षेत्र के पटहटिया कला में शनिवार को लक्ष्मी की करतूत ने अब यह सोचने पर लोगों को मजबूर कर दिया है कि बेटियों को जन्म देने के बाद उनका कत्ल उनके परिवार के लोग ही कर देते हैं और समाज की नजरों से बचने के लिए दूर शव को फेंक देते हैं ताकि कोई उनकी गंदी करतूत को जान न सके। अभी भी लोगों के भीतर बेटों की अधिक चाहत दिखती है। बेटों की ललक में जन्म देने वाली मां ही अपनी बेटियों का कत्ल करने पर उतारू हैं। सबसे खास पहलू यह है कि बेटों और बेटियों में भेदभाव रोकने और लोगों में पैठ बना चुकी भ्रांतियों को दूर करने के लिए समाजसेवी संगठनों के साथ मिलकर सरकार काफी प्रयास कर रही है। लेकिन उसकी मुहिम को झटका लगता दिख रहा है।
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