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ग्रामीणों के हाथ से नहीं छूट रहा सुबह-शाम का ‘लोटा’
ब्यूरो।अमर उजाला प्रतापगढ़
Updated Fri, 22 May 2015 12:16 AM IST
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गांवों में शौचालय निर्माण पर करोड़ों रुपया भले खर्च हो रहा हो पर स्वच्छ भारत अभियान (ग्रामीण) के तहत जन जागरूकता का कार्य यहां न के बराबर है। गांवों में जागरूकता मेला, गोष्ठियां व नाट्य जैसे कार्यक्रम अब तक नहीं शुरू हो सका। जिससे केन्द्र सरकार की मंशा का जिले में दम घुट रहा। जबकि जागरूकता कार्यक्रमों को लेकर हर साल कार्ययोजना बनती है।
स्वच्छ भारत अभियान (ग्रामीण) के तहत वित्त वर्ष 2014-2015 में सात हजार 798 शौचालय निर्माण का लक्ष्य था। जिसमें दो हजार 333 शौचालय गंगा के किनारे बसने वाले गांवों में बनाया जाना था। गंगा किनारे के गांवों में बनाए जाने वाले शौचालय का निर्माण अब तक पूरा नहीं हुआ। जबकि वित्तीय वर्ष बीत गया। पिछले वर्ष हुई बैठक में ग्रामीणों को जागरूक करने की कार्ययोजना बनी थी। स्वच्छता समिति में जिलाधिकारी बतौर अध्यक्ष नामित हैं। फिर भी आज तक गांवों में स्वच्छता को लेकर जन जागरूकता की तरफ कोई कार्यक्रम नहीं हुआ। सूत्र बताते हैं कि गांवों में जागरूकता मेला, गोष्ठियां और नाटक जैसे कार्यक्रम होने थे।
इन कार्यक्रमों के जरिए लोगों को सफाई से होने वाले लाभ व उसकी प्रक्रिया की जानकारी दी जानी थी। चूंकि कार्यक्रम ही नहीं हुए तो इसके पीछे छिपी शासन की मंशा भी अधूरी ही रह गई। शौचालयों की दीवार पर उसके प्रयोग की विधियां लिखी जानी चाहिए। जिले का शायद ही कोई ऐसा शौचालय हो जिस इस तरह की चीजें लिखी गई हों। दम तोड़ रहे जागरूकता कार्यक्रम को स्वच्छता समिति के अध्यक्ष डीएम भी तवज्जों नहीं दे रहे। जागरूकता के अभाव में शौचालय का प्रयोग करने से लोग कतरा रहे हैं। घर में शौचालय होने के बाद भी वह सुबह होते ही लोटा लेकर खेतों की ओर शौच के लिए दौड़ पड़ते हैं।
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स्वच्छ भारत अभियान (ग्रामीण) के तहत वित्त वर्ष 2014-2015 में सात हजार 798 शौचालय निर्माण का लक्ष्य था। जिसमें दो हजार 333 शौचालय गंगा के किनारे बसने वाले गांवों में बनाया जाना था। गंगा किनारे के गांवों में बनाए जाने वाले शौचालय का निर्माण अब तक पूरा नहीं हुआ। जबकि वित्तीय वर्ष बीत गया। पिछले वर्ष हुई बैठक में ग्रामीणों को जागरूक करने की कार्ययोजना बनी थी। स्वच्छता समिति में जिलाधिकारी बतौर अध्यक्ष नामित हैं। फिर भी आज तक गांवों में स्वच्छता को लेकर जन जागरूकता की तरफ कोई कार्यक्रम नहीं हुआ। सूत्र बताते हैं कि गांवों में जागरूकता मेला, गोष्ठियां और नाटक जैसे कार्यक्रम होने थे।
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इन कार्यक्रमों के जरिए लोगों को सफाई से होने वाले लाभ व उसकी प्रक्रिया की जानकारी दी जानी थी। चूंकि कार्यक्रम ही नहीं हुए तो इसके पीछे छिपी शासन की मंशा भी अधूरी ही रह गई। शौचालयों की दीवार पर उसके प्रयोग की विधियां लिखी जानी चाहिए। जिले का शायद ही कोई ऐसा शौचालय हो जिस इस तरह की चीजें लिखी गई हों। दम तोड़ रहे जागरूकता कार्यक्रम को स्वच्छता समिति के अध्यक्ष डीएम भी तवज्जों नहीं दे रहे। जागरूकता के अभाव में शौचालय का प्रयोग करने से लोग कतरा रहे हैं। घर में शौचालय होने के बाद भी वह सुबह होते ही लोटा लेकर खेतों की ओर शौच के लिए दौड़ पड़ते हैं।
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