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बेल्हा से रूठ गई ‘राम की लीला’

Thu, 26 Sep 2013 05:36 AM IST
Pratapgarh
Pratapgarh Updated Thu, 26 Sep 2013 05:36 AM IST
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प्रतापगढ़। लगभग 12 बरस पहले बेल्हा में रामलीला देखने के लिए भीड़ उमड़ती थी। दरभंगा (बिहार) से आने वाले कलाकारों का मंचन बेल्हा ही नहीं आसपास के इलाकों तक मशहूर था। उनकी कला देखने के लिए लोग शाम से ही रामलीला मंचन स्थल पर जगह घेरकर डट जाते थे। गोपाल मंदिर में होने वाली इस रामलीला में मजहबी दीवारें टूट जाती थीं। मगर बेल्हा से राम रूठ गए और उनकी लीला भी बंद हो गई। अब सिर्फ झांकियों से काम चलाया जा रहा है।
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शहर के गोपाल मंदिर में बारह वर्ष पूर्व रामलीला का मंचन किया जाता था। कई दशकों से आयोजित होने वाली रामलीला का मंचन देखने के लिए जनपद का हर वर्ग सपरिवार पहुंचता था। महीनों पहले से ही इस कार्यक्रम की तैयारियां जोर पकड़ लेती थीं। कलाकारों के संवाद और कला की सजीव प्रस्तुति लोगों को भाव विभोर कर देती थी। शहर में राम बारात समेत अन्य शोभा यात्राओं में शामिल लोगों के लिए तकरीबन बीस स्थानों पर जलपान की व्यवस्था कराई जाती थी। यही नहीं सीता और राम विवाह के उपरांत कलाकारों को लाखों रुपये के उपहार मिलते थे। रामलीला देखने के लिए भीड़ का आलम ऐसा होता था कि लोग टाट पट्टियां बिछाकर बैठने के लिए पहले से जगह सुरक्षित कर लेते थे। मगर धीरे-धीरे ऐतिहासिक रामलीला की लौ मद्धिम होने लगी और बारह वर्ष पूर्व इसका मंचन बंद कर दिया गया। श्री रामलीला समिति के कुछ लोगों ने रामलीला का मंचन पुन: शुरू कराने का प्रयास किया लेकिन सफल नहीं हो सके।
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दशकों पूर्व जब रामलीला का मंचन शुरू हुआ था तब गोपाल मंदिर के आसपास काफी जमीन खाली पड़ी हुई थी। जिससे मंच बनाने के साथ ही लोगों के बैठने के लिए उचित व्यवस्था हो जाती थी। बाद में आसपास घर व दुकानें बनने, मंदिर परिसर में ही आरएसएस व गायत्री परिवार का भवन बनने से आयोजन के लिए जगह कम पड़ने लगी।
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रामलीला के मंचन में पहले तकरीबन साठ से सत्तर हजार रुपये का खर्च आता था। शहर के संभ्रांत लोग व्यवस्था की जिम्मेदारी ले लेते थे। आज के समय में इतने आयोजन में तकरीबन पांच से छह लाख रुपये के खर्च का आकलन किया जाता है। वहीं लोगों में इस प्रकार के आयोजन के प्रति रुझान भी कम हुआ। जिससे इसकी व्यवस्था कर पाना कठिन हो गया।
रामलीला का मंचन दोबारा बीएन मेहता पाठशाला और रामलीला मैदान में शुरू कराया गया लेकिन स्थान सुरक्षित न होने के कारण संभ्रांत परिवार के लोग दर्शक दीर्घा से गायब हो गए। यहां सुरक्षित स्थान न होने के कारण युवकों को हुल्लड़बाजी करने का मौका मिलने लगा। रामलीला बंद होने का एक कारण यह भी रहा।
शहर के गोपाल मंदिर में ऐतिहासिक भरतमिलाप का व्यापारियों को इंतजार रहता था। व्यापारी श्रीराम कपड़े वाले तो सभी कलाकारों को पोशाक देते थे। श्याम बाबू खंडेलवाल भी हर तरह का सहयोग देने के साथ अपनी मौजूदगी से लोगों को हौसला बढ़ाते थे। इसके अलावा अशोक माहेश्वरी, अशोक अग्रवाल, अशोक आहूजा, किशनलाल खंडेलवाल, कैलाश खंडेलवाल, प्रहलाद चतुर्वेदी, राम निवास खंडेलवाल, धर्मदेव अग्रवाल, श्रीकिशोर अग्रवाल दिल खोलकर सहयोग करते थे।
श्रीरामलीला कमेटी में कई वर्षों तक जिम्मेदारी वाला पद निभा चुके उमाशंकर को आज रामलीला का मंचन न होना बहुत कष्टदायक लगता है। उमाशंकर का कहना है कि पहले लोग शोभायात्रा के दौरान रथ को अकेला या दूसरों के हवाले नहीं छोड़ते थे।
श्रीरामलीला समिति के कई ओहदों पर रह चुके व्यापारी महादेव केसरवानी रामलीला मंचन बंद होने से काफी दुखी हैं। बताया कि रामलीला मंचन के पहले कलाकारों को माला पहनाई जाती थी। कलाकारों को माला पहनाने वाले को दूसरे दिन टीम के लोगों की सेवा करनी पड़ती थी। दिन में खाना खिलाना और उन्हें हैसियत के मुताबिक उपहार दिया जाता था। लोग श्रद्धाभाव से बढ़चढ़कर हिस्सा लेते थे।

श्रीरामलीला समिति के पूर्व अध्यक्ष श्रीकिशोर अग्रवाल कहते हैं कि रामलीला का मंचन बंद होना दुर्भाग्यपूर्ण है। 40-50 बरस पहले चौक घंटाघर नहीं बना था। वहां राहगीरों के लिए कुंआ था। भरतमिलाप के दौरान कुंए के ऊपर लकड़ी का पटरा डालकर श्रीराम और भरत का मिलन कराया जाता था। इस परंपरा को रोकने की तमाम कोशिशें हुईं लेकिन आज भी कुंए के ऊपर बने चौक घंटाघर पर यह मिलन ऐतिहासिक पल का गवाह बनता है। सुरक्षित स्थान की कमी के कारण यह कार्यक्रम बंद हुआ।
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