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दीपोत्सव के दिन भी नहीं लौटीं खुशियां
Pratapgarh
Updated Tue, 13 Nov 2012 12:00 PM IST
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प्रतापगढ़। दुर्घटना में बेटे को खो चुके परिवार की खुशियों को ग्रहण लग गया है। साथी को बचाने की गरज से चिकित्सकों से भिड़ने वाले छात्रों के परिवारों से भी खुशियां रूठी हुई हैं। उधर पुलिस द्वारा संभावित मुकदमे में नाम पड़ने के डर ने इस गांव में रोशनी के पर्व को अंधेरे की कोठरी में पहुंचा दिया है। इन घरों के लोग बच्चों को जेल से बाहर करवाने और खुद को मुकदमे में फंसने से बचने को दौड़ भाग कर रहे हैं। एक तरफ लोग दिवाली की खरीददारी में व्यस्त हैं तो इन गांवों के लोग पुलिस और पीएसी की तैनाती से परेशान हैं।
लालगंज कोतवाली क्षेत्र के लीलापुर क्षेमरसरैंया गांव में रोशनी के पर्व पर भी मातम, खौफ और परेशानियों का अंधेरा रहेगा। यहां के लोगों के लिए इस बार की दीपावली मनहूसियत भरी बीतेगी। ग्रामीणों के घरों में दीये की तैयारी के स्थान पर पुलिस से बचने का उपाय सोचा जा रहा है। गांव के बच्चे घर-घरोंदे बनाने के बजाए पुलिस की सायरन बजाती जीप और सिपाहियों का पीछा करने में समय बिता रहे हैं। बाबूराम के पुत्र विपिन की मौत होने और दूसरे पुत्र के घायल होने की दशा में पूरा घर अभी तक इस हादसे से उबर नहीं पाया है। दीपावली की बात आते ही बहन रेखा और विद्या की आंखों से गंगा जमुना बहने लगती हैं। मां अमरावती देवी व पिता बाबूराम उन्हें ढांढस बंधाते हैं लेकिन स्वयं पर काबू नहीं रख पाते। उधर साथी की मौत से आक्रोशित हुए धर्मेश सरोज व हरिश्याम के परिवार में भी दिवाली की तैयारियां नहीं हुईं हैं। धर्मेश की मां कलावती व उसके पिता भुलई को बेटे के घर आने का इंतजार है तो हरिश्याम सरोज की मां डेरहिन और पिता गया प्रसाद सरोज भी बेटे को छुड़ाने की गरज से दौड़भाग कर रहे हैं।
लीलापुर में हुए बवाल के बाद पुलिस द्वारा 10 नामजद व सैकड़ों अज्ञात लोगों को बवाल में शामिल करने का खौफ सता रहा है। उन्हें डर है कि कहीं पुलिस उन पर बवाल में शामिल होने का आरोप न लगा दे। इसके चलते वे घर में नहीं टिक रहे हैं। इस बीच दूसरे गांवों में दबिश के लिए जा रही पुलिस का खौफ एक बार फिर परवान चढ़ गया है। दहशत और खौफ के चलते गांव के लोग दीपावली की तरफ ध्यान ही नहीं दे रहे। इस गांव से इस बार लक्ष्मी रूठी हुई हैं।
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लालगंज कोतवाली क्षेत्र के लीलापुर क्षेमरसरैंया गांव में रोशनी के पर्व पर भी मातम, खौफ और परेशानियों का अंधेरा रहेगा। यहां के लोगों के लिए इस बार की दीपावली मनहूसियत भरी बीतेगी। ग्रामीणों के घरों में दीये की तैयारी के स्थान पर पुलिस से बचने का उपाय सोचा जा रहा है। गांव के बच्चे घर-घरोंदे बनाने के बजाए पुलिस की सायरन बजाती जीप और सिपाहियों का पीछा करने में समय बिता रहे हैं। बाबूराम के पुत्र विपिन की मौत होने और दूसरे पुत्र के घायल होने की दशा में पूरा घर अभी तक इस हादसे से उबर नहीं पाया है। दीपावली की बात आते ही बहन रेखा और विद्या की आंखों से गंगा जमुना बहने लगती हैं। मां अमरावती देवी व पिता बाबूराम उन्हें ढांढस बंधाते हैं लेकिन स्वयं पर काबू नहीं रख पाते। उधर साथी की मौत से आक्रोशित हुए धर्मेश सरोज व हरिश्याम के परिवार में भी दिवाली की तैयारियां नहीं हुईं हैं। धर्मेश की मां कलावती व उसके पिता भुलई को बेटे के घर आने का इंतजार है तो हरिश्याम सरोज की मां डेरहिन और पिता गया प्रसाद सरोज भी बेटे को छुड़ाने की गरज से दौड़भाग कर रहे हैं।
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लीलापुर में हुए बवाल के बाद पुलिस द्वारा 10 नामजद व सैकड़ों अज्ञात लोगों को बवाल में शामिल करने का खौफ सता रहा है। उन्हें डर है कि कहीं पुलिस उन पर बवाल में शामिल होने का आरोप न लगा दे। इसके चलते वे घर में नहीं टिक रहे हैं। इस बीच दूसरे गांवों में दबिश के लिए जा रही पुलिस का खौफ एक बार फिर परवान चढ़ गया है। दहशत और खौफ के चलते गांव के लोग दीपावली की तरफ ध्यान ही नहीं दे रहे। इस गांव से इस बार लक्ष्मी रूठी हुई हैं।
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