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आधुनिकता की दौड़ में संस्कृत विद्यालय बदहाल
Updated Mon, 22 Jan 2018 07:53 PM IST
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प्रतापगढ़। आधुनिकता की दौड़ में भी जिले के संस्कृत विद्यालय बदहाल हैं। जिले के प्राइमरी और राजकीय स्कूलों को जहां चमकाया जा रहा है, वहीं संस्कृत स्कूलों को नया भवन तो दूर मरम्मत के लिए भी कोई पहल की जा रही है। इससे ये स्कूल आज भी बदहाल है।
जिले में पूर्व मध्यमा के 03, उत्तर मध्यमा के 30 और संस्कृत महाविद्यालयों की संख्या 03 है। इन स्कूलों से प्रतिवर्ष लगभग सात हजार छात्र-छात्राएं डिग्री लेकर निकलते हैं। शिक्षा के आधुनिकीकरण की दिशा में जहां सीबीएसई, आईसीएसई और यूपी बोर्ड ने परीक्षा फार्म से लेकर प्रवेश पत्र जारी करने तक की व्यवस्था ऑनलाइन कर रखा है, वहीं यूपी संस्कृत बोर्ड अभी भी पुरानी परिपाटी पर काम कर रहा है। हालांकि डिग्री सेक्शन में ऑनलाइन व्यवस्था प्रारंभ हो गई है। प्राइमरी और माध्यमिक स्कूलों की दशा और पठन-पाठन की दशा में सुधार की तो पहल हो रही है, मगर संस्कृत स्कूलों में इस दिशा में कोई भी प्रयास देखने को नहीं मिल रहा है। इससे इन स्कूलों का अस्तित्व खतरे में पड़ गया है।
जिले के 36 संस्कृत स्कूलों में 273 शिक्षकों के पद स्वीकृत हैं, मगर वर्तमान में सिर्फ 175 शिक्षक ही कार्यरत हैं, इस प्रकार शिक्षकों के 98 पद खाली हैं। इन शिक्षकों की कमी से पठन-पाठन प्रभावित हो रहा है। संस्कृत स्कूलों में कार्यरत शिक्षकों के लिए शासन सिर्फ वेतन देता है। इसके अलावा न तो स्थल विकास और न ही भवन बनवाने के लिए कोई बजट नहीं दिया जाता है। इससे शिक्षकों में भी कोई खास उत्साह नहीं होता है। जिले के संस्कृत स्कूलों में अभी तक फर्नीचर की व्यवस्था नहीं है। इससे छात्र-छात्राओं को जमीन पर बैठकर पढ़ाई करनी होती है। स्कूल में गिनी-चुनी कुर्सियां होती हैं, जो इससे अभिभावकों के आने पर शिक्षकों को खड़ा होना पड़ता है। वहीं बीएन मेहता संस्कृत महाविद्यालय के प्राचार्य ओपी पांडेय का कहना है कि संस्कृत स्कूलों में आधुनिक बनाने के लिए अभी कोई पहल नहीं की गई है। भवन बनाने, स्थल विकास के लिए स्कूलों को कभी भी धनराशि नहीं मिली है। रंगाई-पुताई हम लोग अपने स्तर से करते हैं।
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जिले में पूर्व मध्यमा के 03, उत्तर मध्यमा के 30 और संस्कृत महाविद्यालयों की संख्या 03 है। इन स्कूलों से प्रतिवर्ष लगभग सात हजार छात्र-छात्राएं डिग्री लेकर निकलते हैं। शिक्षा के आधुनिकीकरण की दिशा में जहां सीबीएसई, आईसीएसई और यूपी बोर्ड ने परीक्षा फार्म से लेकर प्रवेश पत्र जारी करने तक की व्यवस्था ऑनलाइन कर रखा है, वहीं यूपी संस्कृत बोर्ड अभी भी पुरानी परिपाटी पर काम कर रहा है। हालांकि डिग्री सेक्शन में ऑनलाइन व्यवस्था प्रारंभ हो गई है। प्राइमरी और माध्यमिक स्कूलों की दशा और पठन-पाठन की दशा में सुधार की तो पहल हो रही है, मगर संस्कृत स्कूलों में इस दिशा में कोई भी प्रयास देखने को नहीं मिल रहा है। इससे इन स्कूलों का अस्तित्व खतरे में पड़ गया है।
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जिले के 36 संस्कृत स्कूलों में 273 शिक्षकों के पद स्वीकृत हैं, मगर वर्तमान में सिर्फ 175 शिक्षक ही कार्यरत हैं, इस प्रकार शिक्षकों के 98 पद खाली हैं। इन शिक्षकों की कमी से पठन-पाठन प्रभावित हो रहा है। संस्कृत स्कूलों में कार्यरत शिक्षकों के लिए शासन सिर्फ वेतन देता है। इसके अलावा न तो स्थल विकास और न ही भवन बनवाने के लिए कोई बजट नहीं दिया जाता है। इससे शिक्षकों में भी कोई खास उत्साह नहीं होता है। जिले के संस्कृत स्कूलों में अभी तक फर्नीचर की व्यवस्था नहीं है। इससे छात्र-छात्राओं को जमीन पर बैठकर पढ़ाई करनी होती है। स्कूल में गिनी-चुनी कुर्सियां होती हैं, जो इससे अभिभावकों के आने पर शिक्षकों को खड़ा होना पड़ता है। वहीं बीएन मेहता संस्कृत महाविद्यालय के प्राचार्य ओपी पांडेय का कहना है कि संस्कृत स्कूलों में आधुनिक बनाने के लिए अभी कोई पहल नहीं की गई है। भवन बनाने, स्थल विकास के लिए स्कूलों को कभी भी धनराशि नहीं मिली है। रंगाई-पुताई हम लोग अपने स्तर से करते हैं।
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