{"_id":"5a43acd94f1c1b6a118ba596","slug":"21514384601-pratapgarh-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"बालिका शिक्षा प्रेरित करने में फेल हुए कस्तूरबा स्कूल","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
बालिका शिक्षा प्रेरित करने में फेल हुए कस्तूरबा स्कूल
Updated Wed, 27 Dec 2017 07:53 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
प्रतापगढ़। बालिका शिक्षा को प्रेरित करने में जिले में खुले कस्तूरबा गांधी आवासीय विद्यालय फेल हो गए हैं। प्राइमरी और मिडिल स्कूलों के लिए नजीर के तौर पर खुलने वाले इन कस्तूरबा स्कूल में पढ़ाई का स्तर गिरने के साथ ही कौशल विकास की शिक्षा से अध्यापिकाओं ने मुंह मोड़ लिया है। इससे बालिकाओं का कस्तूरबा स्कूलों से मोह भंग हो रहा है।
जिले के ग्रामीण इलाकों की बालिकाओं को बेहतर शिक्षा और कौशल विकास का हुनर विकसित करने के लिए पंद्रह विकास खंड़ों में कस्तूरबा गांधी आवासीय विद्यालयों की स्थापना की गई है। इन स्कूलों में बालिकाओं के पठन-पाठन के साथ ही रहने, खाने और सोने की व्यवस्था है। प्रत्येक कस्तूरबा गांधी आवासीय स्कूलों में कक्षा छह से आठ तक पढ़ने वाली सौ-सौ बालिकाओं का दाखिला लिया जाता है। सामान्य, पिछड़ी, अनुसूचित और अल्पसंख्यक जाति की बालिकाओं को अनुपात में दाखिला लिया जाता है। बालिकाओं को अच्छी शिक्षा प्रदान करने के साथ ही कौशल विकास की शिक्षा देकर बालिकाओं में आत्म विश्वास जागृत किया जाता है।
कस्तूरबा गांधी आवासीय स्कूलों के रजिस्टर पर बालिकाओं की संख्या तो लगभग पूरी होती है, मगर जब भी कोई अधिकारी जांच करने जाता है, तो यह संख्या लगभग आधी होती है। संडवा चंद्रिका, बाबागंज, बिहार, शिवगढ़, पट्टी, लालगंज कस्तूरबा स्कूल के रजिस्टर में नामांकित बालिकाओं की संख्या के सापेक्ष उपस्थित रहने वाली बालिकाओं की संख्या में काफी अंतर है। आलम यह है कि 25 प्रतिशत बालिकाएं कस्तूरबा की पढ़ाई छोड़कर मिडिल स्कूलों में पढ़ाई कर रही हैं। कस्तूरबा स्कूलों में पढ़ने वाली बालिकाओं को पौष्टिक भोजन नहीं मिलता है। जिले के 15 कस्तूरबा स्कूलों में से 14 को आपूर्ति करने का जिम्मेदारी एक ही ठेकेदार को दी गई है। इससे वह वार्डेन को खुश करके अपना काम तमाम कर लेता है। इससे बालिकाओं को आए दिन तहरी और खिचड़ी खाकर भूख मिटानी पड़ती है।
विज्ञापन
जिला समन्वयक बालिका शिक्षा की कुर्सी लंबे समय से खाली होने के कारण कस्तूरबा स्कूलों की निगरानी ठीक से नहीं हो पाती है। विभाग के मुखिया बीएसए के पास इतना काम होता है कि वह नियमित रुप से इन स्कूलों की देखरेख नहीं कर पाते हैं। कस्तूरबा स्कूलों के संचालन की जिम्मेदारी वार्डेन को सौंपी गई है। वार्डेन को रात में स्कूल में ही रहने का निर्देश दिया गया है। मगर वार्डेन और फुल टाइम टीचर घर चली जाती है। सिर्फ चौकीदार के भरोसे स्कूल चलता है। संडवा चंद्रिका कस्तूरबा की प्रभारी वार्डेन का परिवार इलाहाबाद में रहता है, इसलिए वह प्राय: गायब रहती हैं। पूर्व डीएम के निरीक्षण में इसका खुलासा भी हुआ था। वहीं बीएसए का कहना है कि कस्तूरबा गांधी स्कूलों में गांव की बालिकाओं को बेहतर शिक्षा देने के लिए दाखिला कराया जाता है। जिले के सभी कस्तूरबा स्कूलों में पठन-पाठन विधिवत हो रहा है। इधर ठंड बढ़ने के कारण कुछ बालिकाएं घर अवश्य चली गई होंगी। फिलहाल मामले की जांच कराकर कार्रवाई की जाएगी।
विज्ञापन
जिले के ग्रामीण इलाकों की बालिकाओं को बेहतर शिक्षा और कौशल विकास का हुनर विकसित करने के लिए पंद्रह विकास खंड़ों में कस्तूरबा गांधी आवासीय विद्यालयों की स्थापना की गई है। इन स्कूलों में बालिकाओं के पठन-पाठन के साथ ही रहने, खाने और सोने की व्यवस्था है। प्रत्येक कस्तूरबा गांधी आवासीय स्कूलों में कक्षा छह से आठ तक पढ़ने वाली सौ-सौ बालिकाओं का दाखिला लिया जाता है। सामान्य, पिछड़ी, अनुसूचित और अल्पसंख्यक जाति की बालिकाओं को अनुपात में दाखिला लिया जाता है। बालिकाओं को अच्छी शिक्षा प्रदान करने के साथ ही कौशल विकास की शिक्षा देकर बालिकाओं में आत्म विश्वास जागृत किया जाता है।
विज्ञापन
कस्तूरबा गांधी आवासीय स्कूलों के रजिस्टर पर बालिकाओं की संख्या तो लगभग पूरी होती है, मगर जब भी कोई अधिकारी जांच करने जाता है, तो यह संख्या लगभग आधी होती है। संडवा चंद्रिका, बाबागंज, बिहार, शिवगढ़, पट्टी, लालगंज कस्तूरबा स्कूल के रजिस्टर में नामांकित बालिकाओं की संख्या के सापेक्ष उपस्थित रहने वाली बालिकाओं की संख्या में काफी अंतर है। आलम यह है कि 25 प्रतिशत बालिकाएं कस्तूरबा की पढ़ाई छोड़कर मिडिल स्कूलों में पढ़ाई कर रही हैं। कस्तूरबा स्कूलों में पढ़ने वाली बालिकाओं को पौष्टिक भोजन नहीं मिलता है। जिले के 15 कस्तूरबा स्कूलों में से 14 को आपूर्ति करने का जिम्मेदारी एक ही ठेकेदार को दी गई है। इससे वह वार्डेन को खुश करके अपना काम तमाम कर लेता है। इससे बालिकाओं को आए दिन तहरी और खिचड़ी खाकर भूख मिटानी पड़ती है।
विज्ञापन
जिला समन्वयक बालिका शिक्षा की कुर्सी लंबे समय से खाली होने के कारण कस्तूरबा स्कूलों की निगरानी ठीक से नहीं हो पाती है। विभाग के मुखिया बीएसए के पास इतना काम होता है कि वह नियमित रुप से इन स्कूलों की देखरेख नहीं कर पाते हैं। कस्तूरबा स्कूलों के संचालन की जिम्मेदारी वार्डेन को सौंपी गई है। वार्डेन को रात में स्कूल में ही रहने का निर्देश दिया गया है। मगर वार्डेन और फुल टाइम टीचर घर चली जाती है। सिर्फ चौकीदार के भरोसे स्कूल चलता है। संडवा चंद्रिका कस्तूरबा की प्रभारी वार्डेन का परिवार इलाहाबाद में रहता है, इसलिए वह प्राय: गायब रहती हैं। पूर्व डीएम के निरीक्षण में इसका खुलासा भी हुआ था। वहीं बीएसए का कहना है कि कस्तूरबा गांधी स्कूलों में गांव की बालिकाओं को बेहतर शिक्षा देने के लिए दाखिला कराया जाता है। जिले के सभी कस्तूरबा स्कूलों में पठन-पाठन विधिवत हो रहा है। इधर ठंड बढ़ने के कारण कुछ बालिकाएं घर अवश्य चली गई होंगी। फिलहाल मामले की जांच कराकर कार्रवाई की जाएगी।