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बसपा : बढ़ता रहा कारवां पर दूर रही मंजिल
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बसपा : हर चुनाव में वोट बढ़ता गया, दूर होती गई जीत
जातीय समीकरणों का सारा फार्मूला हो गया बेकार
अमर उजाला ब्यूरो
प्रतापगढ़। जिले में लोकसभा चुनावों में लगातार बसपा का जनाधार बढ़ा, लेकिन जीत दूर होती चली गई। जातीय समीकरणों के बल पर हाथी का निशान लेकर मैदान में उतरने वाले प्रत्याशियों ने बसपा का मत प्रतिशत तो बढ़ाया, लेकिन उन्हें कामयाबी नहीं मिल सकी।
लोकसभा चुनाव के सफर में 1989 से बसपा मैदान में है। जिले में उसने पिछड़ी जातियों के साथ ही दो बार मुसलिम और दो बार ब्राह्मण उम्मीदवारों को आजमाया है। लगातार दो चुनावों से वह दूसरे नंबर पर भी है। 2009 में ब्राह्मण उम्मीदवार होने की दशा में हार का फासला 20 हजार से कम था। 2014 में मुसलिम प्रत्याशी उतारने पर वोट तो बढ़ा, लेकिन हार का फासला 1.68 लाख से अधिक हो गया। जिले में 1991 में बसपा प्रत्याशी हरीनाथ सिंह यादव के नाम सबसे कम वोट पाने का रिकार्ड है। उसके बाद हर चुनाव में पार्टी का वोट बैंक बढ़ता गया। 2009 में तो पार्टी प्रत्याशी जीत के काफी करीब पहुंचकर ठिठक गए थे। 2014 में भी वोट बैंक बढ़ा और पार्टी ने अपना दूसरा स्थान बरकरार रखा, लेकिन अद-भाजपा गठबंधन की जीत का फासला इतना अधिक हो गया कि कोई भी प्रत्याशी दूर-दूर तक नहीं फटक सका। यही हाल वर्ष 2019 के चुनाव में भी हुआ। सपा-बसपा गठबंधन के बाद बसपा के खाते में सीट गई। बसपा ने अशोक त्रिपाठी को अपना प्रत्याशी बनाया। उन्हें 318539 मत मत मिले, लेकिन जीत हासिल नहीं हुई। इस बार भी बसपा प्रत्याशी को दूसरे स्थान से संतोष करना पड़ा।
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वर्ष मत फासला
1989 31429 134441
1991 18132 92701
1996 36964 102362
1998 62787 170140
1999 78923 123243
2004 82876 155261
2009 169137 19779
2014 207567 168222
2019 318539 117952
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जातीय समीकरणों का सारा फार्मूला हो गया बेकार
अमर उजाला ब्यूरो
प्रतापगढ़। जिले में लोकसभा चुनावों में लगातार बसपा का जनाधार बढ़ा, लेकिन जीत दूर होती चली गई। जातीय समीकरणों के बल पर हाथी का निशान लेकर मैदान में उतरने वाले प्रत्याशियों ने बसपा का मत प्रतिशत तो बढ़ाया, लेकिन उन्हें कामयाबी नहीं मिल सकी।
लोकसभा चुनाव के सफर में 1989 से बसपा मैदान में है। जिले में उसने पिछड़ी जातियों के साथ ही दो बार मुसलिम और दो बार ब्राह्मण उम्मीदवारों को आजमाया है। लगातार दो चुनावों से वह दूसरे नंबर पर भी है। 2009 में ब्राह्मण उम्मीदवार होने की दशा में हार का फासला 20 हजार से कम था। 2014 में मुसलिम प्रत्याशी उतारने पर वोट तो बढ़ा, लेकिन हार का फासला 1.68 लाख से अधिक हो गया। जिले में 1991 में बसपा प्रत्याशी हरीनाथ सिंह यादव के नाम सबसे कम वोट पाने का रिकार्ड है। उसके बाद हर चुनाव में पार्टी का वोट बैंक बढ़ता गया। 2009 में तो पार्टी प्रत्याशी जीत के काफी करीब पहुंचकर ठिठक गए थे। 2014 में भी वोट बैंक बढ़ा और पार्टी ने अपना दूसरा स्थान बरकरार रखा, लेकिन अद-भाजपा गठबंधन की जीत का फासला इतना अधिक हो गया कि कोई भी प्रत्याशी दूर-दूर तक नहीं फटक सका। यही हाल वर्ष 2019 के चुनाव में भी हुआ। सपा-बसपा गठबंधन के बाद बसपा के खाते में सीट गई। बसपा ने अशोक त्रिपाठी को अपना प्रत्याशी बनाया। उन्हें 318539 मत मत मिले, लेकिन जीत हासिल नहीं हुई। इस बार भी बसपा प्रत्याशी को दूसरे स्थान से संतोष करना पड़ा।
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वर्ष मत फासला
1989 31429 134441
1991 18132 92701
1996 36964 102362
1998 62787 170140
1999 78923 123243
2004 82876 155261
2009 169137 19779
2014 207567 168222
2019 318539 117952